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Axiom-4: बीज परीक्षण-मांसपेशियों की कमजोरी से लेकर मधुमेह तक, ISS पर क्या प्रयोग करेंगे शुभांशु; ये अहम क्यों?

Fri, 27 Jun 2025 01:01 PM IST
कीर्तिवर्धन मिश्र स्पेशल डेस्क, अमर उजाला
स्पेशल डेस्क, अमर उजाला Published by: कीर्तिवर्धन मिश्र Updated Fri, 27 Jun 2025 01:01 PM IST
सार

आईएसएस पर पहुंचने के बाद शुभांशु की क्या जिम्मेदारी हैं? यहां वे किस तरह के प्रयोगों (एक्सपेरिमेंट) और अभियानों का हिस्सा बनेंगे? इनसे भारत के गगनयान मिशन को किस तरह से फायदा होगा? आइये जानते हैं...

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Axiom 4 Mission From experiments on seeds to Muscle Loss and Blood Sugar know Shubhanshu Shukla work in ISS
एक्सिओम मिशन-4 के तहत शुभांशु शुक्ला कई एक्सपेरिमेंट का हिस्सा बनेंगे। - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार

निजी स्पेस कंपनी एक्सिओम के एक्सिओम-4 मिशन के तहत शुभांशु शुक्ला गुरुवार (26 जून) को अंतरराष्ट्रीय स्पेस स्टेशन (आईएसएस) पहुंच गए। यहां अपने टीम के अन्य सदस्यों के साथ अब शुभांशु कई ऐसे प्रयोगों में हिस्सा लेंगे, जो कि पृथ्वी और अंतरिक्ष के माहौल में बदलाव को समझने और भविष्य में इन स्थितियों का लाभ दिलवाने में सहायक होगा। 
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ऐसे में यह जानना अहम है कि एक्सिओम मिशन में ग्रुप कैप्टन शुभांशु शुक्ला की दो हफ्ते तक क्या भूमिका रहेगी? वे अपने साथ क्या-क्या लेकर आईएसएस पर पहुंचे हैं? यहां वे किस तरह के प्रयोगों (एक्सपेरिमेंट) और अभियानों में शामिल होंगे? इनसे भारत के गगनयान मिशन को किस तरह से फायदा होगा? आइये जानते हैं...
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एक्सिओम मिशन में क्या होगी शुभांशु शुक्ला की भूमