Exclusive: इस्राइली राजदूत बोले- ईरान को जवाब न देने का हमारे पास कोई विकल्प ही नहीं, कार्रवाई तो होगी
हमास ने इस्राइल पर 7 अक्तूबर 2023 को हमला कर दिया था। इसे इस्राइल के इतिहास में अब तक का सबसे बड़ा हमला माना गया। इसमें कई जानें गईं और कई लोगों को हमास ने बंधक बना लिया। हमास, हिजबुल्ला और ईरान के बारे में इस्राइल का क्या रुख है, यह जानने के लिए अमर उजाला ने इस्राइली राजदूत से बातचीत की।
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विस्तार
पश्चिम एशिया में तनाव का पारा लगातार ऊपर बना हुआ है। खासतौर पर 1 अक्तूबर को ईरान की तरफ से इस्राइल पर हुई मिसाइलों की बौछार ने तनाव को बढ़ाया ही है। इस्राइल जवाबी कार्रवाई पर आमादा है तो वहीं ईरान भी ताल ठोंक रहा है कि अगर कोई वार किया गया तो उसका पलटवार भरपूर होगा। ऐसे में पूरी दुनिया जहां ईरान और इस्राइल के टकराव पर फिक्र में है, वहीं भारत समेत कई मुल्क यह अपील कर रहे हैं कि बातचीत और कूटनीति के जरिए समाधान निकाला जाना चाहिए। इस्राइल पर 7 अक्तूबर 2023 को हमले के एक बरस बाद जंग का दायरा कहां तक फैल चुका है और इस तनाव का समाधान कैसे निकलेगा, इन्हीं सवालों के साथ अमर उजाला ने बात की भारत में इस्राइल के राजदूत रोवेन अजर से।
आपका यह ऑपरेशन कहां जाता हुआ नजर आ रहा है? क्योंकि दुनिया को इस बात का खतरा है कि यह तनाव एक क्षेत्रीय जंग और एक विश्वयुद्ध में भी बदल सकता है।
राजदूत अजर: हमने 7 अक्टूबर 2023 को आतंकी संगठन हमास की तरफ से हुए हमले के बाद लगातार यह कोशिश की है कि अपने ऑपरेशन को गाजा पट्टी तक सीमित रखें और आतंकी संगठन हमास को खत्म करें, लेकिन बिना किसी उकसावे के हिजबुल्ला ने हम पर हमला किया और फिर दूसरे ईरान समर्थित गुटों ने भी हमले किए। यमन में मौजूद हूती हों, लेबनान के हिजबुल्ला हों, इराक और सीरिया के शिया गुट हों, सब ईरान के इशारे पर इस्राइल पर वार कर रहे हैं। यह सारी कोशिश इस्राइल की घेराबंदी की है। जब हमने पहले हमास और फिर हिजबुल्लाह के खिलाफ कार्रवाई की तो ईरान ने सीधे हम पर हमला कर दिया। हालात को बिगाड़ने और तनाव को बढ़ाने की जिम्मेदारी ईरानी निजाम की है। लिहाजा इसका विरोध करना न केवल हमारा अधिकार है, बल्कि हमारी जिम्मेदारी भी है। खासतौर पर जिस तरह हम पर मिसाइल बौछार की गई वो अंतरराष्ट्रीय नियमों की खुली अवहेलना है।
इस्राइल पर अक्सर ज्यादतियों का आरोप लगता है। हिजबुल्ला ने कोई पहली बार तो वार नहीं किया है, लेकिन तनाव इतना नहीं बढ़ा था जितना आज है। इस्राइल ने तो अब जमीनी अभियान भी शुरू कर दिया है। ज्यादतियों के आरोपों पर आप क्या कहेंगे?
