{"_id":"69bff6c9b453b880b809625e","slug":"india-lpg-crisis-liquified-petroleum-gas-storage-facility-crude-oil-iran-war-israel-us-gulf-west-asia-analysis-2026-03-22","type":"feature-story","status":"publish","title_hn":"पश्चिम एशिया युद्ध के तीन हफ्ते: US-इस्राइल या ईरान, कौन जीत रहा; दुनिया पर क्या असर, किसे फायदा-किसे नुकसान?","category":{"title":"World","title_hn":"दुनिया","slug":"world"}}
पश्चिम एशिया युद्ध के तीन हफ्ते: US-इस्राइल या ईरान, कौन जीत रहा; दुनिया पर क्या असर, किसे फायदा-किसे नुकसान?
Sun, 22 Mar 2026 07:33 PM IST
Kirtivardhan Mishra
स्पेशल डेस्क, अमर उजाला
स्पेशल डेस्क, अमर उजाला
Published by: Kirtivardhan Mishra
Updated Sun, 22 Mar 2026 07:33 PM IST
सार
28 फरवरी को इस्राइल और अमेरिका की तरफ से ईरान के खिलाफ शुरू किए गए अभियान का अंत फिलहाल नजर नहीं आ रहा। जहां अमेरिका-इस्राइल लगातार ईरान के सैन्य ठिकानों के साथ-साथ उसके शीर्ष नेतृत्व पर हमला कर रहे हैं तो वहीं तेहरान की तरफ से क्षेत्र में मौजूद इस्राइल के साथ-साथ अमेरिकी सैन्य ठिकानों को भी निशाना बनाया गया है। इस वार-पलटवार में जहां ईरान में जबरदस्त जान-माल का नुकसान हुआ है तो वहीं अमेरिका के लिए यह युद्ध जबरदस्त महंगा साबित हो रहा है।
विज्ञापन
पश्चिम एशिया संघर्ष।
- फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स
विस्तार
इस्राइल-अमेरिका की तरफ से 28 फरवरी को ईरान के खिलाफ जो जंग शुरू की गई थी, अब उसे तीन हफ्ते पूरे हो चुके हैं। अमेरिकी अधिकारियों के मुताबिक, उन्हें उम्मीद थी कि यह संघर्ष सभी लक्ष्यों को हासिल करते हुए कम से कम समय में खत्म कर लिया जाएगा। हालांकि, जिस तरह से ईरान ने इस्राइल और पश्चिम एशिया में मौजूद अमेरिकी सैन्य ठिकानों पर पलटवार किए, उससे साफ हो गया कि अमेरिका की उम्मीदें जमीनी हकीकत पर आधारित नहीं थीं। ऐसे में जब शुक्रवार को अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने कहा कि उनका ध्यान अब इस युद्ध को समेटने पर है, तो काफी हद तक साफ हो गया कि ईरान युद्ध अभी कुछ दिन और जारी रह सकता है और अमेरिका संघर्ष खत्म करने के लिए कुछ निर्णायक कदम उठा सकता है।
ऐसे में यह जानना अहम है कि आखिर ईरान युद्ध में अब तक क्या-क्या बड़े घटनाक्रम हुए हैं? इन घटनाक्रमों का दुनिया पर क्या और किस तरह का असर पड़ा है? अपने क्षेत्र से दूर पश्चिम एशिया में संघर्ष में जुड़ने का अमेरिका पर क्या प्रभाव हुआ है? दोनों पक्षों की आगे की रणनीति क्या हो सकती है? अमेरिका और इस्राइल के लक्ष्यों में क्या मतभेद उभरे? आइये जानते हैं...
