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एक्सप्लेनर: क्यों सिकुड़ रहा है चांद, मून मिशन के सामने क्या हैं चुनौतियां; अंतरिक्ष यात्रियों पर कितना खतरा?

Sun, 18 Oct 2026 06:09 AM IST
रिया दुबे स्पेशल डेस्क, अमर उजाला
स्पेशल डेस्क, अमर उजाला Published by: रिया दुबे Updated Sun, 18 Oct 2026 06:09 AM IST
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सार
चांद की सतह पर मिली हजारों दरारों ने वैज्ञानिकों का ध्यान खींचा है। आखिर क्यों सिकुड़ रहा है चंद्रमा और क्या वहां आने वाले भूकंप भविष्य के मून मिशन की राह मुश्किल बना सकते हैं? चंद्रमा पर इंसानों की मौजूदगी बढ़ाने की तैयारी के बीच जानिए, वैज्ञानिकों की नई स्टडी में क्या सामने आया और अंतरिक्ष यात्रियों के लिए कितनी बड़ी चुनौती हो सकती है।
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Explainer: Why Is the Moon Shrinking? What Risks Does It Pose to Future Missions and Astronauts?
अध्ययन में हुआ खुलासा - फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स

विस्तार

चंद्रमा जितना शांत दिखाई देता है, उसकी सतह के भीतर उतनी ही हलचल हो रही है। वैज्ञानिकों को चंद्रमा पर हजारों दरारें मिली हैं। ये दरारें उसके सिकुड़ने की कहानी बयां करती हैं। 



अब सवाल है कि आखिर चंद्रमा का आकार क्यों घट रहा है? क्या वहां भी भूकंप आते हैं? क्या यह बदलाव भविष्य में चंद्रमा पर उतरने वाले अंतरिक्ष यात्रियों के लिए मुश्किलें पैदा कर सकता है? 

कैसे किया गया अध्ययन?

चंद्रमा के सिकुड़ने से जुड़ा शोध 'चंद्रमा पर थ्रस्ट फॉल्ट बनना और सिकुड़ने का अंतिम चरण' 14 अक्तूबर को द प्लैनेटरी साइंस जर्नल में प्रकाशित हुआ।

इस अध्ययन में वैज्ञानिकों ने यह समझने की कोशिश की कि चंद्रमा की सतह पर दरारें क्यों बन रही हैं और इनके आधार पर उसके आकार में कितना बदलाव आया है। इसके लिए उन्होंने नासा के लूनर रिकॉनिसेंस ऑर्बिटर कैमरा से मिली तस्वीरों का विश्लेषण किया। यह कैमरा चंद्रमा की सतह की तस्वीरें लेकर वहां मौजूद पहाड़ों, दरारों और दूसरी संरचनाओं के बारे में जानकारी जुटाता है। अध्ययन में 17 वर्षों के दौरान जुटाई गई तस्वीरों और सतह से जुड़ी जानकारियों का इस्तेमाल किया गया।

चंद्रमा सिकुड़ क्यों रहा है?

चंद्रमा का जन्म करीब 4.5 अरब साल पहले हुआ था। वैज्ञानिकों का मानना है कि उस समय एक बड़ी वस्तु पृथ्वी से टकराई थी। इस टक्कर से निकला गर्म मलबा अंतरिक्ष में फैल गया। धीरे-धीरे यह मलबा एक साथ जुड़ा और चंद्रमा बना।

शुरुआत में चंद्रमा का अंदरूनी हिस्सा काफी गर्म था। तब से यह धीरे-धीरे ठंडा हो रहा है। अंदरूनी पदार्थ के ठंडा होने से उसका आकार घटता है। इसी प्रक्रिया के कारण चंद्रमा भी सिकुड़ रहा है।

नासा के मुताबिक, चंद्रमा के ठंडा होने और सिकुड़ने से उसकी ठोस बाहरी सतह पर दबाव पड़ता है। इससे चट्टानों में दरारें बन सकती हैं और सतह का एक हिस्सा दूसरे हिस्से के ऊपर खिसक सकता है। इसी प्रक्रिया से चंद्रमा पर छोटी चट्टानी दीवार जैसी संरचनाएं बनती हैं।

चंद्रमा का आकार कितना घटा?

अध्ययन के मुताबिक, पिछले करीब 40 करोड़ वर्षों में चंद्रमा की रेडियस में लगभग 42 से 46 मीटर की कमी आई है। 

वैज्ञानिकों ने अनुमान लगाया कि अगर पिछले 40 करोड़ वर्षों में सिकुड़ने की दर एक जैसी रही हो, तो चंद्रमा की रेडियस हर 10 लाख साल में अधिकतम करीब 11 सेंटीमीटर कम हुई होगी। यह लंबे समय के आधार पर लगाया गया अनुमान है। इसका मतलब यह नहीं है कि चंद्रमा हर साल एक समान गति से सिकुड़ रहा है।

चांद
चांद - फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स

चंद्रमा पर हजारों दरारें कैसे बनीं?

