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Dadabhai Naoroji: दादाभाई नौरोजी के लंदन स्थित मकान को ‘ब्लू प्लैक’ सम्मान, जानिए कब तक रहे इस घर में

लंदन, एजेंसी Published by: Jeet Kumar Updated Fri, 12 Aug 2022 12:21 AM IST
सार

दस्तावेजों के अनुसार, वाशिंगटन हाउस लंदन में भारतीय समुदाय के लिए एक महत्वपूर्ण केंद्र था, जहां कई भारतीयों को आमंत्रित किया जाता था। इंग्लिश हैरीटेज ने कहा, नौरोजी (Dadabhai Naoroji) ने 1904 या 1905 में इस मकान को छोड़ा था।

दादाभाई नौरोजी
दादाभाई नौरोजी - फोटो : सोशल मीडिया
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विस्तार

भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के सदस्य रहे और ब्रिटेन के पहले भारतीय सांसद दादाभाई नौरोजी (Dadabhai Naoroji) दक्षिण लंदन के जिस घर में करीब आठ वर्षों तक रहे, उसे ‘ब्लू प्लैक’ यानी नीली पट्टिका से सम्मानित किया गया है।



‘इंग्लिश हैरिटेज’ चैरिटी की योजना ‘ब्लू प्लैक’ लंदन की ऐतिहासिक महत्व की इमारतों को दिया जाने वाला एक सम्मान है। नौरोजी को यह सम्मान बुधवार को दिया गया और यह ऐसे वक्त में दिया गया है जब भारत अपनी आजादी की 75वीं वर्षगांठ मना रहा है।


नौरोजी 19वीं सदी के अंत में करीब आठ वर्षों तक लंदन के इस घर में रहे थे। भारतीय राजनीति के पितामाह कहलाने वाले नौरोजी ऐसे वक्त में वाशिंगटन हाउस, 72 एनर्ले पार्क, पेंगे, ब्रोमली रहने गए थे जब वे वैचारिक तौर पर 1897 में भारत की पूर्ण आजादी के समर्थक बन रहे थे। लाल रंग की ईंटों से बने इस घर के बाहर अब एक पट्टिका लगी है, जिस पर लिखा है, ‘दादाभाई नौरोजी 1825-1917 भारतीय राष्ट्रवादी और सांसद यहां रहे थे।’

इंग्लिश हैरिटेज ने एक बयान में कहा है कि नौरोजी सात बार इंग्लैंड गए और लंदन में अपनी जिंदगी का तीन दशक से अधिक का वक्त गुजारा। अगस्त 1897 में वह वाशिंगटन हाउस गए। यहां उनका अधिकांश वक्त वेल्बी आयोग के सदस्य के रूप में काम करते हुए बीता। दस्तावेजों के अनुसार, वाशिंगटन हाउस लंदन में भारतीय समुदाय के लिए एक महत्वपूर्ण केंद्र था, जहां कई भारतीयों को आमंत्रित किया जाता था। इंग्लिश हैरीटेज ने कहा, नौरोजी ने 1904 या 1905 में इस मकान को छोड़ा था। इसके साथ ही यह लंदन में उनका ऐसा मकान बन गया, जहां वह सबसे लंबे समय तक रहे।

पारसी परिवार में हुआ था जन्म
मुंबई में एक पारसी परिवार में जन्मे नौरोजी भारत और ब्रिटेन दोनों जगह एक प्रभावशाली और बुद्धिजीवी नेता थे। उनके अधिकांश काम ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन के उनके तथाकथित ड्रेन थ्योरी पर आधारित थे। ड्रेन सिद्धांत ने ब्रिटिश उपनिवेशवाद की क्लासिक भारतीय राष्ट्रवादी व्याख्या का आधार बनाया। 

ब्रिटेन की संसद में बैठने वाले पहले भारतीय 
नौरोजी ने सात स्पैल इंग्लैंड में बिताए, जिनमें से पांच लंदन में थे। 1886 में, वह मध्य लंदन में होलबोर्न के लिए एक उदार उम्मीदवार के रूप में आम चुनाव में संसद के लिए खड़े हुए, लेकिन हार गए। वह जुलाई 1892 के आम चुनाव में फिन्सबरी सेंट्रल के उत्तरी लंदन निर्वाचन क्षेत्र के लिए लिबरल टिकट पर चुने गए और ब्रिटेन की संसद में बैठने वाले पहले भारतीय के रूप में इतिहास रच दिया।

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