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Bangladesh Supreme Court: 1971 के युद्ध अपराध मामले में जमात नेता बरी, ट्रिब्यूनल से मिली थी सजा-ए-मौत; जानिए
Wed, 28 May 2025 03:29 AM IST
ज्योति भास्कर
वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला, ढाका।
वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला, ढाका।
Published by: ज्योति भास्कर
Updated Wed, 28 May 2025 03:29 AM IST
सार
बांग्लादेश की सुप्रीम कोर्ट ने 1971 के युद्ध अपराध मामले में 73 साल के जमात नेता को बरी करने का फैसला सुनाया है।मानवता के खिलाफ अपराधों में अंतरराष्ट्रीय न्यायाधिकरण ने जमात नेता को दोषी करार देकर मौत की सजा सुनाई थी। प्रो. मोहम्मद यूनुस की अगुवाई वाली देश की अंतरिम सरकार ने अदालत के फैसले का स्वागत किया है।
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सांकेतिक तस्वीर
- फोटो : एएनआई (फाइल)
विस्तार
बांग्लादेश सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को जमात-ए-इस्लामी के वरिष्ठ नेता एटीएम अजहरुल इस्लाम (73) को 1971 के मुक्ति संग्राम से संबंधित युद्ध अपराध मामले में बरी कर दिया, जिससे उसकी मौत की सजा रद्द हो गई। मुख्य न्यायाधीश सैयद रफात अहमद की अध्यक्षता वाली सात सदस्यीय अपीलीय खंडपीठ ने यह फैसला सुनाया।
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अंतरराष्ट्रीय ट्रिब्यूनल के फैसले में सजा-ए-मौत
73 साल के नेता अजहरुल इस्लाम पर युद्ध के दौरान नरसंहार, हत्या और दुष्कर्म जैसे मानवता के खिलाफ अपराधों में गिरफ्तार किया गया था। अंतरराष्ट्रीय अपराध न्यायाधिकरण (आईसीटी) ने उसे मौत की सजा सुनाई थी। उसकी पार्टी ने 1971 में पाकिस्तान से बांग्लादेश की स्वतंत्रता का विरोध किया था।
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अन्य मामलों में गिरफ्तार नहीं हैं, इसलिए तत्काल रिहाई के निर्देश
सरकारी वकील ने बताया, कोर्ट ने एटीएम अजहरुल इस्लाम को बरी करने का आदेश दिया और जेल प्रशासन को निर्देश दिया कि यदि वे अन्य मामलों में गिरफ्तार नहीं हैं, तो उन्हें तुरंत रिहा किया जाए। उन्होंने कहा कि बांग्लादेश में इस फैसले को पलटने के लिए कोई उच्चतर अदालत या अंतरराष्ट्रीय मंच नहीं है। 23 अक्तूबर 2019 को अपीलीय खंडपीठ ने इस फैसले को बरकरार रखा था, जिसके बाद इस्लाम ने 19 जुलाई 2020 को 14 कानूनी दलीलों के साथ समीक्षा याचिका दायर की थी।
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यूनुस सरकार ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले का किया स्वागत
प्रोफेसर मुहम्मद यूनुस की अंतरिम सरकार के कानून सलाहकार आसिफ नजरुल ने इस बरी किए जाने का स्वागत किया। उन्होंने इसे पिछले साल के छात्र-नेतृत्व वाले आंदोलन का परिणाम बताया। इसके चलते 5 अगस्त को शेख हसीना की अवामी लीग सरकार को सत्ता से बेदखल कर दिया गया था। नजरुल ने सोशल मीडिया पर कहा, इस न्याय की स्थापना का श्रेय जुलाई-अगस्त के जन आंदोलन के नेतृत्व को जाता है।