नेपाल: प्रधानमंत्री देउबा ने दिया चेहरा बचाने का बहाना, मान गईं कम्युनिस्ट पार्टियां
बारह सूत्रीय ‘व्याख्यात्मक घोषणा’ में कहा गया कि एमसीसी की सहायता सिर्फ एक विकास संबंधी अनुदान है। यह देश के संविधान के ऊपर नहीं है और अगर इसका कोई प्रावधान संविधान के खिलाफ गया, तो नेपाल सरकार उसे रद्द कर देगी। इसमें कहा गया- ‘संविधान नेपाल का बुनियादी अधिनियम है। एमसीसी करार और अन्य सहयोगी समझौतों के ऊपर संविधान की वरीयता रहेगी।’
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नेपाल के सत्ताधारी गठबंधन में शामिल दोनों कम्युनिस्ट पार्टियों ने अमेरिकी संस्था मिलनियम चैलेंज कॉरपोरेशन (एमसीसी) की मदद लेने के सवाल पर महीनों तक खूब शोर मचाया। लेकिन जब निर्णायक वक्त आया, तो चेहरा बचाने का बहाना ढूंढ कर वे प्रधानमंत्री शेर बहादुर देउबा के पीछे चल पड़ीं। इस वजह से समयसीमा से एक दिन पहले यानी रविवार को इस मदद को लेने के लिए हुए करार के संसदीय अनुमोदन की प्रक्रिया पूरी हो गई। पांच दलों के सत्ताधारी गठबंधन ने इस पर एकजुट मतदान किया।
संसदीय अनुमोदन अंतरराष्ट्रीय खींचतान का मुद्दा बन गया था। अमेरिका और चीन दोनों ने इसमें दखल दिया। आखिरकार अमेरिकी दखल भारी पड़ा। इससे खुश काठमांडू स्थित अमेरिकी दूतावास ने एक बयान जारी कर नेपाल को अपना निकट सहयोगी बताया। यह भी कहा कि दोनों देशों के संबंध किसी एक करार से बंधे हुए नहीं हैं। जबकि पहले अमेरिका सरकार ने चेतावनी दी थी कि अगर देउबा सरकार ने एमसीसी की 50 करोड़ डॉलर की मदद स्वीकार नहीं की, तो वह नेपाल के साथ अपने द्विपक्षीय संबंधों पर पुनर्विचार करेगी। इस पर प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए चीन ने इसे अमेरिका की जोर-जबर्दस्ती वाली कूटनीति बताया था।
कई प्रावधान नेपाल के राष्ट्रीय हित के खिलाफ
नेपाली कांग्रेस के नेतृत्व वाले सत्ताधारी गठबंधन में शामिल नेपाल की कम्युनिस्ट पार्टी (माओइस्ट सेंटर) और नेपाल की कम्युनिस्ट पार्टी (यूनिफाइड सोशलिस्ट) ने पहले कहा था कि इस करार के कई प्रावधान नेपाल के राष्ट्रीय हित के खिलाफ हैं। इनकी वजह से नेपाल अमेरिका और चीन की चल रही होड़ में फंस जाएगा। नेपाली कांग्रेस ने इसका हल एक ‘व्याख्यात्मक घोषणा’ से निकाला। इस घोषणा को भी अनुमोदन प्रस्ताव के साथ ही संसद से पारित कराया गया।
बारह सूत्रीय ‘व्याख्यात्मक घोषणा’ में कहा गया कि एमसीसी की सहायता सिर्फ एक विकास संबंधी अनुदान है। यह देश के संविधान के ऊपर नहीं है और अगर इसका कोई प्रावधान संविधान के खिलाफ गया, तो नेपाल सरकार उसे रद्द कर देगी। इसमें कहा गया- ‘संविधान नेपाल का बुनियादी अधिनियम है। एमसीसी करार और अन्य सहयोगी समझौतों के ऊपर संविधान की वरीयता रहेगी।’ उसमें यह भी कहा गया कि नेपाल किसी वर्तमान या भावी अमेरिकी कानून या नीति का पालन नहीं करेगा।
अब अमेरिका पर निर्भर
इस प्रस्ताव को तैयार करने में शामिल रहे वकील गोविंद शर्मा बांदी ने मीडिया को बताया कि संसद से पारित व्याख्यात्मक प्रस्ताव को एमसीसी को भेजा जाएगा। उन्होंने कहा- अगर अमेरिका इसे स्वीकार करता है, तो एमसीसी करार के तहत परियोजनाओं को आगे बढ़ाया जाएगा। लेकिन अमेरिका ने अस्वीकार किया, तो करार को ठुकरा दिया जाएगा।
लेकिन विश्लेषकों का कहना कि इस प्रस्ताव में ऐसा कुछ नहीं है, जो अमेरिका को अस्वीकार्य हो। जो प्रक्रिया सत्ता पक्ष की तरफ से बताई गई है, वह माओइस्ट सेंटर और यूनिफाइड सोशलिस्ट पार्टियों की संतुष्टि के लिए है। इस प्रस्ताव के जरिए कम्युनिस्ट पार्टियों को एक बहाना दिया गया है, जिससे वे अपना चेहरा बचा सकें। वित्त मंत्री जनार्दन शर्मा ने कहा है कि व्याख्यात्मक प्रस्ताव उन लोगों को एक जवाब है, जो सड़कों पर प्रदर्शन कर रहे हैं। एमसीसी के खिलाफ प्रदर्शन रविवार को भी जारी रहे।