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चीनः जानिए एक किसान से कैसे राष्ट्रपति के पद तक पहुंचे शी जिनपिंग

Wed, 18 Oct 2017 03:58 PM IST
कैरी ग्रेसी
कैरी ग्रेसी Updated Wed, 18 Oct 2017 03:58 PM IST
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Xi Jinping once upon a time farmer who became president of china
Xi jinping

इक्कीसवीं सदी में ऐसे बहुत कम नेता हैं जो गुफा में रहे हों, जिन्होंने खेतों में मेहनत की हो। फिर वो सत्ता के शिखर पर पहुंचे हों। पांच दशक पहले जब चीन में सांस्कृतिक क्रांति का तूफान आया हुआ था, उस वक्त पंद्रह बरस के लड़के शी जिनपिंग ने देहात में मुश्किल भरी जिंदगी की शुरुआत की थी। चीन के अंदरूनी इलाके में जहां चारों तरफ पीली खाइयां थीं, ऊंचे पहाड़ थे, वहां से जिनपिंग की जिंदगी की जंग शुरु हुई थी। 

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जिस इलाके में जिनपिंग ने खेती-किसानी की शुरुआत की थी, वो गृह युद्ध के दौरान चीन के कम्युनिस्टों का गढ़ था। येनान के लोग अपने इलाके को चीन की लाल क्रांति की पवित्र भूमि कहते थे।
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अब चीन की कम्युनिस्ट पार्टी की कांग्रेस में शी जिनपिंग के राष्ट्रपति के तौर पर पांच साल के दूसरे कार्यकाल पर मुहर लगेगी। वो आज एक ऐसे देश की अगुवाई कर रहे हैं, जो बड़ी तेज़ी से दुनिया की सुपरपावर के तौर पर उभर रहा है। लेकिन चीन ऐसा देश है जो इस बात पर कड़ी निगाह रखता है कि उसके नेता के बारे में क्या कहा जाता है।
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शी जिनपिंग की अपनी कहानी को काफी हद तक काट-छांटकर पेश किया जाता है। दिलचस्प बात ये है कि जहां चीन के तमाम अंदरूनी इलाकों का तेजी से शहरीकरण हो रहा है, वहीं राष्ट्रपति शी के गांव को जस का तस रखा गया है। कम्युनिस्ट पार्टी के भक्तों के लिए वो एक तीर्थस्थल है।

जमीनी जुड़ाव

Xi Jinping once upon a time farmer who became president of china
Xi Jinping

1968 में चेयरमैन माओ ने फरमान जारी किया था कि लाखों युवा लोग शहर छोड़कर गांवों में जाएं। वहां वो जिंदगी की मुश्किलात का सामना करके, आगे बढ़ने के सबक किसानों और मजदूरों से सीखें। शी जिनपिंग कहते हैं कि उस तजुर्बे से उन्होंने भी बहुत कुछ सीखा। शी का कहना है कि आज वो जो कुछ भी हैं, वो उसी दौर की वजह से हैं। उनका किरदार उसी गुफा वाले दौर ने गढ़ा। जिनपिंग अक्सर कहा करते हैं, 'मैं पीली मिट्टी का बेटा हूं।  मैंने अपना दिल लियांगजिआहे में छोड़ दिया था। उसी जगह ने मुझे बनाया'।

जिनपिंग कहते हैं कि, 'जब मैं लियांगजिआहे पहुंचा तो पंद्रह बरस का लड़का था। मैं फिक्रमंद था, मुझे कुछ समझ में नहीं आ रहा था, लेकिन 22 बरस का होते-होते मेरी सारी शंकाएं दूर हो गई थीं। मैं आत्मविश्वास से लबरेज था। मेरी जिंदगी का मक़सद पूरी तरह साफ हो चुका था'।

