Sri Lanka: विश्लेषकों में है आम राय, श्रीलंका में बढ़ते ही जा रहे हैं पॉलिटिकल रिस्क
Sri Lanka: विश्लेषकों के मुताबिक श्रीलंका इस क्षेत्र में चल रही भू-राजनीतिक होड़ में फंस गया है। भारत, अमेरिका आदि जैसे देश इसको लेकर चिंता जता चुके हैं कि श्रीलंका ने चीन को अपने देश में वैसी पैठ बनाने का अवसर दिया है, जिसका वह सैन्य मकसदों से इस्तेमाल कर सकता है...
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अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) से मंजूर 2.9 बिलियन डॉलर के कर्ज की रकम जारी न होने से श्रीलंका में आर्थिक संकट लगातार गहरा होता जा रहा है। इस बीच देश में अगले नौ मार्च होने वाले स्थानीय चुनावों की गर्मी भी बढ़ गई है। विश्लेषकों ने राय जताई है कि इन दोनों कारणों से श्रीलंका में राजनीतिक जोखिम में भारी बढ़ोतरी हो गई है।
विश्लेषक शिहार अनीज ने एक खास टिप्पणी में लिखा है कि श्रीलंका से आईएमएफ के कर्ज की रकम अभी भी काफी दूर बनी हुई है। इसका प्रमुख कारण चीन का रुख है। चीन ने जैसी कर्ज राहत अफ्रीकी देशों को दी है, वैसा वह श्रीलंका के मामले में करने को तैयार नहीं है। जबकि आईएमएफ ने शर्त लगा रखी है कि श्रीलंका जब अपने पूर्व ऋणदाताओं से ऋण राहत प्राप्त कर लेगा, तभी वह उसे नए कर्ज की रकम जारी करेगा।
अनीज के मुताबिक श्रीलंका की मुसीबत एक कारण आईएमएफ और पश्चिमी कर्जदाता देशों की यह शिकायत भी है कि रानिल विक्रमसिंघे सरकार ने चीन के साथ अलग और विशेष व्यवहार किया है। इसलिए इस मुद्दे पर उन्होंने सख्त रुख अपना रखा है।
विश्लेषकों के मुताबिक श्रीलंका इस क्षेत्र में चल रही भू-राजनीतिक होड़ में फंस गया है। भारत, अमेरिका आदि जैसे देश इसको लेकर चिंता जता चुके हैं कि श्रीलंका ने चीन को अपने देश में वैसी पैठ बनाने का अवसर दिया है, जिसका वह सैन्य मकसदों से इस्तेमाल कर सकता है। उधर इसी वजह से चीन ऐसी कोई नरमी नहीं दिखाना चाहता, जिससे यह संदेश जाए कि पश्चिमी देश उसे झुकाने में सफल रहे।
इस बीच रोजमर्रा की जारी मुसीबतों के बीच देश में फिर से जगह-जगह विरोध प्रदर्शनों का आयोजन होने लगा है। पर्यवेक्षकों के मुताबिक फिलहाल प्रदर्शन टैक्स में वृद्धि के खिलाफ हुए हैँ। कारखानों में ट्रेड यूनियनों ने भी विरोध जताया है। आशंका यह है कि जल्द हालात नहीं सुधरे, तो ये प्रदर्शन वैसा रूप ले सकते हैं, जिसकी वजह से पिछले जुलाई में तत्कालीन राष्ट्रपति गोटाबया राजपक्षे को अपना पद छोड़ना पड़ा था। वर्तमान राष्ट्रपति विक्रमसिंघे को लेकर भी देश में विरोध भाव तेजी से बढ़ रहा है।
इसी बीच देश में स्थानीय चुनावों के लिए प्रचार शुरू हो गया है। अभी तक मिले तमाम संकेतों के मुताबिक इन चुनावों में विपक्षी दल बढ़त प्राप्त करते नजर आ रहे हैं। राजनीतिक विश्लेषकों के मुताबिक अगर सचमुच विपक्षी दलों को बड़ी जीत मिली, तो फिर विक्रमसिंघे के लिए सरकार चलाना बेहद कठिन हो जाएगा। उससे देश में अस्थिरता बढ़ेगी।
राजनीतिक विश्लेषकों ने ध्यान दिलाया है कि विक्रमसिंघे का अपना कोई जनाधार नहीं है। जब उन्हें राष्ट्रपति चुना गया, तब वे अपनी यूनाइटेड नेशनल पार्टी (यूएमपी) के अकेले सांसद थे। वे पूर्व राष्ट्रपति राजपक्षे की श्रीलंका पोडुजना पेरामुना (एसएलपीपी) के समर्थन से सरकार से चला रहे हैं। एसएलपीपी को 2020 के आम चुनाव में भारी सफलता मिली थी। लेकिन अब उसको लेकर लोगों में साफ गुस्सा नजर आ रहा है।
विपक्षी दल आईएमएफ की तरफ से लगाई गई शर्तों का विरोध करते हुए चुनाव मैदान में उतरे हैं। आशंका यह है कि विपक्ष की जीत के बाद बड़ी संख्या में सांसद दल बदल कर सकते हैं और उसके बाद संसद में आईएमएफ से हुए करार के खिलाफ प्रस्ताव पारित किया जा सकता है। ऐसा हुआ, तो श्रीलंका के लिए कर्ज पाना और कठिन हो जाएगा।