जीत के साथ ही जो बाइडन पर पार्टी के अलग-अलग धड़ों ने बनाया दबाव
- अपना अपना एजेंडा लागू करवाने को लेकर वामपंथी और दक्षिणपंथी धड़ आमने-सामने
- दक्षिणपंथियों का आरोप कि वामपंथियों की वजह से उम्मीद से कम मतों से जीते बाइडन
- बाइडेन के लिए मुश्किल, लेफ्ट की सुनें या राइट की, या फिर मध्य मार्ग अपनाएं?
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विस्तार
राष्ट्रपति चुनाव में जीत के साथ ही डेमोक्रेटिक पार्टी के अंदर एक बड़ा विवाद खड़ा हो गया है। शुरुआत पार्टी के दक्षिणपंथी और वामपंथी धड़ों में संसदीय चुनाव में हुए नुकसान का ठीकरा फोड़ने से हुई। और फिर इसको लेकर पार्टी की अंदरूनी खींचतान सबके सामने आ गई कि नव-निर्वाचित राष्ट्रपति जो बाइडन को शासन का कैसा एजेंडा अपनाना चाहिए। उन्हें पूर्व राष्ट्रपति बराक ओबामा की तरह सामाजिक- सांस्कृतिक मामलों में प्रगतिशील, लेकिन आर्थिक मामलों में नव उदारवादी रास्ते पर चलना चाहिए, या उन्हें प्रगतिशील आर्थिक नीतियां भी अपनानी चाहिए।
शनिवार रात जब जो बाइडन की जीत पक्की हुई, उसके कुछ ही देर बात दक्षिणपंथी नेता और ओहायो राज्य के पूर्व गवर्नर जॉन कसिच ने ट्वीट किया कि डेमोक्रेटिक पार्टी को धुर वामपंथियों को यह साफ शब्दों में बता देना चाहिए कि उनकी वजह से पार्टी ये चुनाव हारते-हारते बची। इस पर पार्टी के वामपंथी धड़े में तीखी प्रतिक्रिया हुई। अगले दिन वेबसाइट पॉलिटिको डॉट कॉम ने खबर छापी कि जो बाइडन ने अपने मंत्रियों की जो सूची तैयार की है, उसमें दक्षिणपंथियों की भरमार है। इससे वामपंथी और खफा हो गए।
रविवार को ही वामपंथी धड़े की स्टार नेता एओसी नाम से मशहूर- एलेक्जेंड्रिया ओकासियो कॉर्तेज का इंटरव्यू न्यूयॉर्क टाइम्स में छपा। इसमें उन्होंने साफ चेतावनी दी कि अगर बाइडन प्रशासन में प्रगतिशील नेताओं को ऊंचे पद नहीं दिए गए, तो पार्टी को 2022 के मध्यावधि संसदीय चुनाव में भारी हार का सामना करना पड़ेगा। एओसी ने ये साफ कर दिया कि प्रगतिशील नेताओं ने अंदरूनी मतभेदों पर न बोलने का खुद पर जो अनुशासन लगाया था, उसे अब खत्म किया जा रहा है।
उन्होंने कसिच और दूसरे दक्षिणपंथी नेताओं की तरफ से दी जा रही इस दलील को सिरे से ठुकरा दिया कि ब्लैक लाइव्स मैटर आंदोलन की तरफ से जो मांगें उठाई गईं और प्रगतिशील खेमे ने न्यू ग्रीन डील जैसा जो एजेंडा सामने रखा, उसकी वजह से कई राज्यों में पार्टी को हार का सामना करना पड़ा। उन्होंने कहा कि इसके विपरीत मुख्य समस्या थी चुनाव अभियान चलाने में पार्टी की अयोग्यता।
एओसी उस धड़े से जुड़ी हैं, जिसके सदस्य सोशलिस्ट नेता बर्नी सैंडर्स को अपना मार्ग-दर्शक मानते हैं। सैंडर्स यह पहले ही कह चुके थे कि जो बाइडन के जीतने के बाद वे अपना सौ दिन का एजेंडा जारी करेंगे। वे मांग करेंगे कि भावी बाइडन प्रशासन इस पर सौ दिन में अमल करे, वरना सोशलिस्ट और प्रगतिशील खेमा आंदोलन की राह अपनाएगा।
रविवार को सैंडर्स ने यही बात कहते हुए फिर से अपना एक वीडियो जारी किया। सैंडर्स के एजेंडे में न्यूनतम मजदूरी 15 डॉलर प्रति घंटे करना, कॉलेज और यूनिर्सिटी की शिक्षा मुफ्त करना, सबको स्वास्थ्य देखभाल की सुविधा मुफ्त मुहैया करना, और जलवायु परिवर्तन रोकने के लिए ग्रीन इंडस्ट्री और इन्फ्रास्ट्रक्चर तैयार करने की योजना पर काम शुरू करना प्रमुख है।
इस चुनाव में प्रगतिशील खेमे को काफी कामयाबी मिली है। उसने सीनेट और हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव के 30 सदस्य डेमोक्रेटिक पार्टी के टिकट पर खड़े किए थे। उनमें से 26 जीत गए। उनमें एओसी, रशिदा तलाइब, इल्हान उमर, अनाया प्रेसली, कोरी बुश और भारतीय मूल के रो खन्ना और प्रमिला जयपाल भी शामिल हैं। इसके अलावा चुनाव के साथ कई शहरों की सिटी काउंसिल ने न्यूनतम मजदूरी, शिक्षा को पब्लिक सेक्टर में लाने और स्वास्थ्य देखभाल की सेवाओं में विस्तार के सवालों पर जनमत संग्रह भी कराए थे, जिनमें कई जगहों पर इन मुद्दों की जीत हुई। 15 डॉलर प्रति घंटे न्यूनतम मजदूरी का मुद्दा फ्लोरिडा राज्य में भी पास हो गया, जहां से चुनाव डोनाल्ड ट्रंप जीते हैं। इस कामयाबी से प्रगतिशील खेमे का उत्साह बढ़ा हुआ है।
इससे दक्षिणपंथी खेमा चिंतित है। उसकी दलील है कि पुलिस के बजट में कटौती और पब्लिक सेक्टर में शिक्षा एवं स्वास्थ्य सेवाओं को लाने की मांग से समाज के कंजरवेटिव हिस्से में उलटी प्रतिक्रिया हुई। इस कारण डेमोक्रेटिक पार्टी को उतनी बड़ी जीत हासिल नहीं हो सकी, जिसकी उम्मीद की गई थी।
दोनों खेमो में टकराव पैदा होगा, ये अनुमान पहले से था। लेकिन यह जीत के दिन ही शुरू हो जाएगा, यह नहीं सोचा गया था। इस टक्कर ने जो बाइडन के सामने बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है- वे किस तरफ झुकें। दोनों में से किसी पक्ष को असंतुष्ट करने के अपने नुकसान है। लेकिन बाइडन मध्यमार्गी और समझौता कर चलने वाले माने जाते हैं। अब उनकी इस क्षमता का कड़ा इम्तहान होगा।