लग्जमबर्ग पर टैक्स हैवेन के लगे आरोप से मुश्किल में यूरोपियन यूनियन

वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला, लग्जमबर्ग Published by: Harendra Chaudhary Updated Thu, 18 Feb 2021 05:43 PM IST

सार

लग्जमबर्ग एक टैक्स हैवेन है, जहां 55 हजार विदेशी कंपनियां रजिस्टर्ड हैं। उनकी कुल 6 खरब डॉलर की संपत्ति यहां जमा है। टैक्स हैवेन उन देशों को कहा जाता है, जहां दूसरे देशों की कंपनियां या धनी लोग कर बचाने के लिए अवैध ढंग से अपना धन जमा कराते हैँ...
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luxembourg - फोटो : Agency (File Photo)
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विस्तार

यूरोपीय देश लग्जमबर्ग अपने ऊपर टैक्स हैवेन होने के लगे आरोप से परेशान है। लग्जमबर्ग सरकार ने एक ताजा बयान में कहा है कि हाल में छपी कुछ रिपोर्टों में लग्जमबर्ग और वहां की अर्थव्यवस्था की जैसी छवि चित्रित की गई, उसका वह सिरे से खंडन करती है। इस बयान में कहा गया कि लग्जमबर्ग यूरोपियन यूनियन (ईयू) के और सभी अंतरराष्ट्रीय नियमों और पारदर्शिता मानकों का अनुपालन करता है।
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इस खंडन के बावजूद यूरोपीय मीडिया में लगातार इस खुलासे से जुड़े ब्योरों पर चर्चा हो रही है। लग्जमबर्ग यूरोप का छोटा सा देश है, जिसे आधिकारिक रूप से ग्रैंड डची ऑफ लग्जमबर्ग कहा जाता है। यह बेल्जियम, फ्रांस और जर्मनी से घिरा है। इसकी आबादी सवा छह लाख है। इसकी गिनती दुनिया के सबसे धनी देशों में होती है। इसके बारे में ताजा खुलासा ऑपेनलक्स नाम की एजेंसी ने किया। इस बारे में सबसे पहले विस्तृत रिपोर्ट फ्रांस के मशहूर अखबार ला मोंड ने छापी।


रिपोर्ट के मुताबिक लग्जमबर्ग एक टैक्स हैवेन है, जहां 55 हजार विदेशी कंपनियां रजिस्टर्ड हैं। उनकी कुल 6 खरब डॉलर की संपत्ति यहां जमा है। टैक्स हैवेन उन देशों को कहा जाता है, जहां दूसरे देशों की कंपनियां या धनी लोग कर बचाने के लिए अवैध ढंग से अपना धन जमा कराते हैँ। ला मोंड में छपी रिपोर्ट के मुताबिक लग्जमबर्ग में जिन कंपनियों ने अपना धन जमा करा रखा है, उनमें से 90 फीसदी के मालिक विदेशी अरबपति, बहुराष्ट्रीय कंपनियां, मशहूर खिलाड़ी, कलाकार, ऊंचे पदों पर बैठे राजनेता और शाही परिवारों के लोग हैं।

इस रिपोर्ट से यूरोपीय यूनियन भी कठघरे में खड़ा हुआ है। ईयू ने टैक्स हैवेन्स की जो सूची बना रखी है, उसमें लग्जमबर्ग का नाम नहीं है। ईयू ऐसे देश या प्रदेश को ब्लैकलिस्ट कर देता है, जहां टैक्स रेट बहुत कम हो या जहां टैक्स ना लगता हो। ऐसी जगहों पर बड़ी कंपनियां और धनी-मानी लोग इसलिए अपना धन जमा कराते हैं, ताकि उन्हें अपने देश में कर ना चुकाना पड़े। इस तरह ये अड्डे कर चोरी को बढ़ावा देते हैं। अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) के मुताबिक टैक्स हैवेन्स की वजह से दुनिया भर की सरकारों को हर साल 500 से 600 अरब डॉलर के कॉरपोरेट टैक्स का नुकसान होता है।

टैक्स धोखाधोड़ी और मनी लॉन्ड्रिंग रोकने के मकसद से ईयू ने उन देशों और प्रदेशों की सूची तैयार की थी, जो इस मामले में ईयू या अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं से सहयोग नहीं करते हैं। ऐसी पहली सूची को दिसंबर 2017 में मंजूरी दी गई थी। उस लिस्ट में टैक्स हैवेन शब्द का इस्तेमाल नहीं किया गया था। बल्कि उसे उन देशों की सूची कहा गया था, जो गलत कर सिस्टम अपनाते हैं, और जिनकी वजह से ईयू के सदस्य देशों को कॉरपोरेट टैक्स से हो सकने वाली आमदनी का नुकसान होता है। तब ईयू ने कहा था कि उसका मकसद किसी देश को शर्मिंदा करना नहीं, बल्कि उन्हें कर कानून और व्यवहार में सकारात्मक बदलाव के लिए प्रोत्साहित करना है।

लेकिन जानकारों का कहना है कि उस सूची की सबसे बड़ी खामी यह है कि उसमें सिर्फ गैर-ईयू देशों को शामिल किया गया। इस सूची में अमेरिकन सामोआ, एंगिला, बारबाडोस, फिजी, गुआम, पलाउ, पनामा, सामोआ, त्रिनिदाद और टोबैगो, यूएस वर्जिन आइलैंड्स, वनाउतू, और सेशेल्स के नाम शामिल किए गए थे। इसमें ईयू के पड़ोसी देशों स्विट्जरलैंड, सैन मारियो और अंडोरा को उन देशों की सूची में रखा गया, जो अब ईयू के साथ सहयोग कर रहे हैं और ईयू की तरफ मांगी गई वचनबद्धताओं पर अमल कर रहे हैं। टर्की, मोरक्को और ऑस्ट्रेलिया का नाम उन देशों की लिस्ट में रखा गया, जो सभी अंतरराष्ट्रीय कर नियमों का पालन नहीं करते, लेकिन जिन्होंने सुधार का वादा किया है।

लेकिन आलोचकों का कहना है कि ईयू ने कर चोरी रोकने की जो ऊंची महत्वाकांक्षाएं दिखाई हैं, उसकी लिस्ट उसके मुताबिक नहीं है। गैर-सरकारी संगठन ऑक्सफेम ने हाल में एक रिपोर्ट में कहा कि 2019 तक ईयू के पांच सदस्य देश साइप्रस, आयरलैंड, लग्जमबर्ग, माल्टा और नीदरलैंड्स से मिले आर्थिक संकेत बताते हैं कि वे टैक्स हैवेन जैसे हैं। इन देशों में विदेशी निवेश, बौद्धिक संपदा भुगतान, ब्याज और लाभांश के स्तर सामान्य से काफी ऊंचे हैं।

अब ऑपेनलक्स एजेंसी के अनुसंधान से कम से कम लग्जमबर्ग के बारे में ये बात एक हद तक पुष्ट हो गई है। ऑपेनलक्स ने विस्तार से उन तथ्यों का जिक्र किया है, जिनकी वजह से उसका कहना है कि लग्जमबर्ग को टैक्स हैवेन की श्रेणी में रखा जाना चाहिए। जाहिर है, इस रिपोर्ट ने ईयू के लिए भी बड़ी असहज स्थिति पैदा कर दी है।  

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