आरसीईपी को अपनी कामयाबी मान रहा है चीन,पहली बार किसी मुक्त व्यापार समझौते में होगा शामिल
- दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है चीन, जापान है दूसरे नंबर पर
- भारत ने व्यापार समझौते से रखा है खुद को दूर, हस्ताक्षर करने से किया इनकार
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अब ये तय हो गया है कि रविवार (15 नवंबर) को 15 देश क्षेत्रीय व्यापक आर्थिक भागीदारी (आरसीईपी) करार पर दस्तखत करेंगे। इस समझौते को चीन अपनी एक बड़ी सफलता के रूप में देख रहा है। यह पहला मौका है, जब चीन किसी बहुपक्षीय मुक्त व्यापार समझौते में शामिल होगा। अब तक उसकी नीति अलग-अलग देशों से द्विपक्षीय मुक्त व्यापार समझौता करने की थी। उसने 17 देशों के साथ ऐसा करार कर रखा है।
आरसीईपी में जो 15 देश शामिल हो रहे हैं, उनमें चीन और जापान सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था हैं। इस करार के साथ चीन की पहुंच जापान और दक्षिण कोरिया सहित 12 अन्य देशों के बाजारों तक बन जाएगी। जिस वक्त अमेरिका और कुछ यूरोपीय देश चीन से कारोबार रोकने की नीति पर आगे बढ़ रहे हैं, चीनी अर्थव्यवस्था के लिए आरसीईपी एक नया और बड़ा अवसर साबित हो सकता है।
चीन यूरोपीय संघ (ईयू) के साथ निवेश समझौता करना चाहता है, लेकिन उसको लेकर बातचीत लंबे समय से खिंचती चली गई है। चीनी बाजार में यूरोपीय देशों की पैठ कहां तक होगी, ये सवाल इसके संपन्न होने के बीच रुकावट बना रहा है। चीन 2012 से जापान और दक्षिण कोरिया के साथ त्रिपक्षीय मुक्त व्यापार समझौता करने के प्रयास में जुटा रहा है। लेकिन इसमें भी उसे कामयाबी नहीं मिली। लेकिन वह 14 अन्य देशों के साथ ऐसा समझौता करने में सफल हो रहा है।
एशिया और प्रशांत क्षेत्र में मौजूद इन देशों के बीच हो रहा ये करार जीडीपी और जनसंख्या दोनों लिहाज से पूरी दुनिया में अब तक का सबसे मुक्त व्यापार समझौता होगा। जो देश इसमें शामिल हो रहे हैं, उनमें विश्व की 30 फीसदी जनसंख्या रहती है। इनमें चीन और जापान के अलावा दक्षिण कोरिया और ऑस्ट्रेलिया भी शामिल हैं, जिनकी अर्थव्यवस्थाओं को विकसित श्रेणी में रखा जाता है। चीन एशिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है, जबकि जापान दूसरे और दक्षिण कोरिया चौथे नंबर पर है। अगर भारत इसमें शामिल होता, तो एशिया की दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था भी इसका हिस्सा होती। लेकिन पिछले साल नवंबर ने भारत इसमें शामिल होने से इनकार कर दिया था।
इस समझौते के लिए 2013 से जारी बातचीत को गति तब मिली, जब डोनाल्ड ट्रंप अमेरिका के राष्ट्रपति बने और उन्होंने अपने देश को प्रस्तावित ट्रांस पैसिफिक पार्टनरशिप (टीपीपी) से अलग कर लिया। बराक ओबामा के कार्यकाल में अमेरिका ने टीपीपी को संपन्न कराने में काफी मेहनत की थी। अगर वो समझौता हो जाता, तो वह दुनिया का सबसे बड़ा मुक्त व्यापार करार होता। उसमें जापान और दक्षिण कोरिया सहित एशिया-प्रशांत के अहम देशों के साथ- साथ मेक्सिको और कनाडा जैसे देश भी शामिल होते। उसमें कुल 11 देश शामिल होने वाले थे। उनमें चीन नहीं था।
अगर वो करार होता, तो चीन के लिए मुश्किलें खड़ी हो सकती थीं। लेकिन अमेरिका के उससे कदम वापस खींच लेने के बाद एशिया- प्रशांत क्षेत्र के देशों के लिए चीन के साथ जुड़ने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचा। टीपीपी के प्रस्तावित प्रावधानों में यह शामिल था कि समझौते का हिस्सा बनने वाले देश आपसी व्यापार में शुल्कों को 99 फीसदी तक घटा देंगे। साथ ही वे श्रम एवं पर्यावरण रक्षा के सख्त मानदंड का पालन करेंगे।
आरसीईपी में शामिल होने वाले देश आपसी व्यापार में शुल्कों में 90 फीसदी तक कटौती करेंगे। इस प्रावधान पर अमल के लिए 20 साल की अवधि रखी गई है। ये देश ई-कॉमर्स, व्यापार और बौद्धिक संपदा संरक्षण के समान नियम अपनाएंगे। समझौते में आसियान के सदस्य दस देश और ऑस्ट्रेलिया, चीन, जापान, न्यूजीलैंड, और दक्षिण कोरिया शामिल हो रहे हैं। आसियान के सदस्य देशों में ब्रुनेई, कंबोडिया, इंडोनेशनिया, लाओस, मलेशिया, म्यांमार, फिलीपीन्स, सिंगापुर, थाईलैंड और वियतनाम शामिल हैं।