राजदूत अजर: हम बीते 11 महीनों से लगातार राजनयिक समाधान की कोशिश कर रहे थे। हम चाहते हैं कि संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद प्रस्ताव संख्या 1701 और 1559 लागू हो, जिसके मुताबिक हिजबुल्ला के सभी लड़ाकों को सीमावर्ती इलाका छोड़ना है। उन्हें लितानी नदी के उत्तर में ही रहना चाहिए। लेकिन हिजबुल्ला न केवल सीमा के इलाके में मौजूद है, बल्कि वो अपने सुरंग नेटवर्क, हथियार और लॉन्च पैड के जरिए इस्राइल पर हमले की तैयारी करता रहा है। अमेरिका, फ्रांस और अन्य देशों की तरफ से बढ़ाए गए शांति प्रस्ताव के नाकाम होने और हिजबुल्ला की तरफ से संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद प्रस्ताव लागू करने से इनकार करने के बाद ही इस्राइल ने ताकत का इस्तेमाल किया है। तनाव बढ़ाने के लिए हिजबुल्ला और ईरान जिम्मेदार हैं। हम चाहते हैं कि उत्तरी इस्राइल के जिन इलाकों से हमारे 70 हजार से अधिक लोगों को भय में घर छोड़ना पड़ा है। वो अपने घरों को लौट सकें। इसके लिए ही हम एक सीमित जमीनी अभियान चला रहे हैं। हम आतंकी हमले के खतरों को कम करना चाहते हैं और उस यूएन प्रस्ताव को लागू करवाना चाहते हैं, जिसे हिजबुल्ला नहीं मान रहा है।
इस्राइल अब तक कुछ गुटों के खिलाफ कार्रवाई करता रहा है, लेकिन ईरान के मिसाइल हमले के बाद दोनों तरफ से वार-पलटवार की बातें कही जा रही हैं। दो देशों के बीच अगर यह जंग हुई तो बेहद खतरनाक होगी। आपको नहीं लगता कि दुनिया इसके लिए ही चिंतित है?
राजदूत अजर: अक्सर लोग यहीं चूक करते हैं। ईरान लंबे समय से इन गुटों को संचालित करता रहा है। इन्हें धन से लेकर साधन और प्रशिक्षण तक की मदद देता रहा है। कई देशों के पास मौजूद हथियारों से ज्यादा खतरनाक हथियार इन गुटों को मुहैया कराए जा रहे हैं। यहां तक कि इनके उत्पादन की तकनीक भी दी जा रही है। यहां ईरान ही आक्रमणकारी है। कई सालों से वो इस्राइल के खिलाफ अपने इन गुटों को बढ़ा रहा है। अब जबकि इस्राइल ने इन कठपुतली गुटों को खत्म करने का अभियान चलाया है तो ईरान ने हम पर ही सीधा हमला कर दिया है। उन्होंने अप्रैल में भी ऐसा किया था और आपने भी देखा होगा कि हमारी प्रतिक्रिया कितनी सीमित थी। सवाल यह है कि क्या एक दमनकारी और कट्टरपंथी ईरानी निजाम को इस तरह मनमानी करने की मंजूरी दी जा सकती है? एक ऐसी सनकी सत्ता, जो अपने लोगों के लिए भी दमनकारी हो, उसे दूसरे मुल्कों को आतंकित करने की इजाजत मिल सकती है? क्या इस्राइल इस सबको चुपचाप देखता और सहता रहे? इन हालात को कतई स्वीकार नहीं किया जा सकता। यह स्थितियां केवल इस्राइल के लिए खतरा नहीं हैं, बल्कि पूरा क्षेत्र बड़ी नजदीक से इन्हें देख रहा है।
हाल ही में रिपोर्ट आईं कि इस्राइल ने सीरिया के हमाइम एयर बेस को निशाना बनाया, जहां कथित तौर पर रूसी सेना की मौजूदगी है। इस कार्रवाई को आप कैसे जायज साबित करेंगे?
