{"_id":"688049bd7c3738e00405543e","slug":"china-tibet-dam-on-brahmaputra-river-arunachal-pradesh-assam-bangladesh-india-concern-northeast-expert-analyse-2025-07-23","type":"feature-story","status":"publish","title_hn":"चीन बना रहा विश्व का सबसे बड़ा बांध: 14 लाख करोड़ के डैम से भारत क्यों चिंतित, निपटने की क्या योजना?","category":{"title":"World","title_hn":"दुनिया","slug":"world"}}
चीन बना रहा विश्व का सबसे बड़ा बांध: 14 लाख करोड़ के डैम से भारत क्यों चिंतित, निपटने की क्या योजना?
Wed, 23 Jul 2025 08:02 AM IST
कीर्तिवर्धन मिश्र
स्पेशल डेस्क, अमर उजाला
स्पेशल डेस्क, अमर उजाला
Published by: कीर्तिवर्धन मिश्र
Updated Wed, 23 Jul 2025 08:02 AM IST
सार
चीन की तिब्बत में बांध के निर्माण की पूरी योजना क्या है? वह इस बांध का निर्माण किन कारणों से करने की बात कह रहा है? इसमें क्या खतरे हैं? इसके अलावा भारत और बांग्लादेश में इस बांध को लेकर क्या चिंताएं जताई जा रही हैं? भारत ने चीन के इस कदम से निपटने के लिए क्या तैयारी करने की बात कही है? आइये जानते हैं...
विज्ञापन
चीन के तिब्बत में बन रहे बांध से भारत चिंतित।
- फोटो : अमर उजाला
Please wait...
विस्तार
चीन ने बीते साल दिसंबर में तिब्बत में ब्रह्मपुत्र नदी पर दुनिया का सबसे बड़ा बांध बनाने का एलान किया था। इस घोषणा के महज छह महीने बाद ही चीन सरकार ने इस बांध का निर्माण शुरू भी कर दिया है। चीन का कहना है कि यह उसका सबसे बड़ा इन्फ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट है, जो कि उसके पिछले बड़े प्रोजेक्ट थ्री गॉर्जेस डैम से कई गुना बड़ा है। इस परियोजना के जरिए चीन अपनी ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने की बात कहता है, हालांकि इस प्रोजेक्ट को लेकर न सिर्फ तमाम विशेषज्ञों ने चिंता जाहिर की है, बल्कि इसे लेकर अब दो देशों- भारत और बांग्लादेश में पानी की जरूरतों को लेकर भी चिंता पैदा हो गई है। इतना ही नहीं चीन के इस फैसले के बाद भारत सरकार कूटनीतिक रूप से भी सक्रिय हो गई है।
ऐसे में यह जानना अहम है कि आखिर चीन की तिब्बत में बांध के निर्माण की पूरी योजना क्या है? वह इस बांध का निर्माण किन कारणों से करने की बात कह रहा है? इसमें क्या खतरे हैं? इसके अलावा भारत और बांग्लादेश में इस बांध को लेकर क्या चिंताएं जताई जा रही हैं? भारत ने चीन के इस कदम से निपटने के लिए क्या तैयारी करने की बात कही है? आइये जानते हैं...
विज्ञापन
ऐसे में यह जानना अहम है कि आखिर चीन की तिब्बत में बांध के निर्माण की पूरी योजना क्या है? वह इस बांध का निर्माण किन कारणों से करने की बात कह रहा है? इसमें क्या खतरे हैं? इसके अलावा भारत और बांग्लादेश में इस बांध को लेकर क्या चिंताएं जताई जा रही हैं? भारत ने चीन के इस कदम से निपटने के लिए क्या तैयारी करने की बात कही है? आइये जानते हैं...
विज्ञापन
पहले जानें- तिब्बत में क्यों बांध बनाने में जुटा चीन?
