नकेल कसने की तैयारी: एल्गोरिथ्म कैसे काम करता है- यूरोप में सोशल मीडिया कंपनियों को ये बताना होगा
यूरोपीय आयोग ने जो नियम तैयार किए हैं, उतने सख्त नियम दुनिया के किसी और देश या इलाके में सोशल मीडिया कंपनियों पर लागू नहीं किए गए हैं। इन नियमों के तहत इन कंपनियों को अपने एल्गोरिथ्म की अंदरूनी कार्य-प्रणाली बतानी पड़ेगी
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यूरोपीय आयोग फेसबुक, गूगल और ट्विटर से यह कहने जा रहा है कि वे अपने एल्गोरिथ्म की जानकारी उसे दें। साथ ही, वे यह साबित करें कि उन्होंने झूठ के ऑनलाइन प्रसार को रोकने के क्या उपाय किए हैं। वेबसाइट पॉलिटिको.ईयू ने ये खबर दी है। इसके मुताबिक यूरोपीय आयोग ने इस मामले में नए नियम तैयार किए हैं। उनके मुताबिक बड़ी सोशल मीडिया कंपनियों के लिए यह बताना अनिवार्य हो जाएगा कि उन्होंने अपने माध्यम के जरिए गलत सूचना के प्रसार को रोकने लिए क्या उपाय किए हैं। उन्हें यह भी बताना होगा कि झूठ फैलाने वाले सोशल मीडिया एकाउंट्स को हटाने या उनकी पहुंच कम करने के लिए उन्होंने क्या कदम उठाए हैं। साथ ही ऑनलाइन मीडिया यूजर्स को डिजिटल विज्ञापनों से कैसे निशाना बनाया जाता है, इस बारे में इन कंपनियों को अधिक पारदर्शिता बरतनी होगी।
जानकारों ने कहा है कि यूरोपीय आयोग ने जो नियम तैयार किए हैं, उतने सख्त नियम दुनिया के किसी और देश या इलाके में सोशल मीडिया कंपनियों पर लागू नहीं किए गए हैं। इन नियमों के तहत इन कंपनियों को अपने एल्गोरिथ्म की अंदरूनी कार्य-प्रणाली बतानी पड़ेगी। एल्गोरिथ्म वे कोड होते हैं, जिनके जरिए ये कंपनियां किसी सोशल मीडिया पोस्ट को गाइड करती हैं। इनसे ही ये तय होता है कि कोई पोस्ट किस तरह के लोगों और कितने लोगों को दिखेगा। सोशल मीडिया पर नफरत भरी या झूठी सामग्रियों के प्रसार के लिए एल्गोरिथ्म को ही जिम्मेदार ठहराया जाता है।
वेबसाइट पॉलिटिको की रिपोर्ट में बताया गया है कि यूरोपीय आयोग ने दुष्प्रचार संबंधी अपनी संहिता को चुस्त बनाने के क्रम में ये नियम तैयार किए हैं। गौरतलब है कि 2018 में दुनिया की सबसे बड़ी सोशल मीडिया कंपनियों और यूरोपियन यूनियन (ईयू) के बीच एक समझौता हुआ था। उसी दिशा में और आगे बढ़ते हुए अब नई संहिता तैयार की गई है। यूरोपियन यूनियन क्षेत्र के लिए डिजिटल सर्विसेज एक्ट बनाने की तैयारी भी चल रही है। उसमें ऐसे प्रावधान शामिल किए गए हैं, जिनका मकसद ऑनलाइन माध्यमों के जरिए हानिकारक और गैर-कानूनी वस्तुओं की बिक्री को रोकना है।
जानकारों का कहना है कि नए नियमों और प्रस्तावित कानून के लागू हो जाने के बाद सोशल मीडिया कंपनियों पर शिकंजा कसने का एक पूरा ढांचा तैयार हो जाएगा। तब ये कंपनियां अपने ऑनलाइन सिस्टम की कमजोरियों के जायजे को सार्वजनिक करने के लिए मजबूर हो जाएंगी। डिजिटल सर्विसेज एक्ट में ऐसा प्रावधान शामिल किया जा रहा है, जिससे दुष्प्रचार रोकने के सोशल मीडिया कंपनियों के उपायों का ऑडिट बाहरी एजेंसी से कराना संभव हो जाएगा।
विश्लेषकों ने ध्यान दिलाया है कि जब नए नियमों का पालन तब तक स्वैच्छिक बना रहेगा, जब तक कि डिजिटल सर्विसेज एक्ट पारित नहीं हो जाता। इसके बावजूद सोशल मीडिया कंपनियों के लिए इनकी अनदेखी करना मुश्किल होगा। ऐसा करने का मतलब यह समझा जाएगा कि अपने माध्यम पर झूठ के प्रसार को रोकने में उनकी दिलचस्पी नहीं है। उस हाल में डिजिटल सर्विसेज एक्ट में दंड के और कठिन प्रावधान शामिल किए जा सकते हैं।
वेबसाइट पॉलिटिको के मुताबिक नए नियमों के बारे में सोशल मीडिया कंपनियों ने अभी कोई प्रतिक्रिया व्यक्त नहीं की है। लेकिन समझा जाता है कि बाहरी एजेंसी से ऑडिट या एल्गोरिथ्म की कार्य प्रणाली को सार्वजनिक करने के प्रस्तावों पर उन्हें गहरा एतराज है।