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दुनिया कोरोनावायरस वैक्सीन के एक कदम करीब, भारतीय वैज्ञानिक की अहम भूमिका
Fri, 07 Feb 2020 01:57 PM IST
Mohit Mudgal
वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला
वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला
Published by: Mohit Mudgal
Updated Fri, 07 Feb 2020 01:57 PM IST
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कोरोनावायरस
- फोटो : PIB
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कोरोनावायरस को लेकर ऑस्ट्रेलिया के शोधकर्ताओं के एक दल को बड़ी सफलता मिली है। इस दल ने चीन से बाहर पहली बार कोरोनावायरस को नियंत्रित परिस्थितियों और पर्याप्त मात्रा में विकसित करने में सफलता प्राप्त कर ली है। अब इन विकसित किए गए वायरस से ऑस्ट्रेलिया के राष्ट्रमंडल वैज्ञानिक एवं औद्योगिक अनुसंधान परिषद (CSIRO) में कोरोनावायरस को लेकर कई अध्ययन किए जाएंगे।
पिछले सप्ताह ऑस्टेलिया के डोहर्टी संस्थान के शोधकर्ताओं ने वायरस को मानव शरीर ने अलग करने में सफलता हासिल की थी। राष्ट्रमंडल वैज्ञानिक एवं औद्योगिक अनुसंधान परिषद (CSIRO) में वायरस का विकसित होना इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि अध्ययन के लिए वायरस का पर्याप्त मात्रा में होना जरूरी है।
वायरस के विकास की पुष्टि, करते हुए राष्ट्रमंडल वैज्ञानिक एवं औद्योगिक अनुसंधान परिषद (CSIRO) के खतरनाक रोगजनकों की टीम के प्रमुख प्रोफेसर एसएस वासन ने कहा कि हम डोहर्टी संस्थान का धन्यवाद करते है कि उन्होंने मानव शरीर ने अलग कर वायरस को हमारे साथ सांझा किया। मानव शरीर के मुकाबले, अलग वायरस के साथ काम तेजी से किया जा सकता है। बता दें कि प्रोफेसर एसएस वासन ओसीआई (OCI) नगारिक है। सीएसआईआरओ कोरोनावायरस का वैक्सीन बनाने के लिए काम कर रहा है।
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अब तक नहीं मिला कोई इलाज
अभी तक इस वायरस का कोई इलाज नहीं है, मेलबर्न विश्वविद्यालय और रॉयल मेलबर्न अस्पताल के शोधकर्ताओं ने बुधवार को बताया था कि इस खोज से वायरस की वैश्विक रूप से सही जांच करने और उसका इलाज ढूंढने में मदद मिलेगी।
द रॉयल मेलबर्न अस्पताल के जूलियन ड्रूस ने बताया कि चीनी अधिकारियों ने इस नोवेल कोरोनावायरस के जीन का समूह जारी किया था जो इस रोग की पहचान करने में मददगार है। असली वायरस होने से जांच की सभी पद्धतियों का सत्यापन करने में मदद मिलेगी और इस रोग के निदान में काफी महत्वपूर्ण साबित होगा।
प्राकृतिक वातावरण के बाहर जो वायरस विकसित किया गया है उसका इस्तेमाल एंटीबॉडी जांच विकसित करने में किए जाने की संभावना है। इससे उन मरीजों में भी वायरस का पता किया जा सकेगा जो लक्षण नजर नहीं आने के कारण खुद के संक्रमित होने की बात से अनजान हैं।
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पिछले सप्ताह ऑस्टेलिया के डोहर्टी संस्थान के शोधकर्ताओं ने वायरस को मानव शरीर ने अलग करने में सफलता हासिल की थी। राष्ट्रमंडल वैज्ञानिक एवं औद्योगिक अनुसंधान परिषद (CSIRO) में वायरस का विकसित होना इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि अध्ययन के लिए वायरस का पर्याप्त मात्रा में होना जरूरी है।
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वायरस के विकास की पुष्टि, करते हुए राष्ट्रमंडल वैज्ञानिक एवं औद्योगिक अनुसंधान परिषद (CSIRO) के खतरनाक रोगजनकों की टीम के प्रमुख प्रोफेसर एसएस वासन ने कहा कि हम डोहर्टी संस्थान का धन्यवाद करते है कि उन्होंने मानव शरीर ने अलग कर वायरस को हमारे साथ सांझा किया। मानव शरीर के मुकाबले, अलग वायरस के साथ काम तेजी से किया जा सकता है। बता दें कि प्रोफेसर एसएस वासन ओसीआई (OCI) नगारिक है। सीएसआईआरओ कोरोनावायरस का वैक्सीन बनाने के लिए काम कर रहा है।
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अब तक नहीं मिला कोई इलाज
अभी तक इस वायरस का कोई इलाज नहीं है, मेलबर्न विश्वविद्यालय और रॉयल मेलबर्न अस्पताल के शोधकर्ताओं ने बुधवार को बताया था कि इस खोज से वायरस की वैश्विक रूप से सही जांच करने और उसका इलाज ढूंढने में मदद मिलेगी।
द रॉयल मेलबर्न अस्पताल के जूलियन ड्रूस ने बताया कि चीनी अधिकारियों ने इस नोवेल कोरोनावायरस के जीन का समूह जारी किया था जो इस रोग की पहचान करने में मददगार है। असली वायरस होने से जांच की सभी पद्धतियों का सत्यापन करने में मदद मिलेगी और इस रोग के निदान में काफी महत्वपूर्ण साबित होगा।
प्राकृतिक वातावरण के बाहर जो वायरस विकसित किया गया है उसका इस्तेमाल एंटीबॉडी जांच विकसित करने में किए जाने की संभावना है। इससे उन मरीजों में भी वायरस का पता किया जा सकेगा जो लक्षण नजर नहीं आने के कारण खुद के संक्रमित होने की बात से अनजान हैं।