चीन की तरफ से तिब्बत में ब्रह्मपुत्र नदी पर बांध बनाने की योजना कोई नई नहीं है। इसे लेकर चीन ने एलान भले ही दिसंबर 2024 में किया हो, लेकिन वह 2020 से ही तिब्बत में बांध बनाने की तैयारी कर रहा है। चीन का दावा है कि वह इस बांध का निर्माण इसलिए कर रहा है ताकि 2060 तक वह ऊर्जा पैदा करने के मामले में जीवाश्म ईंधन पर निर्भरता को कम कर सके और कार्बन न्यूट्रल देश का लक्ष्य हासिल कर सके। इसलिए वह तिब्बत में एक हाइड्रोपावर प्रोजेक्ट के जरिए ऊर्जा पैदावार को बढ़ावा देना चाहता है। हालांकि, विशेषज्ञों का मानना है कि प्रोजेक्ट के पीछे सिर्फ ऊर्जा जरूरत पूरी करने की बात सिर्फ बहाना है और चीन इसके जरिए कूटनीतिक लाभ लेने की फिराक में है।
चीन की तरफ से तिब्बत में ब्रह्मपुत्र नदी पर बांध बनाने की योजना कोई नई नहीं है। इसे लेकर चीन ने एलान भले ही दिसंबर 2024 में किया हो, लेकिन वह 2020 से ही तिब्बत में बांध बनाने की तैयारी कर रहा है। चीन का दावा है कि वह इस बांध का निर्माण इसलिए कर रहा है ताकि 2060 तक वह ऊर्जा पैदा करने के मामले में जीवाश्म ईंधन पर निर्भरता को कम कर सके और कार्बन न्यूट्रल देश का लक्ष्य हासिल कर सके। इसलिए वह तिब्बत में एक हाइड्रोपावर प्रोजेक्ट के जरिए ऊर्जा पैदावार को बढ़ावा देना चाहता है। हालांकि, विशेषज्ञों का मानना है कि प्रोजेक्ट के पीछे सिर्फ ऊर्जा जरूरत पूरी करने की बात सिर्फ बहाना है और चीन इसके जरिए कूटनीतिक लाभ लेने की फिराक में है।
चीन ने इस बांध को 2030 तक बनाने का लक्ष्य तय किया है। बताया गया है कि जब यह बांध बनकर तैयार हो जाएगा, उस वक्त यह दुनिया में हरित ऊर्जा का सबसे बड़ा स्रोत होगा। इससे पैदा होने वाली ऊर्जा मध्य चीन के यांग्त्जे नदी पर बने 'थ्री गॉर्जेस डैम' के मुकाबले तीन गुना होगी।
नहीं मान रहा चीन: ब्रह्मपुत्र नदी पर शुरू किया दुनिया का सबसे बड़े बांध का निर्माण; भारत का है कड़ा विरोध
नहीं मान रहा चीन: ब्रह्मपुत्र नदी पर शुरू किया दुनिया का सबसे बड़े बांध का निर्माण; भारत का है कड़ा विरोध
तिब्बत में बन रहे इस बांध को लेकर क्या विवाद, खतरे कौन से?