अध्ययन में वैज्ञानिकों ने चंद्रमा की सतह पर 10 हजार से ज्यादा नई दरारों का जिक्र किया है। अध्ययन में 8,900 से ज्यादा थ्रस्ट फॉल्ट स्कार्प्स यानी दबाव के कारण बनी चट्टानी दीवार जैसी संरचनाओं की भी पहचान की गई। ये आंकड़े चंद्रमा की सतह पर मौजूद दरारों और उनसे जुड़ी संरचनाओं को समझने में मदद करते हैं।

इन संरचनाओं से पता चलता है कि चंद्रमा की सतह पर दबाव के कारण बदलाव हो रहे हैं। इन्हें समझने के लिए वैज्ञानिकों ने उनकी लंबाई, ऊंचाई और फैलाव का अध्ययन किया। उन्होंने चंद्रमा के उन हिस्सों में मौजूद चट्टानी संरचनाओं को भी देखा, जहां कभी लावा फैला था। इन जानकारियों को मिलाकर उन्होंने चंद्रमा के आकार में हुए बदलाव का अनुमान लगाया।

इन दरारों से जुड़ी छोटी चट्टानी दीवारों को लोबेट स्कार्प कहा जाता है। वहीं, थ्रस्ट फॉल्ट ऐसी दरार होती है, जिसमें दबाव के कारण चट्टानों का एक हिस्सा दूसरे हिस्से के ऊपर खिसक जाता है। इससे चंद्रमा की सतह पर ऊंची दीवार या सीढ़ीनुमा ढलान जैसी संरचना बन सकती है।

क्या चंद्रमा पर भी आते हैं भूकंप?

हां, चंद्रमा पर आने वाले भूकंपों को मूनक्वेक कहा जाता है। नासा के मुताबिक, अपोलो मिशनों के दौरान अंतरिक्ष यात्रियों ने चंद्रमा की सतह पर भूकंप मापने वाले उपकरण लगाए थे। इन उपकरणों ने वहां होने वाली भूकंपीय गतिविधियां दर्ज की थीं।

चंद्रमा पर भूकंप आने के कई कारण हो सकते हैं। पृथ्वी के गुरुत्वाकर्षण के खिंचाव से चंद्रमा के अंदरूनी हिस्से में हलचल होती है। उल्कापिंडों के टकराने से भी कंपन पैदा हो सकता है। इसके अलावा, चंद्रमा के ठंडा होकर सिकुड़ने और सतह पर मौजूद चट्टानों में दबाव बढ़ने से भी भूकंप आ सकते हैं।

नासा के अनुसार, चंद्रमा के सिकुड़ने से आने वाले कुछ उथले मूनक्वेक रिक्टर पैमाने पर 5.5 तक की तीव्रता के हो सकते हैं। ये चंद्रमा की सतह से करीब 20 से 30 किलोमीटर नीचे आ सकते हैं और 10 मिनट से ज्यादा समय तक चल सकते हैं। तापमान में बदलाव के कारण चट्टानों के फैलने और सिकुड़ने से भी सतह के पास हलचल पैदा हो सकती है।

क्या कहते हैं आंकड़े?
क्या कहते हैं आंकड़े? - फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स

दरारों और मूनक्वेक के बीच क्या संबंध है?

वैज्ञानिकों ने चंद्रमा की दरारों और भूकंपीय गतिविधियों के बीच संबंध की संभावना पर चर्चा की है। शोधकर्ताओं ने पाया कि पहले दर्ज किए गए कुछ उथले मूनक्वेक के केंद्र इन दरारों के आसपास थे। इससे संभावना जताई गई कि चंद्रमा की कुछ दरारें आज भी सक्रिय हो सकती हैं।

दरारों के पास चट्टानों के खिसकने से जमीन में कंपन पैदा हो सकता है। इस हलचल से वहां मौजूद ढीली मिट्टी और पत्थर भी ढलानों से नीचे खिसक सकते हैं। हालांकि, हर दरार के सक्रिय होने या हर भूकंप के इन्हीं दरारों के कारण आने की पुष्टि नहीं हुई है।

पृथ्वी और चंद्रमा के भूकंपों में क्या अंतर है?

पृथ्वी पर करीब 90 फीसदी भूकंपीय गतिविधियां लिथोस्फेरिक प्लेटों की सीमाओं के आसपास होती हैं। पृथ्वी की बाहरी कठोर परत कई प्लेटों में बंटी हुई है। ये प्लेटें एक-दूसरे के सापेक्ष गति करती हैं, जिससे कई जगह भूकंप आते हैं।

इसके उलट, चंद्रमा एक ही प्रमुख कठोर प्लेट जैसा पिंड है। वहां पृथ्वी की तरह कई बड़ी प्लेटों की सीमाएं नहीं हैं। चंद्रमा के ठंडा होने और सिकुड़ने से उसकी सतह पर अलग-अलग जगह दरारें बन सकती हैं। इसलिए वहां भूकंपीय गतिविधि केवल किसी एक प्लेट की सीमा तक सीमित नहीं रहती। मूनक्वेक चंद्रमा की सतह के अलग-अलग हिस्सों में आ सकते हैं।

मूनक्वेक
मूनक्वेक - फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स

दक्षिणी ध्रुव पर दरारें क्यों बढ़ा सकती हैं चिंता?

चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव के पास कुछ दरारें नासा के प्रस्तावित आर्टेमिस-III मिशन के संभावित लैंडिंग क्षेत्रों के पास या उनके भीतर मौजूद हैं। इस क्षेत्र में पहले दर्ज किए गए एक शक्तिशाली उथले मूनक्वेक का संभावित केंद्र भी मौजूद है, हालांकि उसका सटीक स्थान निर्धारित नहीं हो पाया था।

वैज्ञानिकों के मुताबिक, इस क्षेत्र में भूकंपीय कंपन से ढलानों पर मौजूद ढीली मिट्टी और पत्थर खिसक सकते हैं। अगर ऐसा होता है, तो इससे अंतरिक्ष यात्रियों के उतरने, चंद्रमा की सतह पर चलने और भविष्य में वहां ठिकाने बनाने की योजनाओं पर असर पड़ सकता है। ढलानों पर मौजूद ढीली चट्टानों का खिसकना अंतरिक्ष यात्रियों और उनके उपकरणों के लिए चुनौती बन सकता है।

आर्टेमिस-III मिशन के संभावित लैंडिंग क्षेत्रों के पास दरारों की मौजूदगी का मतलब यह नहीं है कि वहां उतरना असुरक्षित है। वैज्ञानिकों को यह समझने की जरूरत है कि इन दरारों में से कौन-सी सक्रिय हो सकती हैं और भूकंपीय गतिविधियों का संभावित असर कितना होगा। इससे मिशन की योजना बनाते समय लैंडिंग साइट और वहां काम करने की परिस्थितियों का आकलन किया जा सकेगा।

क्या है खतरा?
क्या है खतरा? - फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स

भविष्य के अंतरिक्ष मिशनों के लिए यह जानकारी क्यों जरूरी है?

भविष्य में चंद्रमा पर अंतरिक्ष यात्रियों को भेजने और वहां लंबे समय तक रहने की योजनाएं बनाई जा रही हैं। इसके लिए ऐसी जगह चुनना जरूरी है, जहां भूकंपीय गतिविधि और जमीन खिसकने का खतरा कम हो।

चंद्रमा की सतह पर मौजूद दरारों, मूनक्वेक और ढलानों की स्थिति की जानकारी से लैंडिंग की जगह चुनने में मदद मिल सकती है। इससे भविष्य में वहां बनाए जाने वाले ठिकानों की सुरक्षा की योजना भी तैयार की जा सकती है।

नासा के मुताबिक, चंद्रमा पर भूकंपीय गतिविधियों को बेहतर तरीके से समझने के लिए और अधिक उपकरणों से जानकारी जुटाने की जरूरत है। इससे वैज्ञानिकों को यह पता लगाने में मदद मिलेगी कि चंद्रमा के किन हिस्सों में भूकंपीय गतिविधि हो सकती है और सतह पर मौजूद दरारें भविष्य के अभियानों को किस तरह प्रभावित कर सकती हैं।

क्या है नासा का मून बेस कार्यक्रम?

नासा का मून बेस कार्यक्रम चांद के दक्षिणी ध्रुव के पास इंसानों की लंबे समय तक मौजूदगी स्थापित करने की महत्वाकांक्षी योजना है। इसके तहत रोबोटिक और मानव मिशनों की मदद से धीरे-धीरे एक ऐसा ठिकाना तैयार किया जाएगा, जहां अंतरिक्ष यात्री रह सकेंगे, काम कर सकेंगे और वैज्ञानिक शोध कर सकेंगे। इसका उद्देश्य सिर्फ चांद पर पहुंचना नहीं, बल्कि वहां लंबे समय तक काम करने के लिए जरूरी बुनियादी ढांचा तैयार करना और आगे की बड़ी अंतरिक्ष यात्राओं के लिए रास्ता बनाना है। इस मिशन में नासा ने भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) को अपने मून बेस कार्यक्रम में शामिल होने का न्योता दिया है। 

क्या है इसरो का मून मिशन?

वहीं इसरो ने चंद्रयान-4 को 2027 के लिए योजनाबद्ध किया गया है। इसका लक्ष्य चांद पर उतरना, वहां से नमूने इकट्ठा करना और उन्हें पृथ्वी पर वापस लाना है।

इसके बाद चंद्रयान-5 यानी लुपेक्स मिशन की योजना है। इसका उद्देश्य चांद के दक्षिणी ध्रुव के पास हमेशा छाया में रहने वाले क्षेत्रों में पानी और दूसरे वाष्पशील पदार्थों का अध्ययन करना है। इससे भारत चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव और वहां मौजूद संसाधनों की खोज के अगले चरण में प्रवेश करेगा।

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