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चिंता: क्या ब्रिटेन का इंटरनेट कानून बनेगा अभिव्यक्ति को दबाने का जरिया?
Wed, 30 Jun 2021 04:14 PM IST
योगेश साहू
वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला, लंदन।
वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला, लंदन।
Published by: योगेश साहू
Updated Wed, 30 Jun 2021 04:14 PM IST
सार
ब्रिटेन में प्रस्तावित इंटरनेट कानून ने सिविल सोसायटी, शिक्षा-शास्त्रियों और टेक इंडस्ट्री में गहरी चिंता पैदा कर दी है। ये आरोप लगाया गया है कि सरकार इस कानून के जरिए अपने हाथ में अत्यधिक ताकत इकट्ठा करना चाहती है।
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ब्रिटेन के नए प्रधानमंत्री बोरिस जॉनसन (फाइल फोटो)
- फोटो : एएनआई
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विस्तार
ब्रिटेन में प्रस्तावित इंटरनेट कानून ने सिविल सोसायटी, शिक्षा-शास्त्रियों और टेक इंडस्ट्री में गहरी चिंता पैदा कर दी है। ये आरोप लगाया गया है कि सरकार इस कानून के जरिए अपने हाथ में अत्यधिक ताकत इकट्ठा करना चाहती है। ऐसा होने पर अभिव्यक्ति की आजादी खतरे में पड़ेगी। ब्रिटिश सरकार ने ऑनलाइन सेफ्टी बिल के नाम से ये कानून बनाने की पहल की है। इसका मसौदा हाल में संस्कृति मंत्री ओलिविर डॉवडेन ने जारी किया था।
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इस बिल में सरकार को ऐसे अधिकार देने का प्रावधान हैं, जिनसे वह अभी लागू नियमों को बदल सकेगी। ब्रिटेन में अभी इंटरनेट विनियामक संस्था ऑफकॉम की तरफ से तैयार नियम लागू हैं। इनमें वो नियम भी हैं, जिसके जरिए टेक कंपनियां यूजर्स को संरक्षण देती हैं। आलोचकों का कहना है कि ये अधिकार अपने हाथ में लेकर सरकार इंटरनेट विनियमन को अपने हाथ में लेना चाहती है। सरकारी ड्राफ्ट पर जल्द ही ब्रिटिश संसद में चर्चा होने वाली है।
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सिविल सोसायटी संस्था ओपन राइट्स ग्रुप के नीति प्रबंधक हीदर बर्न्स ने वेबसाइट पॉलिटिको.ईयू से कहा- ये बात डरावनी है कि सरकार से नियुक्त किसी व्यक्ति के हाथ में अभिव्यक्ति की आजादी की सीमाएं तय करने के एकतरफा अधिकार आ जाएंगे। जानकारों का कहना है कि इस बिल को संसद की मंजूरी पाने के लिए अभी कई चरणों से गुजरना होगा। मंजूरी मिलते-मिलते ये साल खत्म हो सकता है। इसके बावजूद चूंकि ये प्रक्रिया शुरू हो गई है, इसलिए इसका अभी से विरोध शुरू हो गया है।
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पॉलिसी थिंक टैंक- कारनेगी ट्रस्ट ने भी इस बिल को लेकर चिंता जताई है। उसने कहा है- ‘ब्रिटेन अभिव्यक्ति की आजादी की रक्षा के लिए अंतरराष्ट्रीय रूप से वचनबद्ध है। इसका पालन करने के लिए जरूरी है कि सरकार और संचार विनियामक संस्था के अधिकारों के बीच स्पष्ट बंटवारा बना रहे।’ ट्रस्ट ने कहा कि अभी बिल में जो सरकारी नीति झलकती है, उससे ऑफकॉम की स्वतंत्रता पर खराब असर पड़ सकता है।
यूनिवर्सिटी ऑफ एसेक्स में इंटरनेट लॉ की प्रोफेसर लोर्ना वुड्स ने वेबसाइट पॉलिटिको से कहा- ‘मंत्री ऑफकॉम को निर्देश देने में सक्षम हो जाए, इस प्रावधान से मुझे बेचैनी होती है। यह चिंताजनक है।’ ऐसी ही चिंता ब्रिटेन की टेक कंपनियों ने भी जताई है। इस क्षेत्र की कंपनियों की नुमाइंदगी करने वाली संस्था टेक यूके के उप मुख्य कार्यकारी अधिकारी एंथनी वॉल्कर के मुताबिक इस बिल के कई प्रावधान, जिसे सामान्य समझा जाता है, उससे बाहर जाते हैं। उन्होंने कहा- ‘किसी लोकतांत्रिक समाज में स्वतंत्र विनियामक का होना एक अच्छी बात मानी जाती है।’
टेक लॉबिंग फर्म टेसो एडवाइजरी के प्रबंध निदेशक बेन ग्रीनस्टोन के मुताबिक यह अभूतपूर्व है कि इस बिल के जरिए मंत्री को यह अधिकार देने के लिए सोचा गया है कि वह स्वतंत्र विनियामक को निर्देश दे सकेगा। उन्होंने कहा कि ऐसे निर्देशों में राजनेताओं की मनमानी झलक सकती है। उससे विनियामक की कार्रवाई राजनीतिक रूप ले लेगी।