विज्ञापन
ऐसे में यह जानना अहम है कि आखिर ईरान युद्ध में अब तक क्या-क्या बड़े घटनाक्रम हुए हैं? इन घटनाक्रमों का दुनिया पर क्या और किस तरह का असर पड़ा है? अपने क्षेत्र से दूर पश्चिम एशिया में संघर्ष में जुड़ने का अमेरिका पर क्या प्रभाव हुआ है? दोनों पक्षों की आगे की रणनीति क्या हो सकती है? अमेरिका और इस्राइल के लक्ष्यों में क्या मतभेद उभरे? आइये जानते हैं...
विज्ञापन
पहले जानें- ईरान युद्ध के तीन हफ्तों के बड़े घटनाक्रम?
अमेरिका-इस्राइल के हमलों में ईरान के शीर्ष नेतृत्व का खात्मा
युद्ध की शुरुआत 28 फरवरी को अमेरिका और इस्राइल की तरफ से ईरान के नेतृत्व को निशाना बनाकर किए गए हवाई हमलों से हुई। इन हमलों में ईरान के सुप्रीम लीडर अयातुल्ला अली खामेनेई, उनके कई सलाहकार, ईरान के मंत्री और इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कोर (आईआरजीसी) के कई शीर्ष कमांडर मारे गए। अयातुल्ला की मौत के बाद उनके बेटे मोजतबा खामेनेई को नया सुप्रीम लीडर बनाया गया। हालांकि उनके भी हवाई हमलों में घायल होने या छिपे होने की खबरें हैं। बीते हफ्ते इस्राइली हमलों में ईरान के सुरक्षा प्रमुख अली लारीजानी की भी हत्या कर दी गई। ईरान के खुफिया विभाग के प्रमुख और आईआरजीसी के प्रवक्ता को भी लक्षित हमलों में मार दिया गया।
इस संघर्ष के कारण बड़े पैमाने पर जान-माल का नुकसान हुआ है। ईरान में 1,300 से 1,400 से अधिक लोग मारे जा चुके हैं और लगभग 32 लाख लोग विस्थापित हुए हैं। लेबनान में भी 10 लाख से अधिक लोग विस्थापित हुए हैं और वहां 1,000 से अधिक मौतें हुई हैं। सबसे ज्यादा असर लेबनान पर हुआ है, जहां इस्राइल ने ईरान समर्थक संगठन- हिज्बुल्ला के खिलाफ युद्ध छेड़ दिया है। यहां एक हजार से ज्यादा मौतें हुई हैं और हजारों घायल हैं।
ईरान ने दुनिया भर में अपने दुश्मनों के पर्यटन और मनोरंजन स्थलों पर भी हमले करने की चेतावनी दी है। युद्ध के बीच ईरान के हमलों में अमेरिका और इस्राइल के साथ-साथ पश्चिम एशियाई देशों को भी भारी नुकसान हुआ है। जहां अमेरिका ने अब तक अपने सात सैनिकों की मौत की बात को कबूला है, वहीं इस्राइल में कई आम लोगों की जान गई है। खाड़ी देशों में भी दर्जन भर लोगों की जान गई है।
ये भी पढें: Diego Garcia: क्या है हिंद महासागर में वह सैन्य ठिकाना, जिस पर ईरान का हमला; अमेरिका से UK तक क्यों चिंता?
ईरान का इस्राइल-अमेरिकी सैन्य ठिकानों पर लगातार पलटवार
अपने शीर्ष नेताओं को खोने के बावजूद ईरान ने पलटवार करते हुए इस्राइल और पड़ोसी खाड़ी देशों- कुवैत, बहरीन, यूएई, कतर, सऊदी अरब, आदि के ऊर्जा और तेल ठिकानों पर मिसाइल और ड्रोन से भारी हमले किए हैं। इस्राइल ने हाल ही में जब ईरान की ऊर्जा क्षमताओं की रीढ़ साउथ पार्स गैस फील्ड पर हमले किए तो जवाब में तेहरान ने कतर और सऊदी अरब की रिफाइनरियों को निशाना बनाया। इसे लेकर डोनाल्ड ट्रंप को भी ऊर्जा ठिकानों पर हमला न करने के लिए कहना पड़ा।ईरान ने दुनिया भर में अपने दुश्मनों के पर्यटन और मनोरंजन स्थलों पर भी हमले करने की चेतावनी दी है। युद्ध के बीच ईरान के हमलों में अमेरिका और इस्राइल के साथ-साथ पश्चिम एशियाई देशों को भी भारी नुकसान हुआ है। जहां अमेरिका ने अब तक अपने सात सैनिकों की मौत की बात को कबूला है, वहीं इस्राइल में कई आम लोगों की जान गई है। खाड़ी देशों में भी दर्जन भर लोगों की जान गई है।
ये भी पढें: Diego Garcia: क्या है हिंद महासागर में वह सैन्य ठिकाना, जिस पर ईरान का हमला; अमेरिका से UK तक क्यों चिंता?