- चीन की ओर से तिब्बत में बनाए जा रहे मेदोग बांध का निर्माण शुरू होने से पहले ही इस पर विवाद शुरू हो चुके हैं। दरअसल, इसे बनाने के लिए चीन 1.2 ट्रिलियन युआन (करीब 170 अरब डॉलर) यानी 14.4 लाख करोड़ रुपये तक खर्च कर रहा है। ऐसे में पर्यावरणविदों ने ऊर्जा जरूरतें पूरी करने के लिए इतनी बड़ी रकम के खर्च पर सवाल उठाए हैं।
- दूसरी तरफ तिब्बत के कार्यकर्ताओं का कहना है कि इस क्षेत्र में पहले से ही ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने के लिए कई बांध बनाए जा चुके हैं। ऐसे में एक और बड़ा बांध बनाकर नदी के बहाव को कम-ज्यादा करने से प्राकृतिक नुकसान की संभावना ज्यादा है। हालांकि, चीन ने कहा है कि वह निचले इलाकों में पर्यावरण का ध्यान रखेगा।
- बांध को लेकर एक खतरा यह भी जताया गया है कि यह ऐसे क्षेत्र में बन रहा है, जो कि फॉल्ट लाइन के काफी नजदीक है। यानी हिमालय में पड़ने वाला यह क्षेत्र भूकंप के लिए काफी सक्रिय है और इससे प्राकृतिक आपदा का खतरा लगातार बना रहता है। ऐसे में बांध में एक हल्की सी दरार से न सिर्फ पूरा प्रोजेक्ट, बल्कि बड़ी आबादी खतरे में आ सकती है।
- पर्यावरण कार्यकर्ताओं के मुताबिक, जिस जगह पर बांध बनाया जा रहा है, वहां यारलुंग सांगपो नदी 50 किमी के दायरे के अंतर्गत 2000 मीटर तक ढलान में चली जाती है। यह चीन का सबसे जैव विविधता वाला क्षेत्र है, जिसमें बड़ी मात्रा में प्राकृतिक संसाधन मौजूद हैं।
अब जानें- चीन के इस बांध को लेकर भारत में क्या चिंता?
बीते साल जब चीन ने इस प्रोजेक्ट को शुरू किए जाने से जुड़ा एलान किया था, तब भारत और बांग्लादेश दोनों ने प्रस्तावित बांध के प्रभावों को लेकर चिंताएं जाहिर की थीं। भारत ने आधिकारिक तौर पर जनवरी में इस मामले को उठाया था। वहीं बांग्लादेश ने फरवरी में चीन के सामने बांध निर्माण से होने वाली शंकाओं को सामने रखा था।
बीते साल जब चीन ने इस प्रोजेक्ट को शुरू किए जाने से जुड़ा एलान किया था, तब भारत और बांग्लादेश दोनों ने प्रस्तावित बांध के प्रभावों को लेकर चिंताएं जाहिर की थीं। भारत ने आधिकारिक तौर पर जनवरी में इस मामले को उठाया था। वहीं बांग्लादेश ने फरवरी में चीन के सामने बांध निर्माण से होने वाली शंकाओं को सामने रखा था।
दूसरी तरफ इसी महीने की शुरुआत में अरुणाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री पेमा खांडू ने भी न्यूज एजेंसी पीटीआई से बातचीत में इस प्रोजेक्ट को लेकर चिंता जाहिर की थी। उन्होंने चीन की इस परियोजना को चलता हुआ वॉटर बॉम्ब करार दिया था। यानी कि एक ऐसा बम, जिसके जरिए चीन कभी भी भारत के पूर्वोत्तर में स्थित राज्यों पर पानी छोड़कर उन्हें डुबा सकता है।
खांडू ने यह भी कहा था कि सबसे बड़ी चिंता इस बात पर है कि चीन अब तक अंतरराष्ट्रीय जल बंटवारे के समझौते का हिस्सा नहीं है। अगर वह इस समझौते का हिस्सा होता तो यह भारत के लिए बेहतर होता, क्योंकि इससे पानी छोड़ने के नियम तय हो जाते हैं। लेकिन उसका समझौते में न होना बड़ी समस्या है। खांडू ने बताया था- "मान लीजिए कि बांध को बना लिया जाता है और यह अचानक से पानी छोड़ दे, तो हमारी पूरी सियांग बेल्ट तबाह हो सकती है। खासकर यहां रहने वाली आदि कबीले को जनजीवन का नुकसान हो सकता है।"
पेमा खांडू की तरह का ही बयान अरुणाचल प्रदेश के उपमुख्यमंत्री चाउना मीन ने भी दिया था। उन्होंने कहा था कि यारलुंग सांगपो नदी पर बड़ा बांध सियांग नदी को नीचे आते-आते कम पानी के साथ छोड़ सकता है। इससे नदी में पाए जाने वाले जली जीवों और असम-बांग्लादेश की बड़ी आबादी मुश्किल में आ सकती है, क्योंकि यह क्षेत्र कृषि क्षेत्रों में सिंचाई के लिए ब्रह्मपुत्र के पानी पर निर्भर हैं।
पेमा खांडू की तरह का ही बयान अरुणाचल प्रदेश के उपमुख्यमंत्री चाउना मीन ने भी दिया था। उन्होंने कहा था कि यारलुंग सांगपो नदी पर बड़ा बांध सियांग नदी को नीचे आते-आते कम पानी के साथ छोड़ सकता है। इससे नदी में पाए जाने वाले जली जीवों और असम-बांग्लादेश की बड़ी आबादी मुश्किल में आ सकती है, क्योंकि यह क्षेत्र कृषि क्षेत्रों में सिंचाई के लिए ब्रह्मपुत्र के पानी पर निर्भर हैं।
भारत की चिंताएं कितनी सही?