उस दौर में हर शख्स चेयरमैन माओ की मशहूर छोटी लाल किताब पढ़ा करता था। आज चेयरमैन शी के खयालात बड़ी-बड़ी लाल होर्डिंग पर लिखे दिखाई देते हैं। उनके सम्मान में एक म्यूजियम भी बनाया गया है। इस म्यूजियम में इस बात का ज़िक्र मिलता है कि उन्होंने अपने साथी किसानों-मजदूरों के लिए क्या-क्या अच्छे काम किए। लेकिन इन किस्सों को इस तरह काट-छांटकर पेश किया गया है कि उसमें शी जिनपिंग की जिंदगी की असली कहानी का पता लगाना बेहद मुश्किल है।

राष्ट्रपति के तौर पर अपने पहले पांच साल के कार्यकाल में शी जिनपिंग ने अपना एक महान इंसान का किरदार गढ़ा है। वो खुद को एक ऐसे शख्स के तौर पर पेश करते हैं, जो जनता का नेता है। वो अक्सर गली-कूचों की सैर पर जाते हैं। वो गरीबों के घर जाया करते हैं। वो जनता की जुबान में बात करते हैं। वो अक्सर छात्रों को बताते हैं कि जिंदगी एक बटन वाली कमीज है, जिसके शुरू के बटन सही तरीके से लगाने चाहिए, वरना सारे बटन गलत बंद होते हैं। वो कई बार लंच के लिए कतार में खड़े हुए हैं। वो अपने खाने का बिल खुद भरते हैं।

तजुर्बा
लेकिन एक मिथक के तौर पर शी जिनपिंग की कहानी का केंद्र है उनका गुफा में बिताया हुआ शुरुआती जीवन। जहां वो सियासत से अलग कर दिए गए थे। जिनपिंग कहते हैं, 'जिनको सत्ता का तजुर्बा कम है, वो इसे नया और राज़दाराना तजुर्बा समझते हैं। लेकिन मैं इन पर्दों के पार, बड़ी गहराई से सियासत को देखता हूं। मैं फूलों के हार और तालियों की गड़गड़ाहट से परे हटकर देखता हूं। मैं नजरबंदी वाले घर देखता हूं। मैं इंसानी रिश्तों की कमज़ोरी देखता हूं। मैं राजनीति को गहराई से समझता हूं'।

बचपन से जवानी के बीच शी जिनपिंग दोनों तरह की जिंदगी का तजुर्बा कर चुके थे। उनके पिता भी कम्युनिस्ट क्रांति के हीरो थे। ऐसे में शी ने एक राजकुमार वाली जिंदगी का तजुर्बा भी किया था। 2009 के एक खुफिया अमरीकी केबल के मुताबिक़, शी के एक करीबी दोस्त ने बताया था कि उनके शुरुआती दस सालों ने उनके किरदार की बुनियाद रखी थी। इसके बाद कम्युनिस्ट क्रांति के दौरान जब वो किसानों के बीच रहे, तो उस तजुर्बे ने भी उनकी आगे की जिंदगी पर गहरा असर डाला था।

जान का खतरा

Xi Jinping once upon a time farmer who became president of china
xi jinping

लेकिन साठ के दशक में चेयरमैन माओ ने अपनी ही पार्टी के नेताओं पर जो ज़ुल्म ढाए, उसका सितम शी जिनपिंग को भी उठाना पड़ा था। पहले तो शी के पिता को पार्टी से बाहर कर दिया गया, फिर उन्हें जेल भेज दिया गया। शी के परिवार को बहुत शर्मिंदगी उठानी पड़ी थी। उनकी एक बहन की मौत हो गई। शायद उसने खुदकुशी कर ली थी।13 साल की उम्र में ही शी जिनपिंग की पढ़ाई बंद हो गई थी, क्योंकि बीजिंग के सारे स्कूल बंद कर दिए गए थे। ऐसा इसलिए ताकि छात्र अपने अध्यापकों की निंदा कर सकें, उन्हें पीट सकें या फिर उन्हें जान से मार सकें। परिवार और दोस्तों के बग़ैर, शी जिनपिंग काफ़ी दिनों तक माओ के बदनाम रेड गार्ड्स से बचते-छुपते फिरे थे। एक बार उन्होंने एक रिपोर्टर से एक एनकाउंटर का भी ज़िक्र किया था।

