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बांग्लादेश: रोहिंग्या ‘जनसंहार’ पर ताजा अमेरिकी रुख से क्या फर्क पड़ेगा शरणार्थियों पर?

Thu, 24 Mar 2022 03:33 PM IST
Harendra Chaudhary वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला, ढाका
वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला, ढाका Published by: Harendra Chaudhary Updated Thu, 24 Mar 2022 03:33 PM IST
सार

मोमिन ने उम्मीद जताई है कि अमेरिका के इस फैसले से म्यांमार पर रोहिंग्या शरणार्थियों को वापस लेने का दबाव बढ़ेगा। म्यांमार की सेना की ज्यादतियों के कारण देश के रखाइन प्रांत से रोहिंग्या मुसलमान बाहर जाने को मजबूर हुए थे। अब ज्यादातर रोहिंग्या शरणार्थियों ने बांग्लादेश में पनाह ले रखी है...

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Bangladesh hopes US approach of declaring atrocities on Rohingya Muslims in Myanmar as a genocide will pave the way for the return of Rohingya refugees to their homeland
बांग्लादेश में रोहिंग्या शरणार्थी - फोटो : Agency (File Photo)

विस्तार

बांग्लादेश को आशा है कि म्यांमार में रोहिंग्या मुसलमानों पर हुए अत्याचार को ‘जनसंहार’ घोषित करने के अमेरिकी रुख से रोहिंग्या शरणार्थियों की अपने वतन वापसी का रास्ता खुलेगा। बांग्लादेश के विदेश मंत्री एके अब्दुल मोमिन ने एक बयान में कहा- ‘यह अच्छी खबर है। हम इसका स्वागत करते हैं। अगर कहीं भी जनसंहार होता है, तो उसे स्वीकार किया जाना चाहिए और इसके दोषियों को बख्शा नहीं जाना चाहिए।’

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गांबिया ने दायर की है याचिका

मोमिन ने उम्मीद जताई है कि अमेरिका के इस फैसले से म्यांमार पर रोहिंग्या शरणार्थियों को वापस लेने का दबाव बढ़ेगा। म्यांमार की सेना की ज्यादतियों के कारण देश के रखाइन प्रांत से रोहिंग्या मुसलमान बाहर जाने को मजबूर हुए थे। अब ज्यादातर रोहिंग्या शरणार्थियों ने बांग्लादेश में पनाह ले रखी है। मोमिन ने कहा है कि बांग्लादेश इस प्रयास में है कि इन शरणार्थियों की वापसी संभव हो और उसके बाद म्यांमार में फिर से उनका जनसंहार ना हो। बांग्लादेश को यह उम्मीद भी है कि ताजा अमेरिकी घोषणा से अंतरराष्ट्रीय न्यायालय में म्यांमार की सेना के खिलाफ चल रहे मामले की सुनवाई तेज होगी। हेग स्थित इस न्यायालय में अफ्रीकी देश गांबिया ने याचिका दायर की है।

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अमेरिका ने सोमवार को अपनी घोषणा में कहा था कि म्यांमार की सेना रोहिंग्या जनसमुदाय के संहार की दोषी है। यह एलान अमेरिकी विदेश मंत्री एंटनी ब्लिंकेन ने किया। इससे रोहिंग्या शरणार्थियों के बीच काम कर रहे गैर सरकारी संगठन भी उत्साहित हुए हैं। फॉर्टिफई राइट्स नाम के एक संगठन के प्रमुख मैथ्यू स्मिथ ने ब्लिंकेन की इस घोषणा को एतिहासिक करार दिया है। उन्होंने कहा है जनसंहार रोकने के लिए सरकारों को यह अवश्य स्वीकार करना चाहिए कि ये अपराध हुआ है।

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सैनिक शासन को चीन-रूस का समर्थन

लेकिन कई पर्यवेक्षकों को यह आशा नहीं है कि इस अमेरिकी कदम से रोहिंग्या पीड़ितों को न्याय दिलाने में कोई खास प्रगति होगी। म्यांमार में सैनिक तख्तापलट के बाद अमेरिका और पश्चिमी देशों ने वहां के सैनिक शासन पर कड़े प्रतिबंध लगाए हैं। लेकिन उनसे ज्यादा फर्क नहीं पड़ा है। म्यांमार के सैनिक शासन को चीन और रूस जैसे मजबूत देशों का समर्थन लगातार मिल रहा है। इस वजह से उन्होंने पश्चिमी प्रतिबंधों की ज्यादा परवाह नहीं की है। इस बीच चीन और रूस ने अमेरिका के एकतरफा कदमों की वैधता और नैतिकता पर भी बहस छेड़ रखी है। जानकारों का कहना है कि इस परिस्थिति में अगर अंतरराष्ट्रीय न्यायालय या संयुक्त राष्ट्र कोई निर्णय ले, तभी रोहिंग्या आबादी को न्याय दिलाने की दिशा में कोई ठोस प्रगति होने की उम्मीद जगेगी।


संभवतया इसीलिए बांग्लादेश ने अब संयुक्त राष्ट्र के सभी सदस्य देशों से आग्रह किया है कि वे भी म्यांमार में रोहिंग्या समुदाय पर हुए अत्याचार को जनसंहार घोषित करें। उसके बाद इस मामले में संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की भूमिका बनेगी। सुरक्षा परिषद में सहमति बनने पर ही अंतरराष्ट्रीय समुदाय की तरफ से कोई असल प्रभावी कदम उठाया जा सकेगा।


गांबिया ने नवंबर 2019 में म्यांमार के खिलाफ अंतरराष्ट्रीय न्यायालय में मुकदमा दायर किया था। उसमें आरोप लगाया गया है कि म्यांमार सरकार जनसंहार रोकने में नाकाम रही। उसके पहले सितंबर 2018 में अंतरराष्ट्रीय आपराधिक न्यायालय (आईसीसी) ने अपने मुख्य अभियोजक को म्यांमार में ‘मानवता के खिलाफ हुए अपराध’ की जांच की अनुमति दे दी थी।

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