{"_id":"b0e7755c-20c3-11e2-bae0-d4ae52bc57c2","slug":"why-is-so-difficult-to-break-silence-on-sexual-abuse","type":"story","status":"publish","title_hn":"यौन शोषण पर चुप्पी तोड़ना इतना मुश्किल क्यों?","category":{"title":"Europe","title_hn":"यूरोप","slug":"europe"}}
यौन शोषण पर चुप्पी तोड़ना इतना मुश्किल क्यों?
बीबीसी हिन्दी
Updated Sun, 28 Oct 2012 11:22 AM IST
विज्ञापन
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
बच्चों के साथ होने वाला यौन दुर्व्यवहार एक कड़वा सच है जिससे पीड़ित व्यक्ति को इतना गहरा सदमा पहुंचता है कि असर दशकों तक बना रहता है।
विज्ञापन
इस तरह के बच्चे दोहरी पीड़ा बर्दाश्त करते हैं। न तो वो इस हादसे से उबर पाते हैं और न ही वो किसी से इस बारे में बात कर पाते हैं।
लेकिन, ये दोनों ही बातें आपस में जुड़ी हैं। यौन शोषण के बारे में ना बताना, शोषण की पीड़ा को तो बढ़ाता ही है साथ ही पीड़ित व्यक्ति को अवसादग्रस्त भी कर देता है।
विज्ञापन
पियर्स की उम्र उस समय 13 साल थी जब एक शिक्षक ने स्कूल में ही उनका पहली बार यौन शोषण किया था। घटना को तीन दशक से ज्यादा बीत चुके हैं और वो आज तक इससे उबर नहीं पाई हैं।
विज्ञापन
लगभग 45 साल की उम्र में पियर्स ने आत्महत्या करने की कोशिश की और बड़ी मुश्किल से इस स्थिति में आ पाईं जिसमें वो अपना दर्द दूसरों के साथ बांट सकें। आखिरकार वो पुलिस स्टेशन पहुंचीं जहां उन्होंने सारी कहानी बयां की।
वक्त और दर्द का नाता
बचपन में यौन शोषण का शिकार हुए लोगों की मदद के लिए एक संगठन चलाने वाले पेट सौंडर्स कहते हैं कि जैसे-जैसे समय बीतता जाता है, ऐसे लोगों के लिए अपना दर्द बयां करना सरल होता जाता है।
वो अपनी इस बात के समर्थन में एक अमरीकी शोध का हवाला देते हैं जिसमें कहा गया है कि बचपन में यौन शोषण का शिकार बने बच्चे शोषण बंद होने के औसतन 22 वर्षों बाद सामने आ पाते हैं।
पेट सौंडर्स के साथ भी बचपन में यौन शोषण हुआ था और वो शोषण बंद होने के 25 साल बाद दुनिया को इस बारे में बता पाए।
वो कहते हैं, ''मैं एक तरह से इससे कभी बाहर नहीं निकल सकूंगा। मुझे कभी पता नहीं चलेगा कि मुझे आखिर क्यों निशाना बनाया गया था। मैं जब तक जीवित रहूंगा, मुझमें गुस्सा भरा रहेगा।''
चुप्पी तोड़ें
एक अनुमान के मुताबिक, हर चार में से एक बच्चा यौन शोषण का शिकार होता है। ऐली गोडसी एक मनोचिकित्सक हैं। वो कहती हैं कि शोषण का असर दशकों तक बना रहता है और इससे व्यक्ति का चरित्र, व्यवहार, पहचान सब कुछ बदल जाता है।
वो कहती हैं, ''ऐसी स्थिति में अवसाद, चिंता, खुद को नुकसान पहुंचाने की प्रवृत्ति, नशीले पदार्थ लेना, बड़ी साधारण बात सी है। इससे किसी व्यक्ति के पूरे जीवन पर असर पड़ता है। खासतौर पर तब जब आप इस बारे में किसी से बात नहीं करते हैं।''
वो बीबीसी के पूर्व प्रसारक जिमी सेविल मामले का उदाहरण देती हैं। वो कहती हैं कि जिस तरह से लोग अपने साथ हुए शोषण की कहानी के साथ अब सामने आ रहे हैं, वो बड़ा महत्वपूर्ण है।
ऐली गोडसी कहती हैं, ''जब आप पहली बार इस बारे में बताते हैं तो ये बड़ा मुश्किल होता है कि लोग इस पर विश्वास करें, और यदि लोग आपकी बात पर नकारात्मक रवैया अपनाते हैं तो आपके लिए दोबारा इस बारे में बात करना नामुमकिन हो जाएगा।''
लूसी डकवर्थ के साथ भी ऐसा ही हादसा पेश आया। वो बताती हैं कि 11 साल की उम्र तक दो पादरियों ने उनका यौन शोषण किया और जब उनकी उम्र 20 से ज्यादा हो गई, तब कहीं जाकर वो इस बारे में किसी को बता पाईं।
ऐली गोडसी कहती हैं, ''साठ और सत्तर के दशक में ऐसा नहीं होता था। तब ऐसा माना जाता था कि कोई जिमी सेविल, कोई पादरी या स्कूल टीचर ऐसा नहीं करेगा।''
लेकिन अब बच्चे उम्मीद कर सकते हैं कि उनकी बात पर ऐतबार किया जाएगा और उनसे ठीक से बात की जाएगी ताकि वो इस तरह के शोषण के मामलों में चुप्पी तोड़ सकें।