शी जिनपिंग ने बताया था कि, 'मैं केवल 14 बरस का था। रेड गार्ड्स ने मुझसे पूछा कि तुम अपने जुर्म को कितना गंभीर मानते हो? मैंने कहा कि तुम खुद अंदाजा लगा लो, क्या ये मुझे मारने के लिए काफी है? रेड गार्ड्स ने कहा कि हम तुम्हें सैकड़ों बार मार सकते हैं। मेरे हिसाब से एक बार मरने या बार-बार मारे जाने में कोई फ़र्क़ नहीं'।
उत्तर कोरिया लड़ा तो चीन साथ नहीं देगा। शी की पीढ़ी के बहुत से चीनी लोग ये मानते हैं कि उस दौर में जब स्कूल बंद हो गए थे, जब वो जान बचाकर छुपते फिर रहे थे। तब की मुश्किलों ने उनके ज़हन पर गहरा असर डाला था। उन्हें मज़बूत बनाया था।

पढ़ाई का शौक
खुद शी जिनपिंग कहते हैं कि मुझे अपनी ग़लतियां बताए जाने में लुत्फ़ आने लगा था. हालांकि वो ये भी कहते हैं कि हर किसी की बात को वो गंभीरता से नहीं लेते थे।
साठ के दशक में चीन के गांवों की ज़िंदगी बहुत कठिन थी। बिजली नहीं हुआ करती थी। गांवों तक जाने का रास्ता भी पक्का नहीं होता था। खेती के लिए मशीनें भी नहीं थीं। उस दौर में शी ने खाद ढोने, बांध बनाने और सड़कों की मरम्मत का काम सीखा था।

वो जिस गुफा में रहते थे, वहां कीड़े-मकोड़ों का डेरा होता था। उस में वो ईंटों वाले बिस्तर पर तीन और लोगों के साथ सोया करते थे। उस वक्त खाने के लिए उन्हें दलिया, बन और कुछ सब्ज़ियां मिला करते थे। उनके एक किसान साथी लू होउशेंग ने बताया था कि भूख लगने पर ये कोई नहीं देखता था कि खाने में मिल क्या रहा है। रात में शी जिनपिंग अपनी गुफा में ढिबरी की रौशनी में पढ़ा करते थे। उन्हें पढ़ने का शौक था वो सिगरेट भी बहुत पीते थे। वो अक्सर माओ के भाषण और अख़बार पढ़ा करते थे। क्योंकि पढ़ने के लिए इसके सिवा कुछ और था ही नहीं।

महत्वकांक्षा
शी के दोस्त लू ने बताया कि शी बहुत संजीदा रहा करते थे। हंसी-मज़ाक़ उन्हें नहीं पसंद था। वो न तो दोस्तों के साथ खेला कूदा करते थे। न ही उनकी दिलचस्पी गर्लफ्रैंड बनाने में थी। 18 की उम्र में वो अपना सियासी सफर शुरू करने के लिए तैयार थे। वो कम्यूनिस्ट यूथ लीग में शामिल हो गए। 21 साल की उम्र में वो बार-बार ठुकराए जाने के बावजूद कम्युनिस्ट पार्टी के सदस्य बन गए। शुरुआत से ही वो ज़मीनी हक़ीक़त से वाबस्ता थे। उनकी निगाह हमेशा लक्ष्य पर होती थी। जब उनके दोस्त खेलने-कूदने में मसरूफ़ होते थे, तब वो काम में लगे रहते थे। वो बेहद महत्वाकांक्षी थे। कम्युनिस्ट क्रांति के बाद वो कट्टर कम्युनिस्ट बन गए थे।

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