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ताजा रिपोर्ट: बीते तीन साल में 85 देशों में सैनिक कार्रवाई की अमेरिका ने

Fri, 08 Oct 2021 03:29 PM IST
Harendra Chaudhary वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला, वाशिंगटन
वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला, वाशिंगटन Published by: Harendra Chaudhary Updated Fri, 08 Oct 2021 03:29 PM IST
सार

ये रिपोर्ट अनुसंधानकर्ता स्टीफाइन सावेल के जुटाए आंकड़ों के आधार पर छापी है। स्टीफाइन सावेल ने ध्यान दिलाया है कि दूसरे विश्व युद्ध के बाद से अमेरिका दुनिया की सबसे बड़ी सैनिक ताकत है। अमेरिकी सैनिक दुनिया के हर हिस्से में तैनात हैं। इसलिए आतंक के खिलाफ युद्ध के दौरान उसके लिए हर क्षेत्र में सैनिक कार्रवाई करना आसान बना रहा है...

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In the last three years, at least 85 countries of the world came under the ambit of these military actions of America
अमेरिकी सैनिक - फोटो : पीटीआई

विस्तार

अफगानिस्तान से अपनी सेना वापस बुलाने के बाद अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडन ने एलान किया था कि इसके साथ ही विदेशों में अमेरिका के सैनिक अभियानों को खत्म किया जा रहा है। लेकिन अमेरिकी अखबार यूएसए टुडे ने अपनी एक ताजा रिपोर्ट में बताया है कि अमेरिका ‘आतंक के खिलाफ’ दुनिया में कुल कितने अभियान चला रहा है, इस बारे में अभी तक खुद अमेरिका के लोगों को पूरी जानकारी नहीं है।

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अखबार ने बताया है कि सिर्फ पिछले तीन वर्षों में अमेरिका की इन सैनिक कार्रवाइयों के दायरे में दुनिया के कम से कम 85 देश आए। अमेरिका ने ‘आतंक के खिलाफ युद्ध’ की शुरुआत 11 सितंबर 2001 को वहां हुए आतंकवादी हमलों के बाद की थी। यूएसए टुडे ने ध्यान दिलाया है कि अभियान शुरू होने के 20 महीने बाद तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति जॉर्ज डब्ल्यू बुश ने एलान किया था कि अमेरिका ने अपना मिशन पूरा कर लिया है। लेकिन हकीकत यह है कि उस घोषणा के 18 साल बाद भी पश्चिम एशिया और दुनिया के दूसरे इलाकों में अमेरिका की सैनिक कार्रवाइयां जारी हैं।
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इस रिपोर्ट के मुताबिक 2018 से 2020 के बीच अमेरिका ने 85 देशों में ‘आतंकवाद विरोधी कार्रवाइयां’ कीं। यूएसए टुडे ने ये रिपोर्ट अनुसंधानकर्ता स्टीफाइन सावेल के जुटाए आंकड़ों के आधार पर छापी है। सावेल ने ब्राउन यूनिवर्सिटी के कॉस्ट्स ऑफ वॉर प्रोजेक्ट के लिए ये रिसर्च किया। कॉस्ट्स ऑफ वॉर प्रोजेक्ट के तहत सैनिक कार्रवाइयों पर अमेरिका के कुल खर्च का जायजा लेने की कोशिश की गई है।
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स्टीफाइन सावेल ने ध्यान दिलाया है कि दूसरे विश्व युद्ध के बाद से अमेरिका दुनिया की सबसे बड़ी सैनिक ताकत है। अमेरिकी सैनिक दुनिया के हर हिस्से में तैनात हैं। इसलिए आतंक के खिलाफ युद्ध के दौरान उसके लिए हर क्षेत्र में सैनिक कार्रवाई करना आसान बना रहा है। कॉस्ट्स ऑफ वॉर प्रोजेक्ट के आंकड़ों के मुताबिक इस युद्ध के दौरान लाखों आम लोगों और हजारों अमेरिकी सैनिकों की जान गई। इसकी वजह से तीन करोड़ 70 लाख से ज्यादा लोग विस्थापित हुए। ये युद्ध दो दशक से चल रहा है, जिस पर 6.4 ट्रिलियन डॉलर की रकम खर्च हुई है।

यूएसए टुडे के मुताबिक कई अमेरिकी सैनिक विशेषज्ञों का दावा है कि आतंक के खिलाफ युद्ध की जो कीमत चुकाई गई, उससे हुए फायदे उसकी तुलना में कहीं ज्यादा हैं। जबकि दूसरे विशेषज्ञों का कहना है कि इस युद्ध ने अमेरिका को नुकसान पहुंचाया है। उनके मुताबिक इस बीच युद्ध का चरित्र बदल गया है। अब साइबर हमले ज्यादा बड़ा खतरा बन गए हैं, जबकि अमेरिका इससे अपनी रक्षा के लिए अभी तैयार नहीं है।

आतंक के खिलाफ युद्ध के विरोधी विश्लेषकों की दलील है कि अब अमेरिका के लिए सबसे बड़ा खतरा विदेशी दहशतगर्द नहीं, बल्कि घरेलू चरमपंथी हैं। ये बात पिछले साल अक्टूबर में अमेरिकी गृह मंत्रालय की एक रिपोर्ट में भी स्वीकार की गई थी। इसके अलावा कमजोर इन्फ्रास्ट्रक्चर और जलवायु परिवर्तन अमेरिकावासियों के लिए ज्यादा बड़ी चुनौती बन गए हैं। कॉस्ट्स ऑफ वॉर की रिपोर्ट में ध्यान दिलाया गया है कि इन खतरों की अनदेखी करते हुए अमेरिका अभी भी हर साल साढ़े सात अरब डॉलर से ज्यादा रकम सेना पर खर्च कर रहा है।

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