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कोयले के लद रहे हैं दिन, 2020 में लगे झटके से आगे भी राहत की उम्मीद नहीं

Thu, 07 Jan 2021 03:31 PM IST
Harendra Chaudhary वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला, वाशिंगटन
वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला, वाशिंगटन Published by: Harendra Chaudhary Updated Thu, 07 Jan 2021 03:31 PM IST
सार

2020 में बांग्लादेश, इंडोनेशिया, फिलीपींस और वियतनाम जैसे कोयले के बड़े उपभोक्ता देशों ने कोयला से चलने वाले कई बिजली संयंत्रों में काम रोक दिया। सिर्फ इन चारों देशों में 45 गीगावाट ताप बिजली बनाने वाले संयंत्रों में काम रुका...

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Coal production and use declined worldwide due to coronavirus, even this year coal production will not reach the pre-2020 level.
कोयला - फोटो : pixabay

विस्तार

बीते साल दुनिया भर में कोयले के उत्पादन और इस्तेमाल में गिरावट आई। कुछ विशेषज्ञों ने संभावना जताई है कि इस साल ये ट्रेंड एक हद तक पलट जाएगा। लेकिन आम धारणा यह बनी है कि इस साल भी कोयले का उत्पादन 2020 के पहले के स्तर तक नहीं पहुंच पाएगा। इसकी एक वजह कोरोना महामारी का कहर जारी रहना है, जिसके कारण बहुत से देशों में बार-बार लॉकडाउन लागू किया जा रहा है। लेकिन उससे बड़ी एक वजह यह है कि अलग-अलग देशों में जलवायु परिवर्तन रोकने संबंधी लक्ष्यों को हासिल करने के लिए कोयले के इस्तेमाल में कटौती की जा रही है।

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दुनिया में ऊर्जा के अलग-अलग रूपों के इस्तेमाल पर नजर रखने वाली अमेरिकी गैर सरकारी संस्था ग्लोबल एनर्जी मॉनिटर (जीईएम) ने अपनी ताजा रिपोर्ट में कहा है कि भविष्य में दक्षिण और दक्षिण-पूर्व एशिया कोयले की खुदाई और उसके इस्तेमाल के सबसे बड़े केंद्र बन जाएंगे। मगर वहां से कोयले के निर्यात की स्थिति क्या रहेगी, इस बारे में अभी कुछ नहीं कहा जा सकता, क्योंकि महामारी के कारण दुनिया के बाकी हिस्सों में हालत अनिश्चित बनी हुई है। फिर इस इलाके में भी कोयला का इस्तेमाल घटाने की नीतियां अपनाई जा रही हैं।
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जीईएम ने बताया है कि 2020 में बांग्लादेश, इंडोनेशिया, फिलीपींस और वियतनाम जैसे कोयले के बड़े उपभोक्ता देशों ने कोयला से चलने वाले कई बिजली संयंत्रों में काम रोक दिया। सिर्फ इन चारों देशों में 45 गीगावाट ताप बिजली बनाने वाले संयंत्रों में काम रुका। अब इन देशों में भी अक्षय ऊर्जा के स्रोतों का इस्तेमाल बढ़ाने की कोशिश की जा रही है।
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गौरतलब है कि वियतनाम में बीते साल बिजली विकास योजना का नया प्रारूप पेश किया गया था। इसमें कोयला से चलने वाले सात संयंत्रों को बंद कर देने और छह में कामकाज को 2030 तक स्थगित कर देने का इरादा जताया गया। इन 13 संयंत्रों में काम रुकने का मतलब है कि वियतनाम कोयले से बनने वाली बिजली में लगभग 50 फीसदी कटौती कर लेगा। इसी तरह पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान ने पिछले महीने घोषणा की थी कि अब आगे देश में कोयला से चलने वाला कोई बिजली संयंत्र नहीं लगाया जाएगा।

जानकारों का कहना है कि इनमें से कई घोषणाएं मजबूरी में की गई हैं। जलवायु परिवर्तन के मुद्दे पर बने जन दबाव के कारण अब कई अंतरराष्ट्रीय संस्थाएं और बैंक कोयला संचालित परियोजनाओं के लिए कर्ज देने से इनकार कर रहे हैं। इन संस्थाओं ने अक्षय ऊर्जा के लिए फंडिंग बढ़ा दी है। मसलन, मलेशिया के बैंक सीआईएमबी ने पिछले महीने एलान किया कि वह आगे कोयला संचालित परियोजनाओं को फंडिंग नहीं करेगा। जबकि पिछले दशक में इस बैंक ने कोयला संचालित संयंत्रों के लिए 2.6 अरब डॉलर का ऋण दिया था। अब इस तरह का एलान करने वाला ये पहला बैंक बन गया है।

सीआईएमबी ने जलवायु परिवर्तन रोकने के लिए हुई पेरिस संधि की शर्तों को स्वीकार करते हुए ये घोषणा की है। इस संधि में 2040 तक कोयला संचालित सभी योजनाओं के लिए फंडिंग रोकने का प्रावधान है। इसी तरह एईएस कॉरपोरेशन ने एलान किया है कि वह वियतनाम में 1,242 मेगावाट के कोयला संचालित बिजली संयंत्र दुओंग-2 में अपने शेयर बेच देगा। कोयला परियोजनाओं के लिए अब तक फंडिंग के स्रोत रहे ऑस्ट्रेलिया सुपर और नॉर्वे सरकार के पेंशन फंड ग्लोबल भी ऐसी ही योजना बना रहे हैं।


इसीलिए उन भविष्यवाणियों के सच होने पर शक जताया गया है, जिनमें कोयले के उपयोग में आई कमी के लिए कोरोना महामारी को जिम्मेदार मानते हुए कोयले के अच्छे दिन लौट आने की बात कही गई है। इसलिए जीईएम ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि कोयले की वापसी को लेकर जताई गई उम्मीदों के विपरीत जमीनी रूझान कुछ और संकेत दे रहे हैं। असल में अक्षय ऊर्जा के स्रोतों पर बढ़ते जोर के बीच ऐसा लगता है कि कोयले का दौर अब समाप्त होने जा रहा है।

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