Pakistan: क्या ऐसे होगा पाकिस्तानी सेना की शान में इजाफा? रिटायरमेंट से पहले जनरल बाजवा को याद आया यह फॉर्मूला
पाकिस्तान के सेना प्रमुख ने अपने रिटायरमेंट से एक दिन पहले कहा है कि पाकिस्तानी सेना ने अपनी भूमिका को अपने संवैधानिक अनिवार्य कार्य तक सीमित कर दिया है। हालांकि इसे कुछ लोगों द्वारा नकारात्मक रूप से देखा जा रहा है और इसकी आलोचना की जा रही है, लेकिन ये फैसला देश में लोकतांत्रिक संस्कृति को फिर से मजबूत करने में मददगार साबित होगा।
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विस्तार
पाकिस्तान के सेना प्रमुख जनरल कमर जावेद बाजवा कल यानी मंगलवार को तीन साल के सेवा विस्तार के बाद आखिरकार रिटायर हो जाएंगे। उनके उत्तराधिकारी के रूप में जनरल आसिम मुनीर के नाम का एलान पहले ही हो चुका है। कल एक कार्यक्रम में वे नए सेना प्रमुख जनरल आसिम मुनीर को अपना चार्ज दे देंगे। इससे पहले आज उन्होंने सेना की शान में इजाफा करने के लिए एक फार्मूला दिया है। दरअसल, जनरल बाजवा ने कहा कि देश के इतिहास में हमने पहली बार सेना और राजनीति में दूरी बनाने का निर्णय लिया है। मेरा मानना है कि सैन्य प्रतिष्ठान को ''अराजनीतिक'' रखने का उनका फैसला तख्तापलट की आशंका वाले पाकिस्तान में राजनीतिक उतार-चढ़ाव से के प्रभाव से सेना की रक्षा करेगा और सेना की शान में इजाफा करेगा।
कल होगें रिटायर
61 वर्षीय जनरल बाजवा तीन साल के विस्तार के बाद 29 नवंबर को सेवानिवृत्त होंगे। पाकिस्तान ने लेफ्टिनेंट जनरल असीम मुनीर को निवर्तमान जनरल बाजवा की जगह नया सेना प्रमुख नियुक्त किया है। उन्होंने कहा कि पाकिस्तानी सेना ने अपनी भूमिका को अपने संवैधानिक अनिवार्य कार्य तक सीमित कर दिया है। हालांकि इसे कुछ लोगों द्वारा नकारात्मक रूप से देखा जा रहा है और इसकी आलोचना की जा रही है, लेकिन ये फैसला देश में लोकतांत्रिक संस्कृति को फिर से मजबूत करने में मददगार साबित होगा। इसके अलावा, इसके चलते राज्य के सभी अंग प्रभावी ढंग से काम कर सकेंगे।
रिपोर्ट्स में उनके हवाले से कहा गया कि 'राष्ट्रीय निर्णय लेने में पाकिस्तानी सेना हमेशा एक प्रमुख खिलाड़ी रही है। देश की राजनीति में अपनी ऐतिहासिक भूमिका के कारण सेना को जनता और राजनेताओं की कड़ी आलोचना का सामना भी करना पड़ा।' ऐसे में देश के इतिहास में पहली बार लिया गया ये फैसला सेना की प्रतिष्ठा को बढ़ाने में मदद करेगा।
जनरल बाजवा ने कहा कि जब जनता को पता चला कि सेना राजनीतिक मामलों में हस्तक्षेप कर रही है तो सशस्त्र बलों के प्रति जनता का समर्थन और लगाव कम हुआ है। यही वजह है कि पिछले साल फरवरी में सेना ने काफी विचार-विमर्श के बाद फैसला किया कि वह कभी भी किसी भी राजनीतिक मामले में हस्तक्षेप नहीं करेगी। मैं आपको विश्वास दिलाता हूं कि हम इस पर सख्ती से कायम हैं और रहेंगे।
हमारी सेना की होती है आलोचना
इससे पहले बुधवार को सेना प्रमुख के तौर पर अपने अंतिम संबोधन में जनरल बाजवा ने कहा, दुनियाभार में सेनाओं की शायद ही कभी आलोचना की जाती है, लेकिन हमारी सेना की अक्सर आलोचना की जाती है। मुझे लगता है कि इसका कारण सेना की राजनीति में भागीदारी है। इसलिए फरवरी में सेना ने राजनीति में हस्तक्षेप न करने का फैसला किया। कई क्षेत्रों में सेना की आलोचना की और अनुचित भाषा का इस्तेमाल किया। सेना की आलोचना करना राजनीतिक दलों और लोगों का अधिकार है, लेकिन इस्तेमाल की जाने वाली भाषा में सावधानी बरतनी चाहिए।
बाजवा ने 1971 के युद्ध पर बोलकर खड़ा किया विवाद
निवर्तमान थल सेनाध्यक्ष (सीओएएस) जनरल कमर जावेद बाजवा ने बुधवार को यह कहकर विवाद खड़ा कर दिया था कि 1971 के युद्ध में केवल 34,000 पाक सैनिकों ने भारत के सामने आत्मसमर्पण किया था। उन्होंने कहा था कि पूर्वी पाकिस्तान संकट, एक सैन्य नहीं बल्कि एक राजनीतिक विफलता थी। लड़ने वाले सैनिकों की संख्या 92,000 नहीं थी, बल्कि केवल 34,000 थी, बाकी विभिन्न सरकारों से थे। सीओएएस ने कहा कि ये 34,000 लोग 2,50,000 भारतीय सेना के सैनिकों और 200,000 प्रशिक्षित मुक्ति बाहिनी का सामना कर रहे थे, लेकिन फिर भी सभी बाधाओं के बावजूद बहादुरी से लड़े।