इन घटनाक्रमों का दुनिया पर क्या और किस तरह का असर पड़ा है?
- ईरान ने अमेरिका-इस्राइल के हमले शुरू होने के एक हफ्ते बाद ही रणनीतिक और व्यापारिक रूप से अहम होर्मुज जलडमरूमध्य को अपने नियंत्रण में ले लिया। ईरान ने यहां से जहाजों की आवाजाही को प्रतिबंधित कर दिया और चीन, भारत समेत कुछ गिने-चुने देशों को ही यहां से आवाजाही की इजाजत दी।
- दुनिया की 20-25 फीसदी ऊर्जा जरूरतों के लिए जिम्मेदार यह रूट बंद होने से यूरोप से लेकर एशिया तक ऊर्जा संकट पैदा हो गया है। नतीजतन कच्चे तेल की कीमतें 70 डॉलर प्रति बैरल से उछलकर 120 डॉलर प्रति बैरल तक का रिकॉर्ड बना चुकी हैं।
- खाड़ी देशों पर ऊर्जा जरूरत के लिए निर्भर रहने वाले कई देशों में जरूरी चीजों की किल्लत शुरू हो गई है। इस संकट के चलते चीन ने जेट ईंधन, डीजल और उर्वरकों के निर्यात पर रोक लगा दी है। भारत ने भी अपनी जरूरतों के पूरा होने के बाद पड़ोसी देशों की मदद की बात कही है।
- ईरान की योजना अब इस मार्ग से गुजरने वाले दुनियाभर के जहाजों से शुल्क वसूलने की है। इस नाकेबंदी की वजह से दुनियाभर में कच्चे तेल और गैस की कमी भी पैदा होने लगी है।
अपने क्षेत्र से दूर युद्ध करने का अमेरिका पर क्या प्रभाव?
1. सैन्य विस्तार और भारी खर्चयह युद्ध अमेरिका के लिए बेहद खर्चीला साबित हो रहा है। युद्ध की लागत प्रतिदिन आधा अरब डॉलर से ज्यादा आ रही है। कुछ और स्रोतों में यह खर्च एक अरब डॉलर प्रतिदिन से ज्यादा रहने का अनुमान लगाया है। पेंटागन ने खर्च की जो रिपोर्ट सांसदों के सामने पेश की थी, उसके मुताबिक, युद्ध के पहले छह दिन में ही अमेरिका 11.3 अरब डॉलर खर्च कर चुका था। इस लिहाज से उसके तीन हफ्ते में 30 अरब डॉलर से ज्यादा खर्च होने का अनुमान लगाया जाता है। अमेरिकी थिंक टैंक- सेंटर फॉर स्ट्रैटिजिक एंड इंटरनेशनल स्टडीज (सीएसआईएस) के अनुमानों के मुताबिक, अमेरिका युद्ध के दो हफ्ते में करीब 18 अरब डॉलर खर्च कर चुका था। दूसरी तरफ इस युद्ध में न ही नाटो और न ही अमेरिका के यूरोपीय और एशियाई सहयोगियों ने जुड़ने का कोई संकेत दिया है।
ये भी पढें: 'इस्राइल नहीं करेगा गैस फील्ड पर हमला': क्यों बैकफुट पर ट्रंप, कतर पर ईरान की कार्रवाई का दुनिया पर क्या असर?
