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Bangladesh: 2009 के अर्धसैनिक बल बीडीआर विद्रोह की फिर से जांच करेगी अंतरिम सरकार, जानें कैसे उपजा था बवाल
Mon, 02 Sep 2024 06:01 PM IST
पवन पांडेय
वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला, ढाका
वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला, ढाका
Published by: पवन पांडेय
Updated Mon, 02 Sep 2024 06:01 PM IST
सार
बांग्लादेश की अंतरिम सरकार देश में साल 2009 में हुए अर्धसैनिक बल बीडीआर विद्रोह की फिर से जांच करेगी। बता दें कि इस विद्रोह के कारण भड़की हिंसा में 57 सेना के अधिकारियों समेत 74 लोगों की जान गई थी।
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बांग्लादेश बॉर्डर गार्ड (सांकेतिक तस्वीर)
- फोटो : ANI
विस्तार
बांग्लादेश की अंतरिम सरकार ने सोमवार को कहा कि वह 2009 में अर्धसैनिक बल बांग्लादेश राइफल्स (बीडीआर) में हुए विद्रोह की जल्द ही फिर से जांच और निष्पक्ष सुनवाई शुरू करेगी, जिसमें सेवारत 57 सैन्य अधिकारियों समेत 74 लोग मारे गए थे। अंतरिम सरकार के गृह और कृषि मामलों के सलाहकार लेफ्टिनेंट जनरल (सेवानिवृत्त) एम जहांगीर आलम चौधरी ने कहा कि एक नागरिक और सेना के पूर्व सदस्य के रूप में, वह इस दुखद घटना के लिए न्याय सुनिश्चित करने के लिए प्रतिबद्ध हैं। उन्होंने कहा, बीडीआर नरसंहार की उचित फिर से जांच और निष्पक्ष सुनवाई प्रक्रिया जल्द ही शुरू होगी।
क्या है 2009 का अर्धसैनिक बल बीडीआर विद्रोह?
ये विद्रोह 25-26 फरवरी, 2009 को शुरू हुआ था, जब सेना के अधिकारियों ने बीडीआर जवानों की मांगों को पूरा करने से इनकार कर दिया था। जिसके बाद विद्रोही सैनिकों ने ढाका में बीडीआर के पिलखाना मुख्यालय में विद्रोह किया और यह जल्दी ही पूरे देश में सीमांत बल के सेक्टर मुख्यालयों और क्षेत्रीय इकाइयों में फैल गया। इस विद्रोह में अर्धसैनिक सैनिकों ने अपने कमांडरों को अपनी बंदूकें तान दीं, उन्हें नजदीक से गोली मार दी या उन्हें काटकर मार डाला, उनके शवों को सीवर में छिपा दिया और जल्दबाजी में कब्र खोद दी और उनके भयभीत परिवार के सदस्यों को बैरकों में बंधक बनाकर अपमानित किया। विद्रोह में 57 सैन्य अधिकारियों समेत 74 लोग मारे गए।
बीडीआर विद्रोह के बाद बदला बांग्लादेशी सेना का नाम
इसके बाद देश में एक बड़े पैमाने पर पुनर्निर्माण अभियान के तहत, बांग्लादेश की तत्कालीन सरकार ने विद्रोह से दागी बीडीआर का नाम बदलकर 2012 में बॉर्डर गार्ड बांग्लादेश (बीजीबी) कर दिया, जबकि बल को विद्रोह के कलंक से मुक्त करने के लिए इसका लोगो, वर्दी, झंडा और मोनोग्राम बदल दिया।
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वहीं मामले में जहांगीर आलम चौधरी, जो पहले (बीजीबी) प्रमुख के रूप में कार्य कर चुके हैं, ने कहा, न केवल एक सलाहकार के रूप में बल्कि सेना के पूर्व सदस्य और एक सामान्य नागरिक के रूप में, मैं बीडीआर हत्याओं की न्यायपूर्ण सुनवाई भी चाहता हूं। उनकी टिप्पणी तब आई जब विशेष रूप से सोशल मीडिया पर फिर से जांच की मांग बढ़ गई, हालांकि 2017 में एक विशेष तीन-न्यायाधीश उच्च न्यायालय की पीठ ने निचली अदालत में उनके मुकदमे के बाद 139 बीडीआर सैनिकों की मौत की सजा को बरकरार रखा था।
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क्या है 2009 का अर्धसैनिक बल बीडीआर विद्रोह?
