ढह रहा है चीन का ‘चाइनीज सॉकर ड्रीम’, फुटबॉल को अब सरकार का आसरा
फुटबॉल चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग का पसंदीदा खेल है। 2012 में जब वे राष्ट्रपति बने, तब उन्होंने चीन को विश्व फुटबॉल में बड़ी ताकत बनाने का संकल्प लिया था...
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
विस्तार
कोविड-19 महामारी के असर से चीनी अर्थव्यवस्था के जल्द उबर जाने के बावजूद कई क्षेत्र इस महामारी से बुरी तरह प्रभावित हुए हैं। इनमें चीन का प्रोफेशनल फुटबॉल भी है। चीन के कई फुटबॉल क्लब गहरे संकट में फंस गए हैं। महामारी के कारण 2020 के सीजन की शुरुआत देर से हुई, इसमें कम मैच हुए और मैचों के दौरान दर्शकों को स्टेडियम में नहीं आने दिया गया। इसका क्लबों की माली हालत पर बेहद खराब असर हुआ है। कम से कम एक बड़ा क्लब ऐसा है, जिसके मालिक ने बढ़े घाटे के कारण क्लब का स्वामित्व दूसरे निवेशक के हाथ में ट्रांसफर कर दिया। इस कारण शिजियझुआंग एवर ब्राइट फुटबॉल क्लब का नाम अब कानझाउ माइटी लॉयन्स क्लब हो गया है।
लेकिन जानकारों का कहना है कि इस मामले में असल बात क्लब का मालिक और नाम बदलना नहीं है। बल्कि इसकी बिक्री के लिए हुई प्रेस कांफ्रेंस में सबसे ध्यान खींचने वाली बात वहां कानझाउ नगर प्रशासन के अधिकारियों की उपस्थिति रही। इन अधिकारियों ने एलान किया कि नगर प्रशासन के सभी विभाग क्लब और उसकी नई मालिक कंपनी कानझाउ कंस्ट्रक्शन्स को सभी स्तरों पर अपनी सर्वोत्तम सुविधाएं उपलब्ध कराएंगे। इससे ये साफ हो गया कि फुटबॉल क्लब का संचालन सरकार के सहयोग से होगा। शंघाई से चलने वाली वेबसाइट सिक्स्थटोन.कॉम की एक रिपोर्ट में बताया गया है कि क्लब संचालन में सरकारी भूमिका बढ़ने की खबरें कम-से-कम पांच और क्लबों के मामले में मिली है।
जानकारों का कहना है कि महामारी के बाद चीन में फुटबॉल घाटे का कारोबार बन गया है। इसलिए निजी क्षेत्र के निवेशक इसमें अपना पैसा लगाने से हिचक रहे हैं। इसलिए इसे संभालने के लिए सरकार को आगे आना पड़ा है। गौरतलब है कि फुटबॉल चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग का पसंदीदा खेल है। 2012 में जब वे राष्ट्रपति बने, तब उन्होंने चीन को विश्व फुटबॉल में बड़ी ताकत बनाने का संकल्प लिया था। इसके बाद इस खेल में बहुत पैसा लगाया गया।
2015 में फुटबॉल ढांचे में सुधार की योजनाएं लागू की गईं। इसे ‘चाइनीज सॉकर ड्रीम’ के नाम से जाना गया। लेकिन शी की महत्वाकांक्षा इस मामले में पूरी नहीं हुई है। उलटे कोरोना महामारी के असर से इसके लिए जो ढांचा बनाया गया था, वह अब ढहता नजर आ रहा है।
चीन ओलिंपिक खेलों में दुनिया की दूसरी बड़ी ताकत बन चुका है। लेकिन फुटबॉल में एशिया में कुछ छोटी उपलब्धियों को छोड़ कर उसे ज्यादा कामयाबी नहीं मिली है। उसकी सबसे बड़ी उपलब्धि 2002 के वर्ल्ड कप में खेलना रही है। फीफा रैंकिंग में पिछले तीस साल से वह 70 से 75 नंबर पर बना हुआ है। चीन में फुटबॉल का ढांचा बने इसके लिए क्लब फुटबॉल को आगे बढ़ाया गया था। मकसद स्थानीय प्रतिभाओं को ढूंढना और उन्हें आगे लाना था। साथ ही इससे उम्मीद जोड़ी गई थी कि देश में जमीनी स्तर पर फुटबॉल की लोकप्रियता बढ़ेगी।
योजना कुछ समय तक कामयाब होती दिखी थी। बड़ी संख्या में निवेशक इस क्षेत्र में पैसा लगाने के लिए आगे आए थे। उन्होंने अपने क्लबों के लिए दुनिया के कई मशहूर खिलाड़ियों को खरीदा। लेकिन ये उत्साह जल्दी ही चूकने लगा। विश्लेषकों का कहना है कि जो निवेशक आगे आए थे, उनमें से कई की रुचि फुटबॉल में नहीं थी। बल्कि उन्हें उम्मीद थी कि इससे वे तेजी से पैसा कमा सकेंगे। ऐसा ना होने पर उन्होंने निवेश में कटौती शुरू कर दी। अब महामारी की मार भी इस क्षेत्र पर पड़ी है।
नतीजा है कि 2020 में दूसरे और तीसरे डिवीजन के 11 क्लब लाइसेंसिंग मानकों को पूरा करने में विफल हो गए। इसी कारण अब सरकारों को आगे आना पड़ा है। सरकारें कई रूपों में अपना समर्थन दे रही हैँ। इनमें क्लबों और टूर्नामेंटों को सब्सिडी देना और प्रत्यक्ष निवेश के लिए निवेशकों को परोक्ष प्रोत्साहन देना शामिल है।