इस बीच अब होर्मुज के बंद होने का असर दिखने लगा है और वैश्विक तेल के दाम बढ़ने और ट्रंप की तरफ से अतिरिक्त युद्धपोत और सैनिक भेजने से यह खर्च कई अरब डॉलर और बढ़ सकता है। अमेरिकी रक्षा मंत्रालय (पेंटागन) ने युद्ध जारी रखने के लिए कांग्रेस से 200 बिलियन डॉलर के अतिरिक्त फंड की भी मांग की है।
2. अमेरिका में राजनीतिक दुविधा
ऑस्ट्रेलियाई थिंक टैंक- यूएस स्टडीज सेंटर में विशेषज्ञ डेविड स्मिथ के मुताबिक, युद्ध के लंबा खिंचने और तेल की बढ़ती कीमतों के कारण अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप पर भारी घरेलू दबाव है। ट्रंप को अपने मेक अमेरिका ग्रेट अगेन (मागा) समर्थक बेस (जो विदेशी युद्ध के खिलाफ है और जल्द समाधान चाहती है), युद्ध-समर्थक नेताओं (जो ईरान को पूरी तरह खत्म करना चाहते हैं), और अर्थव्यवस्था के मंदी में जाने की चेतावनी दे रहे व्यापारिक प्रमुखों के बीच संतुलन बनाने में भारी संघर्ष करना पड़ रहा है।
2. अमेरिका में राजनीतिक दुविधा
ऑस्ट्रेलियाई थिंक टैंक- यूएस स्टडीज सेंटर में विशेषज्ञ डेविड स्मिथ के मुताबिक, युद्ध के लंबा खिंचने और तेल की बढ़ती कीमतों के कारण अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप पर भारी घरेलू दबाव है। ट्रंप को अपने मेक अमेरिका ग्रेट अगेन (मागा) समर्थक बेस (जो विदेशी युद्ध के खिलाफ है और जल्द समाधान चाहती है), युद्ध-समर्थक नेताओं (जो ईरान को पूरी तरह खत्म करना चाहते हैं), और अर्थव्यवस्था के मंदी में जाने की चेतावनी दे रहे व्यापारिक प्रमुखों के बीच संतुलन बनाने में भारी संघर्ष करना पड़ रहा है।
दोनों पक्षों की आगे की रणनीति क्या हो सकती है?
1. ईरान की आगे की रणनीति
युद्ध में जुटे रहने की कोशिश: ईरान एक विकेंद्रीकृत- मोजैक सैन्य रणनीति को अपना रहा है। इससे वह अपने मारे गए नेताओं की तुरंत जगह भर सके और लंबे समय तक थका देने वाला युद्ध जारी रख सके। ईरान का मानना है कि अमेरिका जैसे शक्तिशाली देश के सामने केवल युद्ध में टिके रहना और उसे दर्द पहुंचाना ही उसकी बहुत बड़ी जीत है।होर्मुज जलडमरूमध्य पर प्रतिबंध लागू रखना: होर्मुज पर अपनी नाकेबंदी को और मजबूत करते हुए, ईरान की योजना यहां एक नई व्यवस्था स्थापित करने की है। इसके तहत इस अंतरराष्ट्रीय जलमार्ग से गुजरने वाले दुनियाभर के जहाजों से ईरान भारी शुल्क वसूल सकता है, ताकि उसके लिए आर्थिक मजबूती का रास्ता साफ हो।
हमलों का वैश्विक विस्तार: दुश्मन देशों पर कूटनीतिक और मनोवैज्ञानिक दबाव बनाने के लिए, ईरान ने धमकियां दी हैं कि अगर अमेरिका के सहयोगी देश इस युद्ध में कूदते हैं तो वह संघर्ष को पश्चिम एशिया की सीमाओं से बाहर ले जाएगा और दुनियाभर में मौजूद अपने दुश्मनों के पर्यटन और मनोरंजन स्थलों पर हमले करेगा। एक दिन पहले ही ब्रिटेन ने अमेरिका को अपने सैन्य बेसों को ईरान के खिलाफ जंग में इस्तेमाल की इजाजत दी थी। इसके जवाब में ईरान ने हिंद महासागर में स्थित डिएगो गार्सिया सैन्य बेस पर मिसाइल हमले की कोशिश की।
युद्धविराम के लिए कड़ी शर्तें: अपनी स्थिति को मजबूत मानते हुए, ईरान युद्ध रोकने के लिए अमेरिका और खाड़ी देशों से भारी मुआवजे की मांग कर रहा है और यह शर्त रख रहा है कि अमेरिकी सेना को इस क्षेत्र से पूरी तरह बाहर जाना होगा।
अमेरिका और इस्राइल की आगे की रणनीति क्या, लक्ष्यों में कितना फर्क?
