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ईरानः बहाई लोग जिन्हें दो गज जमीन भी हासिल नहीं

Tue, 04 Dec 2018 03:32 PM IST
बीबीसी हिंदी
बीबीसी हिंदी Updated Tue, 04 Dec 2018 03:32 PM IST
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Iran: bahai people deprived of burial in own country
बहाई धर्म

दिल्ली का लोटस टेम्पल वैसे तो भारत में एक पर्यटन केंद्र के रूप में जाना जाता है लेकिन कम ही लोगों को मालूम होगा कि ये दरअसल बहाई धर्म का पूजा स्थल है । बहाई धर्म की जड़ें ईरान में हैं जहां बीते कुछ समय से इस समुदाय में असुरक्षा की भावना बढ़ गई है।

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ईरान में बहाई समुदाय के नेताओं को जेल में डालने की घटनाएं लोग भूले भी नहीं थे कि इसी साल सितंबर में एक ईरानी नागरिक समशी अकदसी आजमियान का शव दमावंद के इलाके में कब्र से बाहर निकालकर दूर जंगल में फेंक दिया गया।

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ये घटना स्थानीय अधिकारियों की उस चेतावनी के बाद हुई जिसमें क्षेत्र के बहाई समाज को उनके अपने निजी कब्रिस्तान में भी मुर्दे दफन करने से मना किया गया था।इससे पहले भी ईरान के कई शहरों में बहाई समुदाय के कब्रिस्तानों में तोड़-फोड़ की घटनाएं होती रही हैं। ऐसा भी हुआ है कि मुर्दे दफनाने से रोकने के लिए उनके कब्रिस्तान ही बंद कर दिए गए।

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बहाई समुदाय के कब्रिस्तान को लेकर ईरान में ऐसी असंवेदनशीलता क्यों है?

उनके कब्रिस्तान क्यों तोड़े जाते हैं और अपने निजी कब्रगाहों में भी उन्हें मुर्दे दफनाने से क्यों रोका जाता है? क्या इस तरह का बर्ताव इस्लामी शरीयत के मुताबिक वाजिब है? खासकर शिया इस्लामी कानून, जिसकी बुनियाद पर ईरान का इस्लामी गणतंत्र काम करता है?

ऐसे सवालों की एक लंबी फेहरिस्त है जिनके जवाब न केवल बहाई लोग खोज रहे हैं बल्कि गैरबहाई भी इस बारे में जानना चाहते हैं।
 

कौन हैं ये बहाई लोग

बहाई दुनिया के सबसे नए धर्मों में गिना जाता है। इसकी स्थापना बहाउल्लाह ने साल 1863 में ईरान में की थी। बहाई लोग ये मानते हैं कि दुनिया के सभी धर्म सच्चे हैं और सभी लोगों को मानवता के फायदे के लिए मिलकर काम करना चाहिए। दुनिया के 235 देशों में बहाई धर्म को मानने वालों की संख्या करीब साठ लाख है।

माना जाता है कि बहाई धर्म का उदय इस्लाम की शिया शाखा से ही हुआ। लेकिन आज हालात ऐसे हैं कि अपने ही देश में ये बहाई लोग दोयम दर्जे की जिंदगी जी रहे हैं।न सिर्फ ईरान बल्कि मध्य पूर्व के अन्य देशों में भी बहाई समुदाय उपेक्षा और दमन का शिकार हैं।

Iran: bahai people deprived of burial in own country
बहाई लोगों के लिए कब्रिस्तान

बहाई लोगों का दमन
बहाई लोगों को उनके विशेष कब्रिस्तान में मुर्दों को दफन करने से रोकने, उनके कब्रिस्तान में तोड़-फोड़ और दफन लाशों को बाहर निकालकर फेंक देने के पीछे मकसद इस अल्पसंख्यक समुदाय को मिटाना और रोजमर्रा की जिंदगी में उनकी सामाजिक मौजूदगी खत्म करना है।

बहाई समुदाय पहले से ही मुसलमानों के कब्रिस्तान में अपने मुर्दे को दफन नहीं कर सकते हैं और अब नई घोषणा पर अमल करते हुए अपने सामुदायिक कब्रिस्तान में भी दफन नहीं कर पाएंगे तो फिर उनके लिए मुर्दा दफनाने की कोई जगह ही नहीं बचती है।

मुर्दा दफनाने से रोकने की ये घोषणा उस सिलसिले की एक कड़ी है जिसके तहत बहाई लोगों को अपने धार्मिक और सांस्कृतिक रीति रिवाज अपनाने और अपने पसंद की शिक्षा पाने से रोका जा रहा है। इन दबावों का एक उद्देश्य ये भी है कि बहाई समुदाय के लोग मजबूर होकर अपना धर्म छोड़ दें और इस्लाम कबूल कर लें।

इस्लाम का इतिहास
अपने सांस्कृतिक विरोधियों का इस तरह दमन करने का एक लंबा इतिहास रहा है।इस्लाम के तीसरे खलीफा उस्मान बिन अफ्फान की जब उनके विरोधियों ने हत्या कर दी तो उन्हें मदीना में उन यहूदियों के कब्रिस्तान में दफन किया गया जो मदीना छोड़कर चले गए थे।

बाद में मुआविया बिन अबु सुफयान ने मदीना में मुसलमानों के कब्रिस्तान का विस्तार करके उस्मान की कब्र को इस कब्रिस्तान में मिला लिया।यही कारण रहा है कि इस्लामी इतिहास के कई महापुरुषों को अज्ञात जगहों पर दफनाया गया ताकि उनके विरोधी उनकी कब्र को खोल न सकें। लेकिन ऐसा नहीं लगता है कि बहाई समुदाय पर दमन करने वालों का लक्ष्य पूरा होगा।

प्रतिक्रिया की आशंका
अगर बहाई समुदाय के खिलाफ दमन और हिंसा में तेजी आती है तो स्वभाविक रूप से इसे लेकर प्रतिक्रिया भी होगी। बहाई लोग विरोध में एकजुट हो सकते हैं। इसके अलावा दमन के खिलाफ और बहाई समुदाय के लिए दूसरे लोगों में भी हमदर्दी पैदा होगी।

दुनिया के दूसरे देशों की तरफ़ से भी इस पर प्रतिक्रिया देने के आसार हैं।कब्र खोद कर मुर्दा निकालना इस्लामी कानून में भी ठीक नहीं माना जाता है और इसे मुर्दे और मृत व्यक्ति के रिश्तेदारों का अनादर और अपमान समझा जाता है। कब्र की खुदाई या कब्र को दोबारा खोलना उसी स्थिति में सही माना जाता है जब किसी हत्या के मामले को सुलझाने में इससे मदद मिले या मुर्दे के साथ छीना हुआ धन छुपाया गया हो।

ये बात भी केवल मुसलमानों की कब्र पर लागू होती है न कि दूसरे धर्मों के माननेवालों पर। तो क्या शव के अनादर की बात केवल मुसलमानों की कब्र पर ही लागू होगी और गैर-मुसलमानों की कब्रें इस इज्जत की हकदार नहीं हैं?

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