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बांग्लादेश: संविधान में 15वें संशोधन की वैधता पर रार; अटॉर्नी जनरल बोले- मुजीब को राष्ट्रपिता बनाना सवालिया

Fri, 15 Nov 2024 03:13 AM IST
शुभम कुमार वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला, ढाका
वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला, ढाका Published by: शुभम कुमार Updated Fri, 15 Nov 2024 03:13 AM IST
सार

बांग्लादेश में इन दिनों संविधान के 15वें संशोधन की वैधता पर रार बरकरार है। दूसरी ओर बांग्लादेश के अटॉर्नी जनरल मोहम्मद असदुज्जमां ने संविधान से धर्मनिरपेक्षता और समाजवाद जैसे शब्दों को हटाने की मांग करते हुए बंगबंधु शेख मुजीबर रहमान को राष्ट्रपिता बनाने को सवालिया बताया है। 

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Bangladesh: Proposal to remove 'secularism' and 'socialism' from the constitution, demand to make Mujibur
बांग्लादेश हिंसा - फोटो : PTI

विस्तार

बांग्लादेश के संविधान में किए गए 15वें संविधान संशोधन की वैधता को लेकर चल रही सुनवाई के बीच अटॉर्नी जनरल मोहम्मद असदुज्जमां द्वारा दिए गए सुझावों ने वहां की राजनीति में भूचाल ला दिया है। उन्होंने 30 जून 2011 को बांग्लादेश संसद की ओर से किए गए 15वें संविधान संशोधन को हटाने की मांग की है। इसके साथ ही उन्होंने राष्ट्रपिता के पदनाम में भी बदलाव की मांग की है।
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गौरतलब है कि संविधान के 15वें संशोधन द्वारा शेख मुजीबुर्रहमान को बांग्लादेश के राष्ट्रपिता के रूप में नामित किया गया था। उन्होंने कहा कि शेख मुजीब का सम्मान किया जाना चाहिए, लेकिन कानून बनाकर इसे लागू करना समाज में विभाजन पैदा कर सकता है। इसके अलावा, बांग्लादेश के अटॉर्नी जनरल मोहम्मद असदुज्जमां ने समाजवाद, बंगाली राष्ट्रवाद, धर्मनिरपेक्षता जैसे शब्दों को भी हटाने का सुझाव दिया है।
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शेख मुजीबुर को राष्ट्रपिता बनाना सवालिया- असदुज्जमां
अटॉर्नी जनरल ने ये भी कहा कि शेख मुजीबुर रहमान को 'राष्ट्रपिता' के रूप में नामित करने जैस संवैधानिक संशोधन राष्ट्रीय विभाजन पैदा करते हैं। उन्होंने कहा कि शेख मुजीब का सम्मान किया जाना चाहिए लेकिन कानून बनाकर इसे लागू करने से विभाजन पैदा होता है। उन्होंने आगे कहा कि संशोधनों को लोकतंत्र का समर्थन करना चाहिए ना कि तानाशाही का पक्ष लेना चाहिए।

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बांग्लादेश की लोकतांत्रिक नींव को नुकसान-असदुज्जमां
इसके साथ ही अपने बयान में असदुज्जमां ने बांग्लादेश की पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना के उस फैसले की भी निंदा की जिसमें उसने बांग्लादेश में चुनावों की देखरेख के लिए जिम्मेदार कार्यवाहक सरकार प्रणाली को खत्म कर दिया था। इस फैसले को लेकर उन्होंने कहा कि इस प्रणाली को खत्म करने से नागरिकों के मौलिक अधिकारों से समझौता हुआ, जनता का विश्वास कमजोर हुआ और बांग्लादेश की लोकतांत्रिक नींव को नुकसान पहुंचा।


जनमत संग्रह प्रावधान की उठाई मांग
वहीं अटॉर्नी जनरल ने संविधान के अनुच्छेद छह और सात (क), सात (ख) को लेकर भी सवाल उठाते हुए कहा कि यह अनुच्छेद लोकतंत्र को कमजोर करते हैं। इन अनुच्छेदों को लोकतांत्रिक संस्थाओं को कमजोर करने के लिए लागू किया गया था। उन्होंने अंतरिम सरकार की प्रणाली के उन्मूलन का विरोध किया। साथ ही जनमत संग्रह प्रावधान को बहाल करने की मांग की। उन्होंने कहा कि यह लोकतांत्रिक जवाबदेही को बहाल करने के लिए जरूरी है।
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