इस्राइल का लक्ष्य- नेतृत्व का खात्मा और आंतरिक विद्रोहइस्राइल की रणनीति ईरान के शीर्ष नेतृत्व और खुफिया प्रमुखों को लगातार निशाना बनाने की रही है। इसके साथ ही, इस्राइल 'बसीज' जैसे घरेलू सुरक्षा बलों के मुख्यालयों पर हमले कर रहा है, ताकि ईरान की आंतरिक सुरक्षा व्यवस्था चरमरा जाए और देश के भीतर बड़े पैमाने पर जनता का विद्रोह भड़क सके।
ईरान के शीर्ष नेतृत्व को खत्म करने की इस्राइल की नीति काफी हद तक सफल भी रही है, लेकिन वह अब तक ईरान में अंदरूनी विद्रोह भड़काने में नाकाम रहा है। रिपोर्ट्स के मुताबिक, ईरान में अयातुल्ला खामेनेई ने अमेरिका-इस्राइल के हमलों की आशंका को देखते हुए पहले ही कई चरणों की शासन व्यवस्था बना दी थी। इसकी वजह से ईरान में अब तक नेतृत्व संकट का खासा असर नहीं हुआ है और इसके चलते मौजूदा शासन की सैन्य-कानून व्यवस्था पर पकड़ बरकरार है।
दूसरी तरफ इस्राइली-अमेरिकी हमलों में ईरान में कई आम लोगों की भी मृत्यु हुई है, जिससे लोग अपने घरों में ही फंसे हैं या बंद रहने को मजबूर हैं। ऐसे में मौजूदा शासन के खिलाफ सड़कों पर बड़े प्रदर्शन खासे मुश्किल साबित हो रहे हैं।
अमेरिका का लक्ष्य- ईरान की सैन्य क्षमताओं की तबाही
ट्रंप प्रशासन की रणनीति मुख्य रूप से ईरान की बैलिस्टिक मिसाइल उत्पादन क्षमता, उसके मिसाइल लॉन्चिंग पैड्स और ईरानी नौसेना को पूरी तरह नष्ट करने पर केंद्रित है। इसके लिए अमेरिकी सेना ने एयरस्ट्राइक के साथ-साथ 5,000 पाउंड के 'बंकर-बस्टर' (जीबीयू-72/बीएस) बमों का इस्तेमाल शुरू कर दिया है, ताकि जमीन के नीचे बने मिसाइल ठिकानों को तबाह किया जा सके। हालांकि, इसके बावजूद ईरान की ड्रोन और मिसाइलें दागने की क्षमता अब तक बरकरार है।
अमेरिका ने हाल ही में अपने लक्ष्यों को विस्तार देते हुए होर्मुज जलडमरूमध्य को ईरान के नियंत्रण से आजाद कराने की भी योजना रखी है। अमेरिकी मीडिया ग्रुप एक्सियोस की रिपोर्ट के मुताबिक, अमेरिका पश्चिम एशिया में अतिरिक्त मरीन सैनिकों और युद्धपोतों को भेज रहा है। सैन्य रणनीतिकारों का अनुमान है कि इसका इस्तेमाल ईरान के अहम खर्ग द्वीप (जो होर्मुज का मुख्य द्वार है) पर कब्जा करने या तटीय क्षेत्रों को सुरक्षित करने के लिए किया जा सकता है।
