जासूसी की चिंताएं दरकिनार कर पाकिस्तान ने Huawei को दी पूरी छूट, बिछा रही है हाई स्पीड इंटरनेट केबल
इस परियोजना पर आ रहे खर्च का 15 फीसदी खर्च पाकिस्तान उठा रहा है। परियोजना के तहत कुल 2,950 किलोमीटर की दूरी तक केबल बिछाया जाएगा। इसमें 850 किलोमीटर क्षेत्र पाकिस्तान में है...
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चीन की प्रसिद्ध आईटी कंपनी हुवावे चीन की बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव (बीआरआई) परियोजना के तहत पाकिस्तान में एक सीमा से दूसरी सीमा तक फाइबर केबल का जाल बिछा रही है। इस परियोजना को ‘डिजिटल सिल्क रोड’ कहा जा रहा है। ‘डिजिटल सिल्क रोड’ के तहत पाकिस्तान से यूरोप होते हुए ईस्ट अफ्रीका तक अरब सागर के अंदर केबल बिछाने का काम चल रहा है। इस केबल लाइन से बीआरआई में शामिल देशों को तीव्र गति वाले इंटरनेट की सेवा मिलेगी। हांगकांग की वेबसाइट एशिया टाइम्स की एक रिपोर्ट के मुताबिक फिलहाल रावलपिंडी से कराची और ग्वादार बंदरगाह तक केबल बिछाने का काम चल रहा है। समुद्र के अंदर केबल बिछाने का काम मार्च में शुरू होने की संभावना है।
विशेषज्ञों के मुताबिक ये योजना चीन और पाकिस्तान दोनों के लिए फायदेमंद है। चीन इसके जरिए ‘वैश्विक कनेक्टिविटी’ यानी पूरी दुनिया को जोड़ने की अपनी घोषित महत्वाकांक्षा को पूरा करने की दिशा में आगे बढ़ रहा है। दूसरी तरफ पाकिस्तान को इससे आधुनिक संचार ढांचा मिलेगा, जिस मामले में अभी तक वह खासा पिछड़ा हुआ है। इससे इंटरनेट सेवाओं के लिए पाकिस्तान की भारत पर निर्भरता भी घटेगी।
एशिया टाइम्स के मुताबिक हुवावे कंपनी की देखरेख में बन रहे इस संचार ढांचे से पाकिस्तान को अधिक भरोसमंद और तेज रफ्तार की इंटरनेट सेवा मिलेगी। साथ ही चीन इसके जरिए उसे अपने देश के अंदर और पास-पड़ोस की निगरानी करने में भी पाकिस्तान को मदद देगा। हुवावे कंपनी पर अमेरिका ने आरोप लगा रखा है कि उसके इंफ्रास्ट्रक्चर के जरिए चीन को जासूसी करने में मदद मिलती है। हालांकि हुवावे कंपनी ने इस आरोप का कई बार पुरजोर खंडन किया है।
जासूसी की ऐसी की आशंकाओं के कारण पाकिस्तान में साइबर विशेषज्ञों ने इस परियोजना को लेकर सवाल उठाए हैं। उन्होंने इस पर नाराजगी जताई है कि पाकिस्तान की संसद में इस परियोजना के गुण-दोष पर पूरी चर्चा नहीं हुई। उनके मुताबिक परियोजना को हरी झंडी देने के पहले चीन से इस बात की वैधानिक गारंटी मांगी जानी चाहिए थी कि वह इस परियोजना का इस्तेमाल साइबर-निगरानी के लिए नहीं करेगा। इन विशेषज्ञों के मुताबिक चीन में इंटरनेट निगरानी का जो मॉडल है, उसका पूरा जायजा ले पाने में पाकिस्तान की सरकार नाकाम रही है।
इस परियोजना पर आ रहे खर्च का 85 फीसदी हिस्सा एक्जिम बैंक और चाइना से मिले रियायती कर्ज से पूरा किया जा रहा है। बाकी 15 फीसदी खर्च पाकिस्तान उठा रहा है। इस परियोजना के तहत कुल 2,950 किलोमीटर की दूरी तक केबल बिछाया जाएगा। इसमें 850 किलोमीटर क्षेत्र पाकिस्तान में है। पाकिस्तान में इसका प्रवेश चीन के शिनजियांग प्रांत से लगी पाकिस्तान की सीमा पर स्थित खुनजेराबा दर्रे से हुआ है। यह स्थान लगभग 4,500 मीटर की ऊंचाई पर है। यह केबल लाइन गिलगिट-बाल्तिस्तान, रावलपिंडी और बलूचिस्तान स्थित ग्वादार पोर्ट से होते हुए कराची तक जाएगी।
प्रोजेक्ट के पहले चरण में खुनजेराब दर्रे से रावलपिंडी तक केबल बिछाने का काम पूरा हो गया है। इसका कारोबारी इस्तेमाल भी शुरू हो चुका है। दूसरे चरण में ये लाइन ग्वादार तक पहुंचेगी। यहां परियोजना के तहत समुद्र में पानी के अंदर एक केबल लैंडिंग स्टेशन बनाया जाएगा। अभी तक पाकिस्तान में ऐसा स्टेशन सिर्फ कराची में है। इसलिए एक वैकल्पिक स्टेशन ग्वादार में भी बनाया जाएगा, ताकि किसी आपातकालीन स्थिति में संचार का पूरा ढांचा ठप ना हो जाए। ग्वादार स्टेशन का दायरा 10 हजार वर्ग किलोमीटर के क्षेत्र तक फैला होगा। इसे बनाने का मकसद ‘पाकिस्तान में अंतरराष्ट्रीय संचार नेटवर्क की सुरक्षा’ सुनिश्चित करना बताया गया है।
हुवावे कंपनी के पास इस परियोजना से संबंधित खरीदारी, इंजीनियरिंग और निर्माण का पूरा ठेका है। पाकिस्तान के संचार उपकरण बाजार का पहले से ही 45 फीसदी हिस्सा हुवावे के नियंत्रण में है। जाहिर है, पाकिस्तान ने इस कंपनी पर जासूसी के आरोपों पर बिल्कुल ध्यान नहीं दिया है। उसने देश में 5जी इंटरनेट नेटवर्क बनाने के लिए इस कंपनी को पूरी छूट दे रखी है। एशिया टाइम्स के मुताबिक चीनी परियोजना के तहत समुद्र के नीचे केबल बिछाने के लिए इस समय जितना काम चल रहा है, उसका 90 फीसदी ठेका हुवावे कंपनी के पास ही है। जानकारों का कहना है कि जब ये परियोजना पूरी होगी, तब पाकिस्तान एशिया, यूरोप और अफ्रीका को जोड़ने की इस डिजिटल सिल्क रोड परियोजना में पाकिस्तान एक महत्वपूर्ण संपर्क स्थल बन जाएगा।