राजदूत अजर: इस्राइल पिछले काफी समय से सीरिया में अभियान चलाता रहा है क्योंकि सीरिया में भी ईरान कई आतंकी गुटों को बढ़ाता रहा है। इस्राइल पर हमलों के लिए ईरान हजारों लड़ाकों की पूरी फौज खड़ी करता रहा है इसलिए इस्राइल भी इन गुटों के खिलाफ ऑपरेशन चलाता है। खासतौर पर हथियारों के डिपो, हिजबुल्ला और ईरानी रिवोल्यूशनरी गार्ड के ठिकानों को हम निशाना बनाते हैं, जो उस इलाके में सक्रिय हैं। हम जो कर रहे हैं, वो पूरी तरह जायज है। हम अपने बचाव में यह कार्रवाई कर रहे हैं। अगर हम पर हमला होगा तो हम भी जवाब देंगे। यह बिल्कुल साफ है और इसमें किसी को आश्चर्य नहीं होना चाहिए।
हाल ही में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की इस्राइल के पीएम बेंजामिन नेतन्याहू के साथ फोन पर बात हुई थी। आतंक के खिलाफ एकजुटता के साथ-साथ भारत ने मौजूदा तनाव कम करने के लिए बातचीत और कूटनीतिक कोशिशों का आग्रह किया है। क्या आपको लगता है कि बातचीत और शांति प्रयासों से संघर्ष विराम का रास्ता निकल रहा है?
राजदूत अजर: आखिर में तो इस समस्या का कूटनीतिक समाधान ही निकलेगा। हमने 2006 में भी देखा कि संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद का प्रस्ताव पारित हुआ, लेकिन अब उसे ही लागू करवाने में कठिनाई हो रही है। लोग कूटनीति की बात करते हैं, लेकिन यह भी देखना होगा कि ईरान, इस्राइल के साथ बातचीत को तैयार नहीं है। यहां तक कि इस्राइल को स्वीकार करने के लिए भी तैयार नहीं है, बल्कि उसने कसम खाई है इस्राइल को बर्बाद करने की। अगर एक देश दूसरे देश को बर्बाद करने की कसम खाएगा तो व्यवस्था कैसे चलेगी। अगर हम चाहते हैं कि कूटनीति से समाधान निकले तो हमें ईरान पर और अधिक दबाव डालना होगा। इसे राजनीतिक, कूटनीतिक दबाव, आर्थिक पाबंदियों के जरिए करना होगा। जरूरत पड़े तो सैन्य ताकत से भी दबाव बनाना होगा। ऐसे में, जब स्थिति इस्राइल पर हुए हमले जैसी हो, दूसरे देश उस तरह ना बर्ताव करें। हमें आक्रमणकारियों के आगे खड़े होना ही पड़ेगा।
मगर... यह बताइए कि इस्राइल अगर संयम दिखाते हुए ईरान पर जवाबी वार ना करे और अंतरराष्ट्रीय बिरादरी ईरान पर इस विवाद को आगे ना बढ़ने का दबाव बनाए बनाए तो क्या होगा? क्या यह विकल्प है आपके लिए?
राजदूत अजर: इसका मतलब होगा कि ईरान जब भी किसी देश पर हमला करना चाहे तो उसके पास अंतरराष्ट्रीय बिरादरी की एक खुली छूट होगी। हमने देखा कि ईरान ने कैसे सऊदी तेल उद्योग को बर्बाद किया। हम देख रहे हैं कि कैसे ईरान सीरिया को बर्बाद कर रहा है। इराक के लोगों पर भी कैसे तबाही थोपी जा रही है और लेबनान को कैसे अगवा किया गया और हम यमन में हूतियों के जरिए उनके आतंक को भी देख रहे हैं। इसीलिए इस्राइल का कहना है कि जवाबी कार्रवाई करना न केवल हमारा अधिकार है, बल्कि हमारा कर्तव्य भी है। ईरान को जवाब न देने का कोई विकल्प ही नहीं, कार्रवाई तो होगी।
इस्राइल पर हुए 7 अक्टूबर 2023 के हमले को एक साल हुआ। क्या आप यह कहने की स्थिति में हैं कि हमास का खतरा खत्म हो गया है। आखिर कितने बंधकों को आप छुड़वा पाए हैं?