ट्रंप प्रशासन की रणनीति मुख्य रूप से ईरान की बैलिस्टिक मिसाइल उत्पादन क्षमता, उसके मिसाइल लॉन्चिंग पैड्स और ईरानी नौसेना को पूरी तरह नष्ट करने पर केंद्रित है। इसके लिए अमेरिकी सेना ने एयरस्ट्राइक के साथ-साथ 5,000 पाउंड के 'बंकर-बस्टर' (जीबीयू-72/बीएस) बमों का इस्तेमाल शुरू कर दिया है, ताकि जमीन के नीचे बने मिसाइल ठिकानों को तबाह किया जा सके। हालांकि, इसके बावजूद ईरान की ड्रोन और मिसाइलें दागने की क्षमता अब तक बरकरार है।
अमेरिका ने हाल ही में अपने लक्ष्यों को विस्तार देते हुए होर्मुज जलडमरूमध्य को ईरान के नियंत्रण से आजाद कराने की भी योजना रखी है। अमेरिकी मीडिया ग्रुप एक्सियोस की रिपोर्ट के मुताबिक, अमेरिका पश्चिम एशिया में अतिरिक्त मरीन सैनिकों और युद्धपोतों को भेज रहा है। सैन्य रणनीतिकारों का अनुमान है कि इसका इस्तेमाल ईरान के अहम खर्ग द्वीप (जो होर्मुज का मुख्य द्वार है) पर कब्जा करने या तटीय क्षेत्रों को सुरक्षित करने के लिए किया जा सकता है।
कुछ अन्य रिपोर्ट्स में यह भी दावा किया जा रहा है कि ट्रंप पर ईरान संघर्ष से निकलने का बड़ा दबाव है और वह राजनीतिक दुविधा का सामना कर रहे हैं। इसकी वजह यह है कि ट्रंप अपने राष्ट्रपति चुनाव प्रचार अभियान के दौरान विदेशी युद्ध से अमेरिका को दूर रखने और लंबे-महंगे संघर्षों में शामिल रहने के खिलाफ रहे थे। उन्हें इन वादों के लिए जबरदस्त समर्थन भी मिला। हालांकि, अब उनके समर्थक वादाखिलाफी को लेकर नाराज हैं।
हालांकि, उनके कई समर्थक नेता युद्ध में ईरान को पूरी तरह नेस्तनाबूत करने के पक्ष में हैं। एक तीसरा धड़ा व्यापारियों का है, जो कि तेल की बढ़ती कीमतों, गिरते शेयर बाजारों और बढ़ती महंगाई को लेकर ट्रंप को चेता रहे हैं। विश्लेषकों के मुताबिक ट्रंप इस युद्ध से जल्द से जल्द एक सम्मानजनक एग्जिट खोज रहे हैं और उनकी योजना खुद को विजेता घोषित करने की है।
संबंधित वीडियो
हालांकि, उनके कई समर्थक नेता युद्ध में ईरान को पूरी तरह नेस्तनाबूत करने के पक्ष में हैं। एक तीसरा धड़ा व्यापारियों का है, जो कि तेल की बढ़ती कीमतों, गिरते शेयर बाजारों और बढ़ती महंगाई को लेकर ट्रंप को चेता रहे हैं। विश्लेषकों के मुताबिक ट्रंप इस युद्ध से जल्द से जल्द एक सम्मानजनक एग्जिट खोज रहे हैं और उनकी योजना खुद को विजेता घोषित करने की है।
संबंधित वीडियो