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चिंताजनक: उम्र और कैंसर समान लेकिन ज्यादा जान गंवाते हैं गरीब बच्चे, वैश्विक आंकड़े चिंता का विषय
Thu, 18 Dec 2025 05:27 AM IST
लव गौर
अमर उजाला नेटवर्क
अमर उजाला नेटवर्क
Published by: लव गौर
Updated Thu, 18 Dec 2025 05:27 AM IST
सार
एक अध्ययन से सामने आया है कि कमजोर और मध्यम आय वाले देशों में इलाज की कमी हर साल करीब 75 हजार बच्चों की जान ले रही है।
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सांकेतिक तस्वीर
- फोटो : META-AI
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विस्तार
हर साल दुनिया में 15 साल से कम उम्र के 2 लाख से अधिक बच्चों को कैंसर जैसी घातक बीमारी का सामना करना पड़ता है, लेकिन इनकी किस्मत उनकी बीमारी से ज्यादा उनके देश की आर्थिक और स्वास्थ्य व्यवस्था तय कर रही है। समृद्ध देशों में जहां 10 में से 8 बच्चे कैंसर को मात दे देते हैं, वहीं कमजोर और मध्यम आय वाले देशों में इलाज की कमी हर साल करीब 75 हजार बच्चों की जान ले रही है। यह सिर्फ चिकित्सा संकट नहीं, बल्कि वैश्विक असमानता का सबसे मार्मिक चेहरा है।
वैश्विक आंकड़े बताते हैं कि बच्चों में कैंसर से बचने की औसत दर केवल 37 फीसदी है, जबकि उच्च आय वाले देशों में यह दर 80 फीसदी या उससे अधिक तक पहुंच जाती है। यानी एक ही उम्र, एक ही बीमारी, लेकिन देश बदलते ही जीवन बचने की संभावना तीन गुना तक बदल जाती है। यह फर्क दवाओं या तकनीक का नहीं बल्कि समय पर पहचान, इलाज की उपलब्धता और स्वास्थ्य ढांचे का है। अध्ययन साफ संकेत देता है कि बच्चों की मौत की वजह केवल बीमारी नहीं, बल्कि इलाज तक सीमित पहुंच और कमजोर स्वास्थ्य व्यवस्थाएं हैं। इंटरनेशनल एजेंसी फॉर रिसर्च ऑन कैंसर (आईएआरसी) के आंकड़ों पर आधारित अध्ययन के मुताबिक प्यूर्टो रिको में केंद्रीय तंत्रिका तंत्र के ट्यूमर से पीड़ित करीब 80 फीसदी बच्चे बीमारी का पता चलने के तीन साल बाद तक जीवित रहते हैं। इसके बाद इनमें से अधिकतर लंबी जिंदगी जीते हैं।
ल्यूकेमिया में और गहरी खाई
ल्यूकेमिया के मामलों में यह असमानता और भी भयावह रूप ले लेती है। केन्या में जहां केवल 30 फीसदी बच्चे निदान के तीन साल बाद तक जीवित रह पाते हैं, वहीं प्यूर्टो रिको में यह दर 90 फीसदी तक पहुंच जाती है। यानी देश बदलते ही जीवन और मृत्यु की रेखा खिंच जाती है।
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सबसे ज्यादा मामले यूरोप में मौत सबसे अधिक अफ्रीका-एशिया में
अध्ययन बताता है कि बच्चों में कैंसर के ज्यादा मामले यूरोप और उत्तरी अमेरिका में दर्ज होते हैं, लेकिन सबसे अधिक मौतें अफ्रीका, एशिया और दक्षिण अमेरिका में होती हैं। 23 देशों के करीब 17 हजार बच्चों के आंकड़ों से स्पष्ट है कि बचपन का कैंसर अब सिर्फ स्वास्थ्य समस्या नहीं, बल्कि विकास, नीति और सामाजिक न्याय की गंभीर चुनौती बन चुका है।
ये भी पढ़ें: ICMR: कोरोना टीकाकरण से नहीं...इस वजह हो रहीं अचानक मौतें, आईसीएमआर के अध्ययन में बड़ा खुलासा
देर से पहचान और अधूरा इलाज
विशेषज्ञों के अनुसार कमजोर व मध्यम आय देशों में कैंसर की पहचान अक्सर देर से होती है। इलाज के साधन सीमित होते हैं, इलाज की गुणवत्ता कमजोर रहती है और कई बार आर्थिक संकट से इलाज बीच में ही छोड़ दिया जाता है।
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वैश्विक आंकड़े बताते हैं कि बच्चों में कैंसर से बचने की औसत दर केवल 37 फीसदी है, जबकि उच्च आय वाले देशों में यह दर 80 फीसदी या उससे अधिक तक पहुंच जाती है। यानी एक ही उम्र, एक ही बीमारी, लेकिन देश बदलते ही जीवन बचने की संभावना तीन गुना तक बदल जाती है। यह फर्क दवाओं या तकनीक का नहीं बल्कि समय पर पहचान, इलाज की उपलब्धता और स्वास्थ्य ढांचे का है। अध्ययन साफ संकेत देता है कि बच्चों की मौत की वजह केवल बीमारी नहीं, बल्कि इलाज तक सीमित पहुंच और कमजोर स्वास्थ्य व्यवस्थाएं हैं। इंटरनेशनल एजेंसी फॉर रिसर्च ऑन कैंसर (आईएआरसी) के आंकड़ों पर आधारित अध्ययन के मुताबिक प्यूर्टो रिको में केंद्रीय तंत्रिका तंत्र के ट्यूमर से पीड़ित करीब 80 फीसदी बच्चे बीमारी का पता चलने के तीन साल बाद तक जीवित रहते हैं। इसके बाद इनमें से अधिकतर लंबी जिंदगी जीते हैं।
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ल्यूकेमिया में और गहरी खाई
ल्यूकेमिया के मामलों में यह असमानता और भी भयावह रूप ले लेती है। केन्या में जहां केवल 30 फीसदी बच्चे निदान के तीन साल बाद तक जीवित रह पाते हैं, वहीं प्यूर्टो रिको में यह दर 90 फीसदी तक पहुंच जाती है। यानी देश बदलते ही जीवन और मृत्यु की रेखा खिंच जाती है।
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सबसे ज्यादा मामले यूरोप में मौत सबसे अधिक अफ्रीका-एशिया में
अध्ययन बताता है कि बच्चों में कैंसर के ज्यादा मामले यूरोप और उत्तरी अमेरिका में दर्ज होते हैं, लेकिन सबसे अधिक मौतें अफ्रीका, एशिया और दक्षिण अमेरिका में होती हैं। 23 देशों के करीब 17 हजार बच्चों के आंकड़ों से स्पष्ट है कि बचपन का कैंसर अब सिर्फ स्वास्थ्य समस्या नहीं, बल्कि विकास, नीति और सामाजिक न्याय की गंभीर चुनौती बन चुका है।
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देर से पहचान और अधूरा इलाज
विशेषज्ञों के अनुसार कमजोर व मध्यम आय देशों में कैंसर की पहचान अक्सर देर से होती है। इलाज के साधन सीमित होते हैं, इलाज की गुणवत्ता कमजोर रहती है और कई बार आर्थिक संकट से इलाज बीच में ही छोड़ दिया जाता है।