Pakistan: संविधान में संशोधन को फजल-उर-रहमान की पार्टी का समर्थन नहीं, संसद में बिल पेश करने से पीछे हटी सरकार
संशोधन विधेयक पारित करने के लिए सरकार को संसद में 224 और सीनेट में 64 वोटों की जरूरत है। जबकि संसद में गठबंधन की ताकत 213 और सीनेट में 52 है। आठ संसद सदस्यों और पांच सीनेटरों के साथ जेयूआई-एफ प्रमुख भूमिका में है।
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पाकिस्तान में संविधान संशोधन विधेयक एक बार फिर संसद में पेश नहीं किया जा सका। सरकार में सहयोगी मौलाना फजल-उर-रहमान के राजनीतिक दल जमीयत उलेमा-ए-इस्लाम का समर्थन न मिलने से नवाज सरकार को बिल पेश करने से पीछे हटना पड़ा। हालांकि बिल में क्या संशोधन किया गया है, इसका सरकार ने खुलासा नहीं किया जा रहा है। माना जा रहा है कि बिल के जरिये सरकार जजों की सेवानिवृत्ति की उम्र बढ़ाने और सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश का कार्यकाल तय करने की योजना बना रही है।
सत्तारूढ़ पाकिस्तान मुस्लिम लीग-नवाज (पीएमएल-एन) के सीनेटर इरफान सिद्दीकी ने बताया कि संशोधन विधेयक संसद में पेश नहीं किया जाएगा। जब हम विधेयक को पेश करने के लिए पूरी तरह से तैयार होंगे, तब इसे सत्र में लाया जाएगा। बिल पेश करने में देरी के सवाल पर इरफान बोले कि बिल एक या दो सप्ताह के भीतर पेश किए जाने की संभावना है।
जमीयत उलेमा-ए-इस्लाम (जेयूआई-एफ) के प्रमुख मौलाना फजल-उर-रहमान का समर्थन न मिलने के चलते सरकार को संसद में संशोधन विधेयक पेश करने में देरी करने के लिए मजबूर होना पड़ा। दरअसल संशोधन विधेयक पारित करने के लिए सरकार को संसद में 224 और सीनेट में 64 वोटों की जरूरत है। जबकि संसद में गठबंधन की ताकत 213 और सीनेट में 52 है। आठ संसद सदस्यों और पांच सीनेटरों के साथ जेयूआई-एफ प्रमुख भूमिका में है। सरकार का दावा है कि अगर रहमान ने संशोधन का समर्थन किया, तो इसे दोनों सदनों में पारित कर दिया जाएगा क्योंकि सरकार ने पहले ही छोटे दलों का समर्थन जीत लिया है।
सिद्दीकी ने कहा कि प्रस्तावित कानूनों में से कुछ पर रहमान का मतभेद नहीं है। लेकिन उन्होंने बिल की समीक्षा की आवश्यकता पर बल दिया। सूत्र बताते हैं कि जेयूआई-एफ प्रमुख संशोधनों का समर्थन करते हैं लेकिन पूरे बिल का नहीं। वह चाहते हैं कि बिल में संशोधनों पर आम सहमति बनाने के लिए पीटीआई को भी बोर्ड में लिया जाना चाहिए।
इस बीच नेशनल असेंबली की बैठक में पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ पार्टी ने न्यायपालिका को कमजोर करने की कोशिश के लिए सरकार की कड़ी आलोचना की। पीटीआई नेता असद क़ैसर ने संसद को रबर स्टांप के रूप में इस्तेमाल करने की कड़ी निंदा की। उन्होंने दावा किया कि कानून मंत्री को भी प्रस्तावित मसौदे की जानकारी नहीं है, तो अगर सरकार के किसी प्रतिनिधि को नहीं पता, तो यह दस्तावेज़ कहां से आया है?
उन्होंने कहा कि पीटीआई न्यायिक सुधारों के पक्ष में है, लेकिन इस तरह के सुधार को बहस और चर्चा के बाद पेश किया जाना चाहिए। वहीं कानून मंत्री आज़म नज़ीर तरार ने कहा कि विधेयक को अभी तक संघीय कैबिनेट के समक्ष प्रस्तुत नहीं किया गया है। एक बार इसे संसद के समक्ष प्रस्तुत किया जाता है, तो इसके बारे में पता लगेगा। रक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ ने कहा कि यह कानून सांवधानिक असंतुलन को ठीक करने का एक प्रयास है। यह 19वें संशोधन को रद्द करने का एक प्रयास है। जिसमें उच्च न्यायालयों में नियुक्तियों के लिए एक नई प्रणाली की परिकल्पना की गई है।
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