जर्मनी को अधर में लटका गया आम चुनाव: नई सरकार बनने में लग सकता है लंबा वक्त, मैर्केल संभालती रहेंगी सत्ता
विश्लेषकों की राय है कि शुरुआती सौदेबाजी के बाद एक बार फिर से एसपीडी और अंगेला मैर्केल की क्रिश्चियन डेमोक्रेटिक यूनियन (सीडीयू) की मिली-जुली सरकार देश में बन सकती है। उस रूप में नीतियों में कोई परिवर्तन नहीं होगा। सिर्फ यह बदलाव होगा कि इस बार चांसलर का पद एसपीडी के नेता ओलाफ शोल्ज को मिल जाएगा...
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जर्मनी में रविवार को हुए आम चुनाव से कोई साफ जनादेश नहीं उभरा। चुनाव पूर्व सर्वेक्षणों में लगाए अनुमान के मुताबिक सोशल डेमोक्रेटिक पार्टी (एसपीडी) जरूर सबसे बड़ी पार्टी के रूप में उभरी, लेकिन उसे या उसके संभावित गठबंधन सहयोगियों को इतनी सीटें नहीं मिलीं, जिससे वह जल्द देश में नई सरकार बना पाए। इसलिए पर्यवेक्षकों ने कहा है कि अगली सरकार बनने में लंबा समय लग सकता है। तब तक अंगेला मैर्केल को भी देश सत्ता संभालनी होगी।
चुनाव नतीजों से यह साफ संकेत जरूर मिला है कि जर्मनी की सत्ता मध्यमार्गी ताकतों के हाथ में ही रहेगी। इस चुनाव में धुर दक्षिणपंथी पार्टी ऑल्टरनेटिव फॉर ड्यूशलैंड (एएफडी) और धुर वामपंथी पार्टी डाय लिंके को नुकसान हुआ है। जबकि एसपीडी, ग्रीन पार्ट और मुक्त बाजार की समर्थक फ्री डेमोक्रेटिक पार्टी (एफपीडी) को लाभ हुआ है। डाय लिंके की सीटें घट जाने के कारण पहले जताई गई ये संभावना कमजोर पड़ गई है कि एसपीडी, ग्रीन पार्टी, और डाय लिंके मिल कर वामपंथी रूझान वाली सरकार बना लेंगी।
कुछ विश्लेषकों की राय है कि शुरुआती सौदेबाजी के बाद एक बार फिर से एसपीडी और अंगेला मैर्केल की क्रिश्चियन डेमोक्रेटिक यूनियन (सीडीयू) की मिली-जुली सरकार देश में बन सकती है। उस रूप में नीतियों में कोई परिवर्तन नहीं होगा। सिर्फ यह बदलाव होगा कि इस बार चांसलर का पद एसपीडी के नेता ओलाफ शोल्ज को मिल जाएगा। पिछले 12 साल से जर्मनी में इन दोनों पार्टियों की साझा सरकार रही है। अंगेला मैर्केल की निवर्तमान सरकार में शोल्ज वित्त मंत्री थे।
सीडीयू को इस बार 1949 के बाद का सबसे खराब चुनावी नतीजे का मुंह देखना पड़ा है। लेकिन उसके नेता अरमिन लैशेट ने चांसलर पद पर अपना दावा नहीं छोड़ा है। वेबसाइट पॉलिटिको.ईयू की एक रिपोर्ट के मुताबिक दूसरे विश्व युद्ध के बाद जर्मनी में ऐसी कई मिसालें हैं, जब सरकार चुनाव में दूसरे नंबर पर रही पार्टी के नेतृत्व में बनी। ऐसा सबसे पहले 1969 में हुआ था, जब सीडीयू 3.5 फीसदी वोटों के अंतर से आगे रही, लेकिन एसपीडी के नेता बिली ब्रांट ने एफडीपी से मिल कर सरकार बना ली। इस बार सीडीयू पर एसपीडी की बढ़त सिर्फ 1.6 फीसदी वोट की है।
पर्यवेक्षकों के मुताबिक एक विकल्प यह है कि एसपीडी ग्रीन पार्टी और एफडीपी के साथ मिल कर सरकार बनाए। लेकिन ग्रीन पार्टी और एफडीपी की नीतियां एक दूसरे के खिलाफ हैं। ऐसे में उस तरह के गठबंधन की संभावना टेढ़ी खीर साबित होगा। ग्रीन पार्टी के नेता रॉबर्ट हेबेक ने चुनाव नतीजों के एलान के बाद कहा- ‘हम ऐसा गठबंधन चाहते हैं, जो आगे की चुनौतियों का मुकाबला कर सके।’
ग्रीन पार्टी की तरफ से अनालीना बेयरबॉक इस चुनाव में चांसलर पद के उम्मीदवार के रूप में मैदान में उतरी थीं। नतीजों के एलान के बाद उन्होंने कहा- ‘चाहे जो भी समीकरण बनें, ग्रीन पार्टी अपनी इस मांग से पीछे नहीं हटेगी कि जलवायु परिवर्तन के मुकाबले को राजनीतिक एजेंडे में सबसे ऊपर रखा जाए।’ उन्होंने कहा- ‘राजनीति कोई बाजार नहीं है।’
हालांकि इस चुनाव में सबसे ज्यादा लाभ ग्रीन पार्टी को हुआ, लेकिन फ्री डेमोक्रेट्स के वोट भी इस चुनाव में बढ़े हैं। अब पार्टी ने कहा है- ‘अब बहुत आत्म निर्भर हैं। हमने दो अंकों में वोट प्रतिशत प्राप्त करने वाली पार्टियों में खुद को शामिल कर लिया है। अब हम मध्यमार्गी गठबंधन बनाने के क्रम में अपनी स्वतंत्रता का इस्तेमाल करेंगे।’ पर्यवेक्षकों ने ग्रीन पार्टी और एफडीपी के इन बयानों में मौजूद विरोध भाव की तरफ ध्यान खींचा है। उनका कहना है कि इसे देखते हुए एसपीडी या सीडीयू के लिए एक दूसरे को छोड़ कर कोई अलग गठबंधन बना लेना बेहद मुश्किल दिखता है।