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मानवाधिकार परिषद में नए सदस्यों के चुनाव को लेकर वैचारिक जंग
Tue, 13 Oct 2020 04:53 PM IST
Harendra Chaudhary
वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला, जिनेवा
वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला, जिनेवा
Published by: Harendra Chaudhary
Updated Tue, 13 Oct 2020 04:53 PM IST
सार
ट्रंप ने दो साल पहले अमेरिका को मानवाधिकार परिषद से हटा लिया था। इससे चीन, क्यूबा और रूस को अपनी इस धारणा को परिषद में मजबूती से रखने का मौका मिला कि मानवाधिकारों को आर्थिक नजरिए से देखा जाना चाहिए, ना कि विशुद्ध रूप से व्यक्तिगत स्वतंत्रता के नजरिए से...
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human rights council
- फोटो : UN News
विस्तार
मंगलवार को संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद में 15 नए सदस्यों के चुनाव से पहले इस बार मुकाबले की जो सूरत बनी, वह दुनिया मे बदलते शक्ति-संतुलन की ही एक मिसाल है। चीन, रूस और क्यूबा एक साथ इस परिषद में चुने जाएं, इस संभावना को गले उतारना पश्चिमी देशों और वहां के मानवाधिकार संगठनों के लिए आसान नहीं था। इन तीनों देशों के साथ मजबूत उम्मीदवार के तौर पर सऊदी अरब भी सामने आया। क्यूबा का निर्विरोध जीतना शुरू में ही तय हो गया, क्योंकि लैटिन अमेरिका- कैरेबियन क्षेत्र से खाली तीन स्थानों के लिए सिर्फ तीन उम्मीदवार सामने थे।
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लेकिन रूस और चीन अपने-अपने क्षेत्रों से मुकाबले में फंसे थे। मगर दोनों देशों की स्थिति मजबूत समझी जा रही थी। पूर्वी यूरोपीय समूह से रूस के मुकाबले उक्रेन ने अपना दावा पेश किया था। एशिया प्रशांत क्षेत्र से चार देश चुने जाने थे, जबकि मैदान में चीन और सऊदी अरब के अलावा पाकिस्तान, नेपाल और उज्बेकिस्तान ने भी अपनी दावेदारी पेश की थी। गौरतलब है कि पाकिस्तान अब अंतरराष्ट्रीय मंचों पर चीन के साथ तालमेल बनाकर चलता है। इसलिए यह लग रहा था कि इन दोनों में से कम से कम एक देश इस बार संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद में होगा।
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इस संभावना को देखते हुए अमेरिकी मानवाधिकार संस्था ह्यूमन राइट्स वॉच और कई दूसरे समूहों ने मुहिम छेड़ दी। जिनेवा स्थित एनजीओ यूएन वॉच ने रूस, चीन, सऊदी अरब, क्यूबा और पाकिस्तान का जिक्र करते हुए कहा कि उनका मानवाधिकार परिषद में चुना जाना वैसा ही है, जैसा कि पांच आग लगाने वाले लोग फायर ब्रिगेड का हिस्सा बन जाएं। मानवाधिकार परिषद में 47 सदस्य हैं। उनमें से 15 सदस्य तीन साल के कार्यकाल के लिए अब चुने गए हैं, जो एक जनवरी 2021 से अपना कार्यभार संभालेंगे।
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ये चुनाव हर साल होता है। मगर इस बार जैसी तीखी बहस शायद ही पहले कभी हुई हो। वजह यह है कि चीन, रूस और क्यूबा ऐसे देश हैं, जो मानवाधिकार की पश्चिमी पूंजीवादी देशों की परिभाषा से सहमत नहीं रहे हैं। दुनिया में बनी नई स्थितियों में वे मिलकर काम कर रहे हैं। डोनल्ड ट्रंप के कार्यकाल में अमेरिका के विश्व मंचों से हटने का नतीजा ये हुआ है कि चीन और उसके साथी देश वैश्विक चर्चाओं को अपने ढंग से प्रभावित कर रहे हैं।
ट्रंप ने दो साल पहले अमेरिका को मानवाधिकार परिषद से हटा लिया था। इससे चीन, क्यूबा और रूस को अपनी इस धारणा को परिषद में मजबूती से रखने का मौका मिला कि मानवाधिकारों को आर्थिक नजरिए से देखा जाना चाहिए, ना कि विशुद्ध रूप से व्यक्तिगत स्वतंत्रता के नजरिए से।
चीन इसे मानवाधिकार का ‘जन केंद्रित’ नजरिया कहता है। संयुक्त राष्ट्र इसे स्वीकार करे, इसके लिए वह लगातार प्रयासरत है। पिछले दिनों इसके लिए सात देशों के समर्थन से एक प्रस्ताव परिषद में रखा गया था, हालांकि इस चुनाव से ठीक पहले उसे वापस ले लिया गया। लेकिन इस बात की पूरी संभावना है कि अगले साल फिर परिषद के सामने ये प्रस्ताव लाया जाएगा।
चीन का तर्क है कि रोजगार और बुनियादी आजीविका मूलभूत मानवाधिकार हैं। उसका दावा है कि चूंकि वह मानवाधिकार के जन-केंद्रित नजरिए से चलता है इसीलिए उसने कोरोना महामारी को रोकने में पूरी ताकत और संसाधन झोंके और अपने यहां बड़ी तबाही रोक ली। अब वह अपनी नीतियों में जीडीपी विकास के लक्ष्य तय करने के बजाय आमजन की बेहतरी के लक्ष्य तय कर रहा है।
पश्चिमी देश इन तर्कों को शिनजियांग, तिब्बत और हांगकांग में नागरिक अधिकारों के हनन को ढकने का प्रयास बताते हैं। मगर विडंबना यह है कि कोरोना महामारी से पीड़ित और आर्थिक संकट से जूझ रही दुनिया में चीन की बात सुनने वाले देशों की संख्या बढ़ती जा रही है।