स्तन कैंसर के शिकंजे में एशियाई महिलाएं

Avanish Pathak Updated Wed, 14 Nov 2012 10:17 AM IST
asian women in uk more prone to breast cancer
ब्रिटेन में रह रही एशियाई मूल की महिलाओं में स्तन कैंसर होने के मामलों में बढ़ोतरी हुई है।

एक नए शोध में ये जानकारी सामने आई है कि अन्य जातीय समूहों की महिलाओं की तुलना में एशियाई मूल की महिलाओं में स्तन कैंसर के अधिक मामले सामने आ रहे हैं।

हालांकि इससे पहले गोरी महिलाओं के मुकाबले एशियाई महिलाओं में स्तन कैंसर की बीमारी कम पाई जाती थी।

ब्रिटेन में रह रही मधु को 43 साल की उम्र में पता चला कि उन्हें स्तन कैंसर है।

वह बताती है, 'मेरे स्तन का आकार बदल रहा था और आमतौर पर स्तन छूने पर नरम होते हैं लेकिन मेरे उतने नरम नहीं थे मुझे वो सख्त लगे। इसके बाद मैंने डॉक्टर को दिखाने का फैसला किया और डॉक्टर ने मुझे सीधे अस्पताल जाने को कहा।'

स्तन कैंसर
मधु के घर से कुछ ही किलोमीटर के फासले पर रहने वाली रंजना भी स्तन कैंसर से पीड़ित हैं।

रंजना बताती हैं, 'जब मैंने अपने बांए स्तन से कुछ रिसाव होता हुआ दिखा तो मैंने चिकित्सक के पास जाने की सोची। उन्होंने मुझे तुरंत अस्पताल जाने को कहा जहां मुझे बताया गया कि मुझे कैंसर है।'

स्तन कैंसर एक आम बीमारी का रुप लेता जा रहा है और ये देखा गया है कि हर तीन में से एक महिला इससे पीड़ित है। लेकिन पहले ब्रिटेन में रहने वाली एशियाई महिलाओं में इसके मरीज़ों की संख्या कम पाई जाती थी।

शोध
लेकिन एक नए शोध में पता चला है कि पहले के मुकाबले एशियाई महिलाओं में स्तन कैंसर के ज्यादा मामले सामने आ रहे हैं। ये शोध कैंसर रिसर्च यूके संस्था की मदद से किया गया है।

इस शोध को अंजाम देने वाली डॉक्टर पूनम मंगतानी का कहना है, 'स्तन कैंसर की वजह से महिलाओं की मृत्यु में बढ़ोतरी होने के आकड़े तो सामने नहीं आए हैं लेकिन जिस तरह से मामले सामने आ रहे हैं उससे ये जरुर पता चला है कि पहले के मुकाबले महिलाओं में स्तन कैंसर में बढ़ोतरी हुई है।'

रंजना के मुताबिक वो समय दूर नहीं है जब अधिक एशियाई महिलाओं को ये पता चलेगा कि उन्हें स्तन कैंसर है।

वे कहती हैं, 'मैं अपने परिवार में पहली महिला हूं जिसे स्तन कैंसर हुआ है इसलिए मुझे इस बात को लेकर आश्चर्य नहीं है कि स्तन कैंसर के मामलों की संख्या बढ़ रही है।'

पीड़ित
लेकिन मधु बताती है, 'अपने आस-पास मैं जिन लोगों को जानती हूं, मैने पाया है कि यहां रहने वाली एशियाई महिलाओं में स्तन कैंसर है और ये देखकर मुझे चिंता होती है। मुझे ये पता नहीं है कि ये बीमारी कहां से आ रही है।'

इस शोध का आधार वर्ष 1991 और 2001 में की गई जनगणना है। इस शोध में अलग-अलग जातीय समूहों की महिलाओं में कैंसर को लेकर अध्ययन किया गया लेकिन डॉक्टर मंगतानी का कहना कि इसके नतीजे अभी भी प्रासंगिक हैं।

वे बताती हैं, 'ये स्तन कैंसर को लेकर एक अलग तरह का ट्रैंड सामने लाता है। मेरा मानना है कि इसकी रोकथाम के लिए काम होने के साथ-साथ स्क्रिनिंग हो और ये सुनिश्चत होनी चाहिए कि सभी को स्क्रिनिंग की सुविधा मिले।'

मदद
हैरो में शेला रासनिया एशियाई महिलाओं में स्तन कैंसर की बीमारी को लेकर समर्थन समूह चलाती हैं ताकि इस इलाके में जो भी औरतें बीमारी से पीड़ित हैं उनकी मदद की जा सके।

शेला बताती है, 'मैं इस समूह में वर्ष 2006 में शामिल हुई। उस समय इस समूह में सात या आठ महिलाएं थी जो महीने में एक बार मिलती थी और अपने अनुभव बांटती थी और धीरे-धीरे मैंने देखा कि चार हफ्ते, एक या दो महीने के बाद एक नई महिला इस समूह में शामिल हो रही हैं।'

पारंपरिक तौर पर देखें तो एशियाई महिलाएं अभी भी स्तन कैंसर पर बात करना पसंद नहीं करती हैं। लेकिन अब लोगों का नज़रिया बदल रहा रहा है।

स्तर कैंसर पर काम करने वाले इस समूह में फिलहाल 50 महिलाएं शामिल हैं।

शेला बताती है, 'अब इस बारे में विज्ञापन दिए जा रहे हैं कि हम आपकी मदद के लिए हैं और आप अपने मुद्दों पर खुलकर बात कर सकते हैं। ये बहुत ही संवेदनशील मामला है और महिलाएं इस मुद्दे पर बात करना पसंद नहीं करती हैं। मेरा मानना है कि इससे संबंधित मुद्दों पर बात करने की बेहद जरुरत है क्योंकि इस बारे में आप कहीं और बात नहीं कर सकते हैं।'

हालांकि ये एशियाई समर्थक समूह स्तन कैंसर से पीड़ित महिलाओं की मदद कर रहा है लेकिन डॉक्टर मंगतानी का कहना है कि एशियाई महिलाओं के बीच और ज्यादा काम करने की जरुरत है ताकि उन्हें इस घातक रोग के ख़तरे को बताया जा सके।

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