राजदूत अजर: हमने गाजा पट्टी इलाके में मौजूद हमास की फौज को पूरी तरह से ध्वस्त किया, जिसकी 24 बटालियन थीं। हमने उनके सैन्य ढांचे को ध्वस्त किया है। साथ ही कई किलोमीटर सुरंगों का नेटवर्क भी तबाह किया है। आज गाजा पट्टी से इस्राइल पर मिसाइल और रॉकेट दागे जाने का कोई खतरा नहीं है। हम करीब 150 बंधकों को छुड़वाकर ला पाए हैं। वहीं हमारे 150 लोग अब भी हमास के कब्जे में हैं, जिनको छुड़वाने के लिए कोशिश जारी है। हम हमास पर अमेरिका समेत अपने दूसरे साथियों के साथ मिलकर दबाव बना रहे हैं कि वो रिहाई डील पर सहमत हो जाए। हालांकि, अभी तक वो इनकार कर रहे हैं। वो गाजा पट्टी में एक आतंकी गुट की तरह राज करना चाहते हैं। हथियारों का जखीरा जमा करना चाहते हैं ताकि इस्राइल पर वार करते रहें। हम इसकी कतई इजाजत नहीं दे सकते।
जल्द ही रूस के कजान में ब्रिक्स शिखर बैठक होने वाली है। इस बैठक में रूस, चीन के राष्ट्रपति के साथ-साथ भारत के प्रधानमंत्री और ईरान के राष्ट्रपति भी होंगे। एक रणीतिक सहयोगी के तौर पर भारत से आपकी क्या अपेक्षा होगी?
राजदूत अजर: मैं खुलकर कहूं तो ईरान के राष्ट्रपति का कोई असर नहीं है। वो केवल एक कठपुतली हैं, जिनको खमनेई ने चुनकर बैठा दिया। असली नेताओं को चुनाव लड़ने से भी रोक दिया गया। ईरान में सारे फैसले खमनेई ही करते हैं। इसलिए ब्रिक्स के मंच पर इस राष्ट्रपति के होने का कोई मतलब नहीं हैं।
इस्राइल के प्रधानमंत्री ने हाल ही में ईरान के लोगों के लिए फारसी में एक बयान जारी किया। क्या इस्राइल किसी सत्ता बदल के प्लान पर काम कर रहा है?
राजदूत अजर: हमारे पास ईरान में सत्ता बदल का कोई प्लान नहीं है। हमारे पास अपने पूरे क्षेत्र में किसी भी जगह सत्ता परिवर्तन का कोई प्लान नहीं है। हम दूसरे मुल्कों की राजनीति को तय नहीं करते। लेकिन यह समझना होगा कि ईरान के लोग इस मौजूदा सत्ता के खिलाफ हैं। वो इस्राइल के खिलाफ नहीं हैं, बल्कि दोस्ताना रिश्ते चाहते हैं। हमारे पास उनसे संवाद करने का अधिकार है। यह सत्ता जो उन्हें दबा रही है वो केवल एक कमजोर कवर है, जो देर-सवेर टूट ही जाएगा। यह बदलाव ईरान के लोगों की चाहत और ताकत से आएगा। हम सभी को उनका समर्थन करना चाहिए।
इस्राइल और फिलिस्तीन का विवाद 75 साल से अधिक पुराना है। इस विवाद के सुलझने की कोई सूरत नजर नहीं आती। बल्कि यह तो और उलझ रहा है। ऐसे में दो शांतिपूर्ण देश बन सकें इस्राइल और फलिस्तीन इसका फॉर्मूला कब और कैसे निकलेगा?
राजदूत अजर: इस रास्ते पर हमें पीछे इसलिए मुड़ना पड़ा क्योंकि फलिस्तीन के लोगों को चरमपंथी बना दिया गया। उन्हें सिखा दिया गया कि इस्राइल को अस्वीकर करना है। इस्राइल ही नहीं, किसी के भी साथ सह-अस्तित्व को अस्वीकार करना है। यह फासिस्ट विचारधारा उन्हें पड़ोसियों के साथ शांति से रहने से रोक रही है। हमने कई बार फलिस्तीन के लोगों के साथ संवाद और शांति कायम करने के प्रयास किए हैं। लेकिन कोई भी प्रयास तभी संभव होंगे, जब फलिस्तीन के लोग अपनी बेहतरी के लिए काम करने पर ध्यान दें, इस्राइल की बर्बादी पर नहीं।
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