नए शोध में खुलासा, कमजोर दिमागी क्षमता के लोग बन जाते हैं उग्रवादी
इस अध्ययन में अमेरिका 330 लोगों को शामिल किया गया, जिनकी उम्र 22 से 63 साल है। उन सबको अनेक प्रकार के परीक्षणों से गुजरना पड़ा...
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हम जीवन में किस विचारधारा को अपनाएंगे, इसका राज हमारे दिमाग में होता है। ये बात एक नए अनुसंधान से सामने आई है। इस अध्ययन का यह भी निष्कर्ष है कि जो लोग चरमपंथी विचारधारा अपनाते हैं, आमतौर पर उनकी मानसिक क्षमता कमजोर होती है। ये अध्ययन कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी में हुआ। अध्ययन में ये जानने की कोशिश की गई कि कोई दिमाग जिस तरह सूचना को समझता और उसकी प्रोसेसिंग करता है, क्या उससे उस व्यक्ति की राजनीतिक, राष्ट्रवादी या कट्टरपंथी विचारधारा का संबंध होता है। मनोवैज्ञानिक ये पहले से मानते हैं कि इंसान की विचारधारा तय करने में उसकी उम्र, जाति, नस्ल और लिंग का प्रभाव रहता है। ताजा अध्ययन में इस पहलू को अधिक गहन रूप में समझने की कोशिश की गई है।
अनुसंधानकर्ताओँ का कहना है कि इस संबंध में पहले भी शोध हुए हैं। ताजा अध्ययन में उनके निष्कर्षों को भी ध्यान में रखा गया। इस अध्ययन में अमेरिका 330 लोगों को शामिल किया गया, जिनकी उम्र 22 से 63 साल है। उन सबको अनेक प्रकार के परीक्षणों से गुजरना पड़ा। इनके तहत उन्हें न्यूरोसाइकोलॉजिकल कार्य करने को दिए गए। उन्हें 22 प्रकार के व्यक्तित्व संबंधी सर्वेक्षणों में भी शामिल किया गया। ये अध्ययन दो हफ्तों तक चला।
जो टास्क उन्हें दिए गए, उन्हें तटस्थ (न्यूट्रल) रखा गया। यानी इस दौरान उनसे भावनात्मक या राजनीतिक सवाल नहीं पूछे गए। बल्कि उन्हें कुछ दृश्य आकारों को याद करने को कहा गया। उसके बाद शोधकर्ताओं ने गणनात्मक (कॉम्प्यूटेशनल) म़ॉडलिंग का इस्तेमाल किया। इसके तहत अध्ययन में शामिल लोगों की समझ और उन्होंने जो सीखा, उसके बारे में जानकारी हासिल की गई। इससे उन लोगों की दिमागी प्रोसेसिंग की क्षमता को समझने की कोशिश की गई।
इस अध्ययन के निष्कर्ष रॉयल सोसायटी-बी के जर्नल फिलॉसिफिकल ट्रांजेक्शंस में छपे हैं। इसमें अध्ययनकर्ता इस निष्कर्ष पर पहुंचे कि व्यक्ति के विचारधारात्मक नजरिए में उसकी संज्ञानात्मक निर्णय प्रक्रिया की झलक मिलती है। यानी व्यक्ति अपने आस-पास को जैसे समझता है, उससे ही उसकी विचारधारा तय होती है। अध्ययन का एक मुख्य निष्कर्ष यह रहा कि उग्रवादी नजरिए वाले लोग दुनिया को काले और सफेद में देखते हैं। यानी वे बारीकियों में जाने की क्षमता नहीं रखते। अध्ययन में जो जटिल मानसिक क्षमता वाले टास्क दिए गए थे, उन्हें पूरा करने पाने में ऐसे लोग कमजोर पाए गए।
इस अध्ययन रिपोर्ट को लिखने वाली मनोवैज्ञानिक डॉ. लियोर जमिग्रोड ने यहां के अखबार द गार्जियन से कहा- ‘जटिल कार्यों को क्रमबद्ध करने और उन्हें नियोजित करने में जो लोग सक्षम नहीं होते, उनके चरमपंथी विचारधाराओं या तानाशाही विचारधाराओं की तरफ खिंचने की संभावना अधिक रहती है।’ डॉ. जमिग्रोड कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी के मनोविज्ञान विभाग में प्रोफेसर हैं। उन्होंने कहा कि चरमपंथी या तानाशाही विचारधाराओं में ऐसे लोगों को समस्याओं का सरल समाधान दिखता है। उन्होंने कहा कि चरमपंथी प्रवृत्तियों की तरफ जाने वाले लोग अपनी भावनाओं को संतुलित करने में सक्षम नहीं होते। बेसब्री और भावनात्मक उग्रता उनके स्वभाव का हिस्सा होती है। ऐसे लोग निर्दोष लोगों के खिलाफ हिंसा करने की तरफ आसानी से चले जाते हैँ।
अध्ययन के दौरान 16 अलग-अलग विचारधाराओं पर गौर किया गया। अध्ययनकर्ताओं का कहना है कि उनके इस अध्ययन से यह जानने में मदद मिल सकती है कि किन लोगों के राजनीतिक या धार्मिक हिंसा में शामिल होने की सबसे ज्यादा आशंका होगी। डॉ. जमिग्रोड का कहना है कि किसी व्यक्ति की क्या विचारधारा होगी, इसे समझने के लिए सिर्फ यह जानना पर्याप्त नहीं है कि उसका जन्म किस पृष्ठभूमि वाले परिवार में हुआ। इससे सिर्फ आठ प्रतिशत अनुमान लगाया जा सकता है। जबकि अगर हम दुनिया को समझने की दिमाग की क्षमता और व्यक्तित्व के रूझानों को भी सामाजिक पृष्ठभूमि के साथ शामिल कर लें, तो 30 से 40 फीसदी अनुमान लगा सकते हैं कि किसी व्यक्ति की क्या विचारधारा होगी।