कोरोना संकट: तीन अरब लोगों के पास नहीं है हाथ धोने का पानी! भारत तेरहवां
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कोरोना वायरस ने इस समय पूरी दुनिया में हाहाकार मचा रखा है। वैश्विक माहमारी घोषित किए जाने के बाद से पूरी दुनिया में 21,200 से अधिक लोगों की जान जा चुकी है। लेकिन क्या आप जानते हैं कोरोना संकट के अलावा पूरी दुनिया के कई देश एक और संकट से जूझ रहे हैं। जी हां, यह संकट है पानी की कमी का। आइए जानते हैं क्या है इसकी वजह और मायने...
कोरोना वायरस ने इस समय पूरी दुनिया में हाहाकार मचा रखा है। वैश्विक माहमारी घोषित किए जाने के बाद से पूरी दुनिया में 21,200 से अधिक लोगों की जान जा चुकी है। लेकिन क्या आप जानते हैं कोरोना संकट के अलावा पूरी दुनिया के कई देश एक और संकट से जूझ रहे हैं। जी हां, यह संकट है पानी की कमी का। आइए जानते हैं क्या है इसकी वजह और मायने...
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बार-बार हाथ धोने की जरूरत
विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) ने कोरोना वायरस के संकट के समय बार-बार हाथ धोने को सबसे जरूरी बुनियादी एहतियाती कदम बताया है। लेकिन दुनियाभर के कई देश पानी की कमी से जूझ रहे हैं। क्लाइमेट ट्रेंड्स के विश्लेषण में इसे वॉटर स्ट्रेस या जल तनाव कहा गया है।
क्लाइमेट ट्रेंड्स के विश्लेषण के मुताबिक, कोरोना के कहर से बुरी तरह प्रभावित ईरान वॉटर स्ट्रेस या जल तनाव के मामले में दुनिया में चौथे नंबर पर है। जबकि भारत इस मामले में 13वें स्थान पर है।हाथ धोने के पानी की कमी
वर्ष 2019 के जो आंकड़े आए हैं, उनके हिसाब से 17 देश पानी की कमी से सबसे ज्यादा प्रभावित हैं। इनमें से 12 देश मिडिल ईस्ट और अफ्रीका के हैं। भारत इनमें 13वें स्थान पर है। हालांकि आबादी के घनत्व के हिसाब से उसकी आबादी बाकी 12 देशों के मुकाबले लगभग 2 से 3 गुना ज्यादा है।क्या है पानी की कमी का खतरा
रोज बढ़ती संख्या इस बात की गवाही दे रही है। बीती 19 मार्च तक ही ईरान में 18,407 मामले दर्ज किए गए थे। ईरान वह चौथा देश है जो सबसे ज्यादा वाटर स्ट्रेस्ड यानी जल की कमी झेल रहा है। वहीं इस्राइल इस मामले में दूसरे नंबर पर है।कैसे है पानी की कमी का खतरा
कोरोना वायरस की बाहरी दीवार वसायुक्त है। इस कारण साबुन से हाथ धोना ही सबसे अच्छा विकल्प माना जा रहा है। इसलिए इसमें पानी की जरूरत पड़ेगी ही।
दुनिया की 80 फीसदी आबादी प्रभावित
पानी की कमी के किसी ना किसी स्तर का दुनिया की करीब 80 प्रतिशत आबादी पहले से ही सामना कर रही है। इस कारण यह आबादी वैश्विक महामारी बन चुके कोविड-19 का सामना करने के लिए बेहद असुरक्षित है, क्योंकि वह इस वायरस से निपटने के लिए हाथ बार-बार धोने जैसे बुनियादी सुरक्षा उपायों को अपनाने के लिए भी जद्दोजहद कर रही है।78 करोड़ लोगों के पास पीने के पानी नहीं
रोज 17 लीटर तक की जरूरत
जो कि मरुस्थलीकरण का कारण बनता है और धरती के जमे हुए क्षेत्रों को पिघलाता है जो मीठे पानी के महत्वपूर्ण भंडार हैं। यह आगे चलकर कोविड-19 जैसी बीमारी के प्रकोप से निपटने के लिए हमारे लचीलेपन को कम करेगा।
मरुस्थलीकरण के कई कारण हैं जिनमें मानव गतिविधि और जलवायु परिवर्तन शामिल हैं। अनुमान है कि मरुस्थलीकरण का सीधा प्रभाव 25 करोड़ लोगों पर पड़ रहा है। 1 अरब लोग अप्रत्यक्ष रूप से और 3 अरब हेक्टेयर सूखे इलाकों में क्षय की स्थिति से गुजर रहे हैं।एशिया और अफ्रीका सबसे ज्यादा प्रभावित
अनुमान ये भी हैं..
साल 2025 तक दुनिया की आधी आबादी वॉटर स्ट्रेस वाले क्षेत्रों में रहने लगेगी। साल 1980 के बाद से पानी की वैश्विक मांग 1 फीसदी प्रतिवर्ष की दर से बढ़ रही है। सबसे कम विकसित देशों में करीब 22 फीसदी स्वास्थ्य देखभाल सुविधाओं में जल सेवा शामिल नहीं है। हिंदकुश हिमालय क्षेत्र के ग्लेशियर 8.6 करोड़ भारतीयों सहित करीब 24 करोड़ लोगों के लिए एक महत्वपूर्ण जल आपूर्ति का स्रोत हैं।