ये विद्रोह 25-26 फरवरी, 2009 को शुरू हुआ था, जब सेना के अधिकारियों ने बीडीआर जवानों की मांगों को पूरा करने से इनकार कर दिया था। जिसके बाद विद्रोही सैनिकों ने ढाका में बीडीआर के पिलखाना मुख्यालय में विद्रोह किया और यह जल्दी ही पूरे देश में सीमांत बल के सेक्टर मुख्यालयों और क्षेत्रीय इकाइयों में फैल गया। इस विद्रोह में अर्धसैनिक सैनिकों ने अपने कमांडरों को अपनी बंदूकें तान दीं, उन्हें नजदीक से गोली मार दी या उन्हें काटकर मार डाला, उनके शवों को सीवर में छिपा दिया और जल्दबाजी में कब्र खोद दी और उनके भयभीत परिवार के सदस्यों को बैरकों में बंधक बनाकर अपमानित किया। विद्रोह में 57 सैन्य अधिकारियों समेत 74 लोग मारे गए।
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बीडीआर विद्रोह के बाद बदला बांग्लादेशी सेना का नाम
इसके बाद देश में एक बड़े पैमाने पर पुनर्निर्माण अभियान के तहत, बांग्लादेश की तत्कालीन सरकार ने विद्रोह से दागी बीडीआर का नाम बदलकर 2012 में बॉर्डर गार्ड बांग्लादेश (बीजीबी) कर दिया, जबकि बल को विद्रोह के कलंक से मुक्त करने के लिए इसका लोगो, वर्दी, झंडा और मोनोग्राम बदल दिया।
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वहीं मामले में जहांगीर आलम चौधरी, जो पहले (बीजीबी) प्रमुख के रूप में कार्य कर चुके हैं, ने कहा, न केवल एक सलाहकार के रूप में बल्कि सेना के पूर्व सदस्य और एक सामान्य नागरिक के रूप में, मैं बीडीआर हत्याओं की न्यायपूर्ण सुनवाई भी चाहता हूं। उनकी टिप्पणी तब आई जब विशेष रूप से सोशल मीडिया पर फिर से जांच की मांग बढ़ गई, हालांकि 2017 में एक विशेष तीन-न्यायाधीश उच्च न्यायालय की पीठ ने निचली अदालत में उनके मुकदमे के बाद 139 बीडीआर सैनिकों की मौत की सजा को बरकरार रखा था।
दो दिनों तक बांग्लादेश में हुआ था नरसंहार
निचली अदालत ने इस मामले में 152 बीडीआर सदस्यों और दो नागरिकों को मौत की सजा और 158 अन्य को आजीवन कारावास की सजा सुनाई थी, जो कि समीक्षा के लिए सुप्रीम कोर्ट के शीर्ष अपीलीय प्रभाग के सामने लंबित है। आरोपियों पर विद्रोह की साजिश रचने, अपने अधिकारियों को प्रताड़ित करने और उनकी हत्या करने, उनके सामान को लूटने या दो दिवसीय विद्रोह के दौरान उनके परिवार के सदस्यों को बंदी बनाने जैसे आरोपों के तहत मुकदमा चलाया गया। उन्होंने 57 सैन्य अधिकारियों के अलावा आठ नागरिकों, आठ बीडीआर सैनिकों, जो विद्रोह का विरोध कर रहे थे, और एक सेना के सैनिक की भी हत्या कर दी।
बांग्लादेश का सबसे बड़ा आपराधिक मुकदमा
कानूनी विशेषज्ञों ने पहले इसे बांग्लादेश का अब तक का सबसे बड़ा आपराधिक मुकदमा बताया था, जिसमें लगभग 800 पूर्व अर्धसैनिक सैनिकों पर 74 लोगों की हत्या का आरोप था। तत्कालीन बीडीआर प्रमुख मेजर जनरल शकील अहमद विद्रोह के पहले शिकार थे।
यह विद्रोह दिसंबर 2008 के चुनावों में प्रधानमंत्री शेख हसीना की अवामी लीग सरकार के सत्ता में आने के कुछ सप्ताह बाद हुआ था। 2012 में, बांग्लादेश ने विद्रोह के मुकदमे का एक और चरण पूरा किया, जिसमें 11 अर्धसैनिक अदालतों ने 57 इकाइयों के 6,011 विद्रोही सैनिकों को अपेक्षाकृत नरम बीडीआर अधिनियम के तहत सात साल तक की जेल की सजा सुनाई।
निचली अदालत ने इस मामले में 152 बीडीआर सदस्यों और दो नागरिकों को मौत की सजा और 158 अन्य को आजीवन कारावास की सजा सुनाई थी, जो कि समीक्षा के लिए सुप्रीम कोर्ट के शीर्ष अपीलीय प्रभाग के सामने लंबित है। आरोपियों पर विद्रोह की साजिश रचने, अपने अधिकारियों को प्रताड़ित करने और उनकी हत्या करने, उनके सामान को लूटने या दो दिवसीय विद्रोह के दौरान उनके परिवार के सदस्यों को बंदी बनाने जैसे आरोपों के तहत मुकदमा चलाया गया। उन्होंने 57 सैन्य अधिकारियों के अलावा आठ नागरिकों, आठ बीडीआर सैनिकों, जो विद्रोह का विरोध कर रहे थे, और एक सेना के सैनिक की भी हत्या कर दी।
बांग्लादेश का सबसे बड़ा आपराधिक मुकदमा
कानूनी विशेषज्ञों ने पहले इसे बांग्लादेश का अब तक का सबसे बड़ा आपराधिक मुकदमा बताया था, जिसमें लगभग 800 पूर्व अर्धसैनिक सैनिकों पर 74 लोगों की हत्या का आरोप था। तत्कालीन बीडीआर प्रमुख मेजर जनरल शकील अहमद विद्रोह के पहले शिकार थे।
यह विद्रोह दिसंबर 2008 के चुनावों में प्रधानमंत्री शेख हसीना की अवामी लीग सरकार के सत्ता में आने के कुछ सप्ताह बाद हुआ था। 2012 में, बांग्लादेश ने विद्रोह के मुकदमे का एक और चरण पूरा किया, जिसमें 11 अर्धसैनिक अदालतों ने 57 इकाइयों के 6,011 विद्रोही सैनिकों को अपेक्षाकृत नरम बीडीआर अधिनियम के तहत सात साल तक की जेल की सजा सुनाई।
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