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ड्रैगन से चौकस हैं पश्चिमी देश: चीन की ‘पनडुब्बी डिप्लोमेसी’ पर जर्मनी ने फिलहाल लगाया विराम!

Tue, 15 Feb 2022 07:14 PM IST
Harendra Chaudhary वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला, बीजिंग
वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला, बीजिंग Published by: Harendra Chaudhary Updated Tue, 15 Feb 2022 07:14 PM IST
सार

चीन ने जिन देशों के साथ नौसैनिक संबंध कायम किए हैं, उनमें कंबोडिया, म्यांमार, श्रीलंका, बांग्लादेश, पाकिस्तान, और थाईलैंड शामिल हैं। थाईलैंड ने पनडुब्बी के लिए चीन के साथ समझौता 2015 में किया था। थाईलैंड का कहना है कि चीनी पनडुब्बियों से उसे अपने पड़ोसी देशों के बराबर ताकत बनाए रखने में मदद मिलेगी...

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Germany has refused to give engines to China that were used in submarine given by China to Thailand as part of submarine diplomacy
चीनी पनडुब्बी - फोटो : Agency (File Photo)

विस्तार

थाईलैंड का पनडुब्बी खरीदारी के लिए चीन से हुआ समझौता खटाई में पड़ गया दिखता है। इसका मुख्य कारण जर्मनी का उन इंजनों को चीन को देने से इनकार कर देना है, जिन्हें थाईलैंड को दी जाने वाली पनडुब्बियों में लगाया जाना था। खबरों के मुताबिक हाल के वर्षों में पश्चिमी देशों के साथ चीन के बढ़े टकराव को देखते हुए जर्मनी ने इंजन न देने का फैसल किया है। पश्चिमी देशों में राय बनी है कि चीन ‘पनडुब्बी कूटनीति’ के जरिए अपना प्रभाव बढ़ाने की कोशिश में जुटा हुआ है। पश्चिमी देशों ने अब इस पर रोक लगाने की ठान ली है।

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जानकारों के मुताबिक चीन की मंशा को लेकर पश्चिमी देशों के कान सबसे पहले 2017 में खड़े हुए, जब चीन ने अफ्रीका के जिबुती में अपना नौसैनिक अड्डा बनाया। बाद में सामने आया कि चीन दूसरे क्षेत्रों में भी पनडुब्बियां सप्लाई कर अपने नौसैनिक प्रभाव को बढ़ाने में जुटा हुआ है। इन क्षेत्रों में एशिया-प्रशांत भी है। पश्चिमी विश्लेषकों का आकलन है कि अगर चीन को अपना असर बढ़ाने दिया गया, तो उसका लाभ उसे अमेरिका या भारत से टकराव की स्थिति में मिलेगा।

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कई देशों को दीं पनडुब्बियां

चीन ने जिन देशों के साथ नौसैनिक संबंध कायम किए हैं, उनमें कंबोडिया, म्यांमार, श्रीलंका, बांग्लादेश, पाकिस्तान, और थाईलैंड शामिल हैँ। थाईलैंड ने पनडुब्बी के लिए चीन के साथ समझौता 2015 में किया था। थाईलैंड का कहना है कि चीनी पनडुब्बियों से उसे अपने पड़ोसी देशों के बराबर ताकत बनाए रखने में मदद मिलेगी। थाई टीकाकारों ने ध्यान दिलाया है कि वियतनाम, इंडोनेशिया, मलेशिया आदि जैसे देश पनडुब्बी हासिल कर चुके हैं।

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जबकि चीन के साथ हुए करार का विरोध करने वाले विशेषज्ञों ने कहा था कि थाईलैंड की खाड़ी पनडुब्बी रखने योग्य नहीं है। उसकी औसत गहराई सिर्फ 58 मीटर है। खाड़ी में अधिकतम गहराई 85 मीटर ही है। इस रूप में थाईलैंड की खाड़ी बहुत संकरी है, जहां मौजूद पनडुब्बियों की दुश्मन तुरंत पहचान कर सकता है। आलोचकों का कहना है कि अगर चीन ने थाईलैंड को पनडुब्बी सप्लाई की, तो उसका मतलब होगा कि पनडुब्बियों की देखरेख के लिए वहां चीनी विशेषज्ञ भी तैनात होंगे। ऐसा कम से कम तब तक होगा, जब तक थाई कर्मियों को देखरेख के लिए पूरा प्रशिक्षित नहीं कर दिया जाता।

चीन दे रहा है ट्रेनिंग

खबरों के मुताबिक थाई कर्मियों की कुछ ट्रेनिंग अभी चीन में चल रही है। एक नौसेना के एक पर्यवेक्षक ने वेबसाइट एशिया टाइम्स से कहा- ‘चीन शाही थाई नौसेना के कर्मियों को पनडुब्बियों कि इस्तेमाल के बारे में प्रशिक्षण दे रहा है। ट्रेनिंग लेने चीन गए जूनियर अफसर वहां चीनी भाषा भी सीख रहे हैं।’ खबरों में बताया गया है कि चीनी नौसेना के बेड़ा कमांडर रियर एडमिरल शेन हाओ ने अक्तूबर 2017 में थाईलैंड की यात्रा की थी। वहां उन्होंने 800 अधिकारियों और जवानों की ट्रेनिंग का निरीक्षण किया था।



लेकिन अब ताजा रिपोर्टों में बताया गया है कि जर्मनी के इंजन देने से इनकार कर देने के कारण ये सारी योजना बाधित हो गई है। चीन के सामने अब क्या विकल्प हैं, इस बारे में अभी सूचना नहीं है। लेकिन माना जा रहा है कि चीन तय समय पर अब पनडुब्बियों की सप्लाई नहीं कर पाएगा।

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