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अमेरिका से नाराजगी: अफगानिस्तान में जो हुआ, उससे यूरोपीय देशों में है गहरी निराशा

Sat, 21 Aug 2021 03:36 PM IST
Harendra Chaudhary वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला, ब्रसेल्स
वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला, ब्रसेल्स Published by: Harendra Chaudhary Updated Sat, 21 Aug 2021 03:36 PM IST
सार

कई यूरोपीय राजधानियों में राजनयिकों ने सीएनएन से कहा है कि उन्हें जो बाइडन के इस बयान को सुन कर सदमा लगा कि अफगानिस्तान में अमेरिका का मकसद सिर्फ उन आतंकवादियों को खत्म करना था, जिन्होंने सितंबर 2001 में उस पर हमले किए थे...

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Europe is disappointed with the outcome in Afghanistan after US decision to withdraw troops
अफगानिस्तान - फोटो : पीटीआई (फाइल)

विस्तार

अमेरिका की फौज वापसी के फैसले का अफगानिस्तान में जो नतीजा हुआ, उससे यूरोप में गहरी निराशा है। कई हलकों से कहा गया है कि जो बाइडन प्रशासन का ये फैसला उनके ‘अमेरिका फर्स्ट’ नजरिए को दिखाता है। लेकिन यूरोपीय देश इस मामले में कोई पहल करने में खुद को अक्षम पा रहे हैं। इससे उनमें ये अहसास भी गहराया है कि अंतरराष्ट्रीय मामलों में अमेरिका को छोड़ कर अपने स्तर पर उनकी पहल करने की सैनिक और राजनयिक शक्ति सीमित है।

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यूरोप की निराशा का सबसे पहला इजहार ब्रिटेन के रक्षा मंत्री बेन वॉलैस के बयान में हुआ। उन्होंने कहा कि फौज वापसी का फैसला एक गलती थी, जिससे तालिबान को अपनी जीत का संदेश मिला। अमेरिकी टीवी चैनल सीएनएन के मुताबिक कई ब्रिटिश अधिकारियों ने उसे बताया है कि ब्रिटिश सरकार ने डोनाल्ड ट्रंप और जो बाइडन- दोनों प्रशासनों को अफगानिस्तान के मामले में धीमी गति से कदम उठाने का आग्रह किया। लेकिन वे उन्हें समझाने में नाकाम रहे।
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कई यूरोपीय राजधानियों में राजनयिकों ने सीएनएन से कहा है कि उन्हें जो बाइडन के इस बयान को सुन कर सदमा लगा कि अफगानिस्तान में अमेरिका का मकसद सिर्फ उन आतंकवादियों को खत्म करना था, जिन्होंने सितंबर 2001 में उस पर हमले किए थे। यूरोपीय अधिकारियों का कहना है कि अमेरिकी फौज की वापसी के फैसले से अब अफगानिस्तान में जो मानवीय और राजनीतिक संकट खड़ा होगा, उसका नतीजा यूरोप को भी भुगतना होगा। अब यूरोपीय देशों पर आतंकवादी हमलों की आशंका बढ़ गई है। साथ ही उन्हें शरणार्थी समस्या का भी अधिक सामना करना पड़ सकता है।

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कुछ यूरोपीय अधिकारियों ने इस सिलसिले में सीरिया का जिक्र किया। कहा कि जब अमेरिका ने वहां अपना रुख बदला था, तो उससे अमेरिका में नहीं, बल्कि यूरोप में संकट खड़ा हुआ था। गौरतलब है कि जब बराक ओबामा राष्ट्रपति थे, तब अमेरिका ने अचानक सीरिया के राष्ट्रपति बशर अल-असद की सेनाओं पर हमला करने का फैसला बदल लिया था। उसके बाद यूरोप पहुंचने वाले सीरियाई शरणार्थियों की संख्या तेजी से बढ़ी थी। अब आशंका है कि ऐसा ही अफगान शरणार्थियों के मामले में हो सकता है।

यूरोपियन यूनियन ने शरणार्थियों की बाढ़ रोकने के लिए 2015 में टर्की के राष्ट्रपति रजिब तैयिब एर्दोआन की सरकार को धन दिया था। थिंक टैंक ज्याइंट काउंसिल फॉर वेलफेयर ऑफ इमिग्रेंट्स की ग्रीस शाखा के प्रमुख जोय गार्डनर ने सीएनएन से कहा- ‘तब टर्की से करार करने का उलटा असर हुआ था। अचानक एर्दोआन ने उन लोगों का इस्तेमाल एक हथियार की तरह करने लगे।’ इससे यूरोप के लोगों में आशंकाएं बढ़ीं। जानकारों ने ध्यान दिलाया है कि 2015 के बाद यूरोप में उन राजनीतिक गुटों की ताकत बढ़ी, जो यूरोपियन यूनियन के विरोधी हैं।

अब जानकारों को उम्मीद नहीं है कि अब अफगानिस्तान के मामले में यूरोपियन यूनियन कोई बेहतर रास्ता ढूंढ पाएगा। यूरोपियन यूनियन (ईयू) के एक अधिकारी ने सीएनएन से कहा कि ईयू अफगानिस्तान में मानवीय सहायता के कार्यक्रमों को धन दे सकता है। वहां मानव अधिकार, महिला अधिकार और लोकतंत्र के लिए माहौल बनाने की योजनाएं वह चलाना चाहता है। लेकिन ईयू के सदस्य देशों को इसके लिए राजी करना मुश्किल होगा, क्योंकि अफगानिस्तान में तालिबान का राज कायम हो चुका है। इसलिए शरणार्थियों को आने से रोक पाने की संभावना फिलहाल धूमिल है।

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