'वन चाइना पॉलिसी' को लेकर क्या रहेगा बाइडन प्रशासन का रुख, अमेरिकी हथियारों का बड़ा खरीदार है ताइवान
बाइडन प्रशासन ने साफ कर दिया है कि वह वन चाइना पॉलिसी पर चलता रहेगा। लेकिन वह ट्रंप के राष्ट्रपति बनने के पहले के दौर की तरह इस नीति का पालन करेगा, इस पर विश्लेषकों को संदेह है...
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जो बाइडन प्रशासन के वन चाइना पॉलिसी पर कायम रहने के एलान के बाद अब कयास लगाए जा रहे हैं कि क्या अमेरिका अब सचमुच चीन से तनाव कम करने की दिशा में आगे बढ़ेगा। पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के प्रशासन ने अपने आखिरी दिनों में कई ऐसे कदम उठाए थे, जिन्हें व्यावहारिक रूप में ताइवान को अलग देश के रूप में मान्यता देने जैसा समझा गया था। 20 जनवरी को सत्ता संभालने के तीन दिन बाद बाइडन के प्रशासन ने चीन के सैनिक दबाव के बावजूद ताइवान के प्रति पूरा समर्थन जताया था। उस समय ये साफ नहीं हो सका था कि नया प्रशासन भी ट्रंप के दौर की नीति पर चलेगा, या पुरानी वन चाइना पॉलिसी की तरफ वापस जाएगा। लेकिन बुधवार को इस बारे में साफ सवाल पूछे जाने पर अमेरिकी विदेश मंत्रालट के प्रवक्ता नेड प्राइस ने दो टूक कहा कि ‘हमारी पुरानी नीति नहीं बदली है।’
लेकिन जानकारों का कहना है कि ये नीति हमेशा से अस्पष्ट और असमंजस से भरी रही है। इस बारे में अमेरिकी दुविधा का जिक्र करते हुए गुरुवार को कूटनीति विशेषज्ञ जोशुआ कीटिंग ने एक वेबसाइट पर लिखा कि अमेरिका और ताइवान के बीच जैसा रिश्ता है, वैसा धरती पर और कोई संबंध नहीं है। उन्होंने ध्यान दिलाया कि ताइवान अमेरिका का नौवां सबसे बड़ा व्यापार भागीदार है। वह अमेरिकी हथियारों के सबसे बड़े खरीदारों में से एक है। जिस समय चीन के बढ़ते प्रभाव को रोकना अमेरिका की पूर्वी एशिया नीति में सबसे अहम पहलू हो गया है, उस समय अमेरिकी नीति में ताइवान की अहमियत का बढ़ना लाजिमी है। ताइवान को समर्थन देने की नीति पर अमेरिका की नीति पर दोनों प्रमुख पार्टियों- सत्ताधारी डेमोक्रेटिक पार्टी और विपक्षी रिपब्लिकन पार्टी- में पूरी सहमति है। इसके तहत ही लंबे समय से चली आ रही नीति के तहत अमेरिका ने ताइवान को स्वतंत्र देश के रूप मे मान्यता नहीं दी है।
विश्लेषकों का कहना है कि ताइवान को मान्यता देने का मतलब चीन से सीधा टकराव मोल लेना होगा। ताइवान चीन का हिस्सा रहा है। 1949 में जब चीन में कम्युनिस्ट क्रांति हुई, तो वहां के तब के शासक वर्ग के लोग भाग कर ताइवान चले गए और उसे अलग देश घोषित कर दिया। तब से तीन दशक बाद तक अमेरिका ताइवान स्थित सरकार को ही पूरे चीन की सरकार मानता रहा। लेकिन 1970 के दशक में कम्युनिस्ट चीन के साथ अमेरिका के रिश्ते सामान्य होने के बाद 1979 में तत्कालीन राष्ट्रपति जिमी कार्टर ने बीजिंग स्थित सरकार को पूरे चीन की सरकार के रूप में मान्यता दे दी।
अमेरिका समेत दुनिया के ज्यादातर देश आज भी वन चाइना पॉलिसी को मानते हैं। इस तरह वे बीजिंग स्थित सरकार को पूरे चीन की सरकार और तकनीकी रूप से ताइवान को चीन का हिस्सा मानते हैं। इस मामले में ठोस बदलाव की पहल ट्रंप प्रशासन ने की। कार्यकाल के आखिरी दिनों में ट्रंप प्रशासन ने अपनी इस नीति पर अधिक जोर डालते हुए कुछ खास कदम उठाए। लेकिन तब उसे मोटे तौर पर आने वाले बाइडन प्रशासन के लिए मुश्किलें खड़ी करने के कदम के रूप में देखा गया था।
अब बाइडन प्रशासन ने साफ कर दिया है कि वह वन चाइना पॉलिसी पर चलता रहेगा। लेकिन वह ट्रंप के राष्ट्रपति बनने के पहले के दौर की तरह इस नीति का पालन करेगा, इस पर विश्लेषकों को संदेह है।
ट्रंप ने 2016 में राष्ट्रपति बनने के बाद ताइवान के राष्ट्रपति त्साई इंग-वेन का फोन स्वीकार कर उनसे बधाई ली थी। 1979 के बाद अमेरिकी राष्ट्रपति से ताइवान के राष्ट्राध्यक्ष की यह पहली बातचीत थी। हालांकि जो बाइडन ने ताइवानी राष्ट्रपति से सीधे बातचीत तो नहीं की है, लेकिन उनके राष्ट्रपति चुनाव जीतने के बाद उनके मनोनीत विदेश मंत्री एंटनी ब्लिंकेन ने त्साई से बातचीत की थी। अमेरिका स्थित ताइवानी राजनयिक (जिन्हें वास्तव में अमेरिका में ताइवान का राजदूत समझा जाता है) को बाइडन के शपथ ग्रहण समारोह में आमंत्रित किया गया। जानकारों का कहना है कि यह साफ संकेत है कि बाइडन प्रशासन ट्रंप से पहले के राष्ट्रपति के दौर की तुलना में ताइवान से औपचारिक रूप से अधिक दोस्ताना संबंध रखेगा। इसका चीन को नागवार गुजरना तय है।
ताइवान के प्रति चीन की नीति अब तक वहां के लोगों को समझा-बुझाकर अपनी मुख्य भूमि के साथ उनके इलाके को फिर से शामिल करने की रही है। लेकिन चीन ने हमेशा यह कहा है कि इस मकसद को हासिल करने के लिए उसके सैनिक विकल्प खुले हुए हैं। हाल में उसने ताइवान के पास अपनी सैनिक ताकत का प्रदर्शन भी किया है। विशेषज्ञ जोशुआ कीटिंग ने लिखा है कि असली समस्या तभी खड़ी होगी, अगर चीन ने आक्रामक रुख अपनाया। वरना बाइडन प्रशासन फिलहाल किसी युद्ध में नहीं उलझना चाहेगा। लेकिन ताइवान के साथ रिश्ते को ट्रंप ने जहां तक पहुंचा दिया है, घरेलू जनमत को देखते हुए उससे पीछे हटना भी बाइडन प्रशासन के लिए मुश्किल होगा।