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आर्थिक विशेषज्ञों की राय: लंबे समय से इकट्ठा हुए हैं मौजूदा महंगाई के कारण, केवल यूक्रेन युद्ध ही वजह नहीं

Tue, 19 Apr 2022 02:38 PM IST
Harendra Chaudhary वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला, वाशिंगटन
वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला, वाशिंगटन Published by: Harendra Chaudhary Updated Tue, 19 Apr 2022 02:38 PM IST
सार

अमेरिका की असीमित नोट छापने की नीति ने महंगाई की स्थितियां पैदा की हैं। 2008-09 की मंदी के बाद से अमेरिका में क्वांटीटिव ईजिंग नाम से ये नीति अपनाई गई थी। कोरोना महामारी और यूक्रेन युद्ध ने हालात और बदतर कर दिए हैं...

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Economic expert says, Russia Ukraine war is not the only reason for inflation worldwide
अमेरिका में महंगाई की मार - फोटो : Istock

विस्तार

आर्थिक विशेषज्ञों के बीच ये आमराय देखने को मिल रही है कि दुनिया को महंगाई से अगले एक साल तक राहत नहीं मिलने वाली है। इसकी वजह ये समझी जा रही है कि वर्तमान ऊंची महंगाई का कारण सिर्फ यूक्रेन युद्ध के कारण रूस पर लगाए गए प्रतिबंध नहीं हैं। हकीकत यह है कि महंगाई फरवरी में युद्ध शुरू होने से पहले ही बढ़ने लगी थी।

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कुछ विशेषज्ञों का कहना है कि अभी दुनिया को असामान्य ढंग की महंगाई का सामना करना पड़ रहा है। उनके मुताबिक आमतौर पर महंगाई से अर्थव्यवस्था का कोई एक सेक्टर या दुनिया का कोई एक हिस्सा प्रभावित होता है। मसलन, अगर कच्चे तेल या अनाज की महंगाई होती है, तो अक्सर ऐसा नहीं होता कि उसी समय दूसरी चीजें भी महंगी मिल रही हों। लेकिन अभी लगभग हर चीज महंगी मिल रही है। साथ ही दुनिया का हर क्षेत्र इससे प्रभावित है।

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उदारता बनी रोड़ा

चीन के आर्थिक विशेषज्ञ वेन शेंग ने महंगाई के मौजूदा दौर के लिए अमेरिका की आर्थिक नीतियों को जिम्मेदार ठहराया है। चीन के सरकार समर्थक अखबार ग्लोबल टाइम्स में लिखे एक लेख में उन्होंने कहा है कि 2021 की पहली छमाही में जो बाइडन प्रशासन ने 1.7 ट्रिलियन डॉलर का प्रोत्साहन पैकेज पारित कराया था। उसके पहले कोराना काल में डोनाल्ड ट्रंप प्रशासन ने भी उदारता से अमेरिकी वासियों को आर्थिक मदद दी। इसके लिए अमेरिका के सेंट्रल बैंक- फेडरल रिजर्व ने खूब नोट छापे। इससे मुद्रास्फीति बढ़ी। उसका असर अब पूरी दुनिया पर इसलिए देखने को मिल रहा है, क्योंकि अमेरिकी मुद्रा डॉलर सारी दुनिया की रिजर्व करेंसी है।

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अन्य विशेषज्ञ भी इस राय से सहमत हैं कि अमेरिका की असीमित नोट छापने की नीति ने महंगाई की स्थितियां पैदा की हैं। 2008-09 की मंदी के बाद से अमेरिका में क्वांटीटिव ईजिंग नाम से ये नीति अपनाई गई थी। कोरोना महामारी और यूक्रेन युद्ध ने हालात और बदतर कर दिए हैं।

अभी उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक दुनिया के 70 फीसदी देश इस समय महंगाई से परेशान हैं। 58 फीसदी धनी देशों में इस समय मुद्रास्फीति की दर पांच फीसदी से ज्यादा है। धनी से लेकर गरीब देशों तक में अनाज, ईंधन, मकान किराये से लेकर कार, हवाई उड़ान, होटल रूम और अन्य प्रकार की सेवाएं भी तेजी से महंगी हुई हैं। इसका परिणाम यह है कि दुनिया के अरबों लोगों की रोजमर्रा की कठिनाइयां बढ़ गई हैं।

चीन के खिलाफ व्यापार युद्ध भी वजह

अमेरिका में बढ़ी महंगाई के पीछे एक कारण वहां चीन के खिलाफ छेड़ा गए व्यापार युद्ध को माना जाता है। इसके तहत पूर्व डोनाल्ड ट्रंप प्रशासन ने चीन से आयात होने वाली 360 बिलियन डॉलर की वस्तुओं पर अतिरिक्त शुल्क लगा दिए थे। इस वजह से चीनी आयात तो नहीं घटा, मगर अमेरिकी उपभोक्ताओं को वे चीजें महंगी जरूर मिलने लगीं। इसका असर कुल मुद्रास्फीति दर पर देखने को मिला है। राष्ट्रपति बनने के बाद जो बाइडन ने भी उन अतिरिक्त शुल्कों को जारी रखा है।



विशेषज्ञों का कहना है कि ज्यादातर देशों की सरकारों के पास ऐसे कोई उपाय मौजूद नहीं हैं, जिन्हें वे अपनी जनता को मौजूदा महंगाई से बचाने के लिए उठा सकें। डॉलर से अर्थव्यवस्था के बंधे रहने के कारण दुनिया भर के तमाम देश अमेरिकी नीतियों की कीमत चुकाने को मजबूर बने हुए हैं।

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