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अफगानिस्तान में बनने वाले हालात से जुड़े हैं चीन के बड़े हित, चाहता है तालिबान का सहयोग
Wed, 07 Jul 2021 04:10 PM IST
Harendra Chaudhary
वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला, काबुल
वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला, काबुल
Published by: Harendra Chaudhary
Updated Wed, 07 Jul 2021 04:10 PM IST
सार
चीन की रणनीति अफगानिस्तान के टूटे-बिखरे इन्फ्रास्ट्रक्चर का पुनर्निर्माण कर वहां अपना प्रभाव बढ़ाने की है। ये काम वह तालिबान की मदद से करना चाहता है। इसके लिए वह पाकिस्तान के जरिए वहां धन मुहैया कराने को तैयार है...
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चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग और अफगान राष्ट्रपति अशरफ गनी
- फोटो : Agency (File Photo)
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विस्तार
अफगानिस्तान में अमेरिका और नाटो (उत्तर अटलांटिक संधि संगठन) की फौज की वापसी के साथ बन रहे हालात से चीन की चिंताएं बढ़ी हैं। अफगानिस्तान से चीन के बड़े हित जुड़े हुए हैं। हालांकि चीन घोषित तौर पर दूसरे देशों में दखल न देने की नीति पर चलता है, लेकिन पर्यवेक्षकों के मुताबिक अफगानिस्तान में बन रहे हालात पर उसकी निगाहें टिकी हैं।
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ब्रिटिश अखबार द फाइनेंशियल टाइम्स में छपी एक रिपोर्ट के मुताबिक चीन के प्रतिनिधियों ने तालिबान के साथ गुप्त वार्ताएं की हैं। चीन ने इस बारे में चुप्पी साधे रखी है कि उसकी तालिबान से क्या बात हुई। लेकिन अधिकारियों और राजनयिकों के हवाले से मीडिया में छपी खबरों के मुताबिक उन वार्ताओं के आधार पर चीन अपनी अफगान रणनीति को अंतिम रूप देने में जुटा है।
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द फाइनेंशियल टाइम्स को एक दक्षिण एशियाई अधिकारी ने बताया कि चीन की रणनीति अफगानिस्तान के टूटे-बिखरे इन्फ्रास्ट्रक्चर का पुनर्निर्माण कर वहां अपना प्रभाव बढ़ाने की है। ये काम वह तालिबान की मदद से करना चाहता है। इसके लिए वह पाकिस्तान के जरिए वहां धन मुहैया कराने को तैयार है। दक्षिण-एशिया क्षेत्र के एक दूसरे राजनयिक ने फाइनेंशियल टाइम्स से कहा- ‘चीन-पाकिस्तान के अनुरोध पर तालिबान की पूरी मदद करेगा।’ लेकिन चीन के लिए शर्त रखी है कि तालिबान उन समूहों से अपना संबंध तोड़ ले, जो उसके शिनजियांग प्रांत में आतंकवादी गतिविधियां चलाते हैं या उइगर आतंकवादियों की मदद करते हैं।
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जानकारों के मुताबिक चीन जब ऐसे गुटों की बात करता है, तो उसका मतलब ईस्ट तुर्कीस्तान इस्लामिक मूवमेंट (ईटीआईएम) से होता है। संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के एक अनुमान के मुताबिक इस संगठन से लगभग साढ़े तीन हजार उग्रवादी जुड़े हुए हैं। उनमें से कुछ ने अफगानिस्तान में अपने अड्डे बना रखे हैं। गौरतलब है कि अफगानिस्तान की सीमा शिनजियांग से मिलती है। ईटीआईएम को संयुक्त राष्ट्र और अमेरिका दोनों ने आतंकवादी संगठनों की सूची में डाल रखा था। लेकिन अमेरिका ने पिछले साल इसका नाम इस सूची से हटा दिया। जबकि चीन का आरोप है कि इस संगठन ने शिनजियांग प्रांत में कई आतंकवादी हमलों को अंजाम दिया है।
चीन की प्राथमिकता ईटीआईएम को खत्म करना है। इसी वर्ष चीन के विदेश मंत्री वांग यी ने मध्य एशियाई देशों- कजाखस्तान, उज्बेकिस्तान, किर्गीजस्तान, ताजिकिस्तान और तुर्कमेनिस्तान के विदेश मंत्रियों से बातचीत करके इस संगठन को खत्म करने में मदद मांगी थी। विश्लेषकों का कहना है कि अगर इस काम मे तालिबान मददगार बनता है, तो चीन उसकी मदद के लिए किसी हद तक जा सकता है। लेकिन फिलहाल चीन की चिंता यह है कि तालिबान इसके लिए राजी होगा या नहीं।
चीन की दूसरी चिंता अपने बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव (बीआरआई) प्रोजेक्ट की सुरक्षा सुनिश्चित करने को लेकर है। इसके लिए अफगानिस्तान में स्थिरता बहुत जरूरी है। बीजिंग स्थित शिंगहुआ यूनिवर्सिटी में नेशनल स्ट्रेटेजी इंस्टीट्यूट के निदेशक चियान फेंग ने फाइनेंशियल टिम्स से कहा- ‘बीआरआई के तहत चीन और अफगानिस्तान ने सहयोग की मजबूत इच्छाशक्ति दिखाई है। अगर अफगानिस्तान में स्थिरता कायम हो सकी, तो बेशक उससे चीन से यूरेशिया तक सामग्रियों के लाने-ले जाने में सुविधा होगी।’
बताया जाता है कि आमतौर पर किसी देश में विदेशी फौज की तैनाती के खिलाफ रहने वाला चीन अफगानिस्तान में अपनी फौज भेजने तक को तैयार है। शंघाई इंटरनेशनल स्टडीज यूनिवर्सिटी में प्रोफेसर फान होंगदा ने कहा- ‘चीन लंबे समय से विदेशों में सेना भेजने को लेकर बहुत सतर्क रहा है। लेकिन अगर संयुक्त राष्ट्र प्रस्ताव के जरिए इसकी व्यवस्था हुई, तो वह अफगानिस्तान में तैनात होने वाली अंतरराष्ट्रीय शांति सेना का हिस्सा बन सकता है।’