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बढ़ रही गोल्ड की खरीदारी: डॉलर के घटते आकर्षण के कारण सेंट्रल बैंकों में लगी सोना जमा करने की होड़

Thu, 30 Dec 2021 05:53 PM IST
Harendra Chaudhary वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला, टोक्यो
वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला, टोक्यो Published by: Harendra Chaudhary Updated Thu, 30 Dec 2021 05:53 PM IST
सार

विशेषज्ञों का कहना है कि देशों को अपने भंडार में रखे गए डॉलर पर ब्याज देना पड़ता है। सोना रखने पर ऐसी जरूरत नहीं पड़ती। हंगरी के सेंट्रल बैंक ने इस वर्ष 90 टन सोने की खरीद की। उसने कहा कि सोने को रखने में कोई खर्च नहीं है। साथ ही यह जोखिम से भी मुक्त है...

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Due to the declining attraction of the US dollar, the central banks are buying gold reserve
सोना (प्रतीकात्मक तस्वीर) - फोटो : iStock

विस्तार

दुनिया भर के देशों के सेंट्रल बैंक अपने भंडार में सोने की मात्रा बढ़ा रहे हैँ। 2021 में ये मात्रा 31 वर्ष के सबसे ऊंचे स्तर पर पहुंच गई। सोने के कारोबार पर नजर रखने वाली संस्था- वर्ल्ड गोल्ड काउंसिल के मुताबिक 2021 में विभिन्न देशों के सेंट्रल बैंकों ने अपने भंडार में 4,500 टन अधिक सोना जमा किया। बीते सितंबर तक तमाम सेंट्रल बैंकों के पास 36 हजार टन से ज्यादा सोना था। 1990 के बाद यह सबसे ज्यादा मात्रा है।

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सोना जमा करने की बढ़ी ललक का नतीजा है कि सोने की तुलना में अमेरिकी डॉलर के भाव में तेजी से गिरावट आई है। वेबसाइट निक्कईएशिया.कॉम के विश्लेषण में कहा गया है- ‘हालांकि अमेरिका का फेडरल रिजर्व (सेंट्रल बैंक) कर्ज पर अपनी पकड़ मजबूत कर रहा है, इसके बावजूद दूसरे देशों के सेंट्रल बैंकों का सोने में निवेश करना जारी है। यह डॉलर आधारित मौद्रिक व्यवस्था के प्रति बढ़ रही उनकी चिंताओं का संकेत है।’

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देश लगातार खरीद रहे सोना

पोलैंड के नेशनल बैंक के अध्यक्ष ऐडम ग्लेपिन्स्की ने हाल में कहा कि सोना आज किसी भी देश की अर्थव्यवस्था से सीधे तौर पर नहीं जुड़ा हुआ है। इसलिए यह वित्तीय बाजारों में उथल-पुथल को झेल सकने की स्थिति में है। नेशनल बैंक ऑफ पोलैंड ने 2029 में 100 टन सोना खरीदा था। उसके बाद से उसने सोने की खरीद जारी रखी है। उधर उभरती अर्थव्यवस्था वाले देश भी लगातार सोना खरीद रहे हैं। 2021 के पहले नौ महीनों में थाईलैंड ने 90 टन, भारत ने 70 टन, और ब्राजील ने 60 टन सोना अपने भंडार में जमा किया।

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विशेषज्ञों का कहना है कि देशों को अपने भंडार में रखे गए डॉलर पर ब्याज देना पड़ता है। सोना रखने पर ऐसी जरूरत नहीं पड़ती। हंगरी के सेंट्रल बैंक ने इस वर्ष 90 टन सोने की खरीद की। उसने कहा कि सोने को रखने में कोई खर्च नहीं है। साथ ही यह जोखिम से भी मुक्त है।

विश्लेषकों ने ध्यान दिलाया है कि अतीत में सोने की खरीद मुख्य रूप से रूस और कुछ ऐसे देशों के सेंट्रल बैंक करते थे, जो अमेरिका से टकराव की वजह से डॉलर पर अपनी निर्भरता घटाना चाहते थे। लेकिन हाल में ऐसे देश भी अपने भंडार में सोने की मात्रा बढ़ाने में जुट गए हैं, जो भविष्य में मुद्रा बाजार में संभावित उथल-पुथल से खुद को सुरक्षित रखना चाहते हैं।

डॉलर रखना नुकसान का सौदा

वेबसाइट निक्कई एशिया के विश्लेषण के मुताबिक सेंट्रल बैंकों ने अपने सोने के भंडार में बढ़ोतरी 2009 में शुरू की। उसके पहले यह ट्रेंड अपना सोना बेच कर डॉलर खरीदने का था। लेकिन 2008 की आर्थिक मंदी ने सेंट्रल बैंकों की सोच बदल दी। ये मंदी अमेरिका से ही शुरू हुई थी। इस बीच विदेशी मुद्रा भंडार में डॉलर को रखना सोने की तुलना में नुकसान का सौदा हो गया है। 2020 में डॉलर का मुद्रा-दर-मुद्रा अनुपात 25 साल के सबसे निचले स्तर पर चला गया।



तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति रिचर्ड निक्सन ने 1971 में डॉलर की सोने में परिवर्तनीयता को खत्म कर दिया था। उसके बाद से विश्व मुद्रा बाजार में डॉलर की उपलब्धता तेजी से बढ़ी। इस वजह से उसकी कीमत घटती चली गई। आज 1971 की तुलना में डॉलर का भाव सिर्फ 20 फीसदी रह गया है। इसीलिए सेंट्रल बैंकों के लिए ये मुद्रा अब पहले जितनी आकर्षक नहीं रह गई है।

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