ऐसा नहीं है कि चीन के बांध को लेकर भारत की तरफ से खतरे की आशंका निराधार है। बल्कि अंतरराष्ट्रीय विशेषज्ञ भी इस मसले को उठा चुके हैं। 2022 में एशिया ग्लोबल ऑनलाइन में भू-राजनीतिक और वैश्विक कूटनीति मामले के सलाहकार जॉनवीव डॉनेलन-मे ने लिखा था कि ब्रह्मपुत्र भारत और चीन के सामाजिक-आर्थिक विकास के लिए जरूरी है। यह भारत के 30 फीसदी मीठे जल के संसाधन और 40 फीसदी जलीय ऊर्जा की क्षमता वाला संसाधन है। चीन के लिए पीने के पानी के लिहाज से ब्रह्मपुत्र इतना मायने नहीं रखथी, लेकिन तिब्बत के कृषि क्षेत्र और ऊर्जा उद्योग के लिए यह बड़ी भूमिका निभाती है। उन्होंने कहा था कि भारत लंबे समय से ब्रह्मपुत्र में चीन के ऊर्जा पैदा करने वाले बांधों पर नजर रख रहा है। कई भारतीय विशेषज्ञ इसे चीन और भारत के बीच जल युद्ध की तरफ बढ़ता भी देखते हैं।
ऐसा नहीं है कि चीन के बांध को लेकर भारत की तरफ से खतरे की आशंका निराधार है। बल्कि अंतरराष्ट्रीय विशेषज्ञ भी इस मसले को उठा चुके हैं। 2022 में एशिया ग्लोबल ऑनलाइन में भू-राजनीतिक और वैश्विक कूटनीति मामले के सलाहकार जॉनवीव डॉनेलन-मे ने लिखा था कि ब्रह्मपुत्र भारत और चीन के सामाजिक-आर्थिक विकास के लिए जरूरी है। यह भारत के 30 फीसदी मीठे जल के संसाधन और 40 फीसदी जलीय ऊर्जा की क्षमता वाला संसाधन है। चीन के लिए पीने के पानी के लिहाज से ब्रह्मपुत्र इतना मायने नहीं रखथी, लेकिन तिब्बत के कृषि क्षेत्र और ऊर्जा उद्योग के लिए यह बड़ी भूमिका निभाती है। उन्होंने कहा था कि भारत लंबे समय से ब्रह्मपुत्र में चीन के ऊर्जा पैदा करने वाले बांधों पर नजर रख रहा है। कई भारतीय विशेषज्ञ इसे चीन और भारत के बीच जल युद्ध की तरफ बढ़ता भी देखते हैं।
चीन के सबसे बड़े बांध के खतरे से निपटने के लिए भारत क्या करेगा?
रिपोर्ट्स की मानें तो चीन की तरफ से ब्रह्मपुत्र नदी पर बांध बनने के बाद के खतरों से प्रभावी ढंग से निपटने के लिए भारत खुद भी अरुणाचल प्रदेश में एक बांध बनाने की तैयारी कर रहा है। इसे सियांग मल्टीपर्पस प्रोजेक्ट नाम दिया गया है, जो कि सियांग जिले में पानी स्टोर करने और ऊर्जा पैदा करने के लक्ष्य के साथ बनाया जाएगा। इस बांध को एक कूटनीतिक बफर के तौर पर बनाया जाएगा, ताकि चीन की तरफ से छोड़े गए पानी के बहाव का प्रबंधन किया जा सके और पूर्वोत्तर के राज्यों की आबादी और इन्फ्रास्ट्रक्चर को बचाया जा सके।
अधिकारियों का कहना है कि इस बांध में इतना पानी स्टोर किया जाएगा, जिससे चीन की तरफ से अगर ब्रह्मपुत्र के पानी का बहाव कम कर दिया जाए तो भी पूर्वोत्तर की जरूरतें पूरी की जा सकें। वहीं, अगर चीन ज्यादा पानी छोड़ दे तो उसे बांध के जरिए रेगुलेट किया जा सके।
रिपोर्ट्स की मानें तो चीन की तरफ से ब्रह्मपुत्र नदी पर बांध बनने के बाद के खतरों से प्रभावी ढंग से निपटने के लिए भारत खुद भी अरुणाचल प्रदेश में एक बांध बनाने की तैयारी कर रहा है। इसे सियांग मल्टीपर्पस प्रोजेक्ट नाम दिया गया है, जो कि सियांग जिले में पानी स्टोर करने और ऊर्जा पैदा करने के लक्ष्य के साथ बनाया जाएगा। इस बांध को एक कूटनीतिक बफर के तौर पर बनाया जाएगा, ताकि चीन की तरफ से छोड़े गए पानी के बहाव का प्रबंधन किया जा सके और पूर्वोत्तर के राज्यों की आबादी और इन्फ्रास्ट्रक्चर को बचाया जा सके।
अधिकारियों का कहना है कि इस बांध में इतना पानी स्टोर किया जाएगा, जिससे चीन की तरफ से अगर ब्रह्मपुत्र के पानी का बहाव कम कर दिया जाए तो भी पूर्वोत्तर की जरूरतें पूरी की जा सकें। वहीं, अगर चीन ज्यादा पानी छोड़ दे तो उसे बांध के जरिए रेगुलेट किया जा सके।
हालांकि, 1.1 लाख करोड़ रुपये (13.2 अरब डॉलर) की अनुमानित लागत वाले इस प्रोजेक्ट की प्रगति अब तक काफी धीमी रही है। भारत के जलशक्ति मंत्रालय ने इस प्रोजेक्ट को लेकर एनएचपीसी लिमिटेड को प्री-फिजिबिलिटी रिपोर्ट तैयार करने का जिम्मा दिया था। हालांकि, इस बांध को लेकर अहम जांच ही स्थानीय विरोध की वजह से अटकी है।
योजना के मुताबिक, इस बांध में करीब नौ अरब घन मीटर पानी रखा जा सकेगा। इसके जरिए 11 हजार मेगावॉट बिजली पैदा की जा सकेगी, जो कि भारत की और किसी भी जलविद्युत परियोजना से ज्यादा होगी। हालांकि, अब सबसे बड़ा सवाल इस प्रोजेक्ट की शुरुआत को लेकर है।
योजना के मुताबिक, इस बांध में करीब नौ अरब घन मीटर पानी रखा जा सकेगा। इसके जरिए 11 हजार मेगावॉट बिजली पैदा की जा सकेगी, जो कि भारत की और किसी भी जलविद्युत परियोजना से ज्यादा होगी। हालांकि, अब सबसे बड़ा सवाल इस प्रोजेक्ट की शुरुआत को लेकर है।