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'मौत की नाव' पर सवार रोहिंग्या मुसलमान

Wed, 28 Nov 2012 03:04 PM IST
बीबीसी हिंदी
बीबीसी हिंदी Updated Wed, 28 Nov 2012 03:04 PM IST
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rohingya muslims forced to ride on death boat

जिस रात मुहम्मद फ़िरोज़ एक हद से ज़्यादा भरी हुई लकड़ी की नाव में अपने तीन बच्चों की खातिर कुछ पैसा कमाने के लिए मलेशिया की ओर रवाना हुए थे उस रात उनकी बीबी समीरा बेगम एक पल के लिए नहीं सो पाईं। सुबह होते-होते खबर आ गई कि वो नाव डूब गयी है। उस नाव पर 100 से ज़्यादा लोग सवार थे जो की दक्षिण पूर्वी बांग्लादेश के पास समुद्र में डूब गए।

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उस नाव पर सवार लोगों में से केवल कुछ ही ज़िंदा बचे लेकिन ज़्यादातर का कोई अता-पता नहीं निकला। इस तरह की यह अकेली घटना नहीं थी। हर साल दर्ज़नों लोग किसी तरह से बांग्लादेश के बाहर अवैध प्रवास की कोशिशों में अपनी जान से हाथ धो बैठते हैं। मलेशिया थाईलैंड जैसे मुल्क में बेहतर कल की उम्मीदें लिए ये लोग टूटी फूटी छोटी नावों में खुले समुद्र में निकल जाते हैं।
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जाने वाले लोगों में ज़्यादातर गरीब बांग्लादेशी लोग होते हैं या रोहिंग्या मुसलमान। अब मुहम्मद फ़िरोज़ की पत्नी समीरा बेगम इस उम्मीद में समुद्र को ताकते बैठी हुई हैं कि शायद जो कुछ लोग बचे हैं उनमे से उनके पति भी एक हों।
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अब क्या ?

समीरा जिनकी उम्र महज़ 22 साल है वो कहती हैं " मैंने उससे कहा था कि मत जाओ यह बहुत ही ही खतरनाक यात्रा है लेकिन वो नहीं माना चला गया। बोला हमारे तीन बच्चों के लिए कुछ पैसे कमाना चाहता है।" समीरा बेगम और उनके पति मुहम्मद फ़िरोज़ और उनके तरह के हजारों बर्मा से आये हुए रोहिंग्या मुसलमान जान बचाने के लिए बांग्लादेश में भाग कर आ गए हैं।

इन लोगों कि दिक्कत यह है कि बांग्लादेश भी इन्हें अपने यहां रखने के लिए तैयार नहीं क्योंकि उसका कहना है कि अब वो अपने यहाँ और शरणार्थियों को बर्दाश्त नहीं कर सकता। समीरा बेगम सवाल करती हैं "हमें बर्मा से भगा दिया, बांग्लादेश हमें अपने यहाँ रखने के लिए तैयार नहीं हम कहाँ जाएँ ? मैं और मेरे तीन बच्चे कैसे ज़िंदा रहें।"

संयुक्त राष्ट्र का कहना है कि रोहिंग्या मुसलमान पश्चिमी बर्मा के भाषाई और धार्मिक अल्पसंख्यक हैं। हालांकि बर्मा की सरकार कहती हैं कि यह लोग बांग्लादेश से आये हुए अवैध प्रवासी हैं।

मानव तस्कर
मानवाधिकार समूहों की चेतावनी है कि अगर बर्मा में हालात ना सुधारे तो और अधिक रोहिंग्या मुसलमान बांग्लादेश में घुस सकते हैं। हालाँकि, रोहिंग्या मुसलमानों और बांग्लादेशी मुसलमानों में भाषाई और सांस्कृतिक समानताएं हैं लेकिन बांग्लादेशी अधिकारी उन्हें बोझ ही मानते हैं। बैंगकॉक में मौजूद ह्युमन राइट्स वॉच के प्रवक्ता फिल राबर्टस्न बर्मा से भगाए और बांग्लादेश से दुत्कारे हुए रोहिग्या मुसलमानों के बारे में कहते है" यह लोग हताशा से घिरे हुए हैं और कुछ भी करने के लिए तैयार हैं।"

बांग्लादेशी अधिकारीयों का कहना है कि इन नावों पर अवैध रूप से विदेश जाने की कोशिश करने वालों में बड़ी तादाद में बांग्लादेश के गरीब नौजवान भी शामिल हैं। बांग्लादेश के सीमा सुरक्षा बल के अधिकारी लेफ्टीनेंट कर्नल जाहिद हुसैन कहते हैं " हमारी जानकारी के अनुसार अवैध रूप से जाने वालीं इन नावों में 30 से 40 फ़ीसदी यात्री ही रोहिंग्या होते हैं बाकि सभी बांग्लादेशी होते हैं।

मानव तस्कर इन नावों पर जाने वाले प्रति व्यक्ति से करीब 1 हज़ार अमरीकी डॉलर के बराबर पैसे ले लेते है जो इन लोगों के लिए बहुत ही ज़्यादा हैं। एक मानव तस्कर ने नाम ना बताते की शर्त पर बीबीसी को बताया "लोग यात्रा के तमाम खतरों को जानते हुए भी मेरे पास आकर विदेश जाने के लिए गिड़गिड़ाते हैं।"


उसके अनुसार लोगों को एक छोटी नाव से समुद्र में लेकर बड़ी नाव पर चढ़ा दिया जता है। वो आगे कहता है "जब किसी दुर्घटना में लोग डूब कर मर जाते हैं तो मैं ही उनके घर जा कर यह खबर पहुंचाता हूँ। मैं यह काम छोड़ना चाहता हूँ लेकिन कोई और रास्ता नज़र नहीं आता।" इन हर दिन खराब होते हालात के ने बीच समीरा बेगम केवल यही उम्मीद कर सकती हैं कि उनका पति जैसे भी हो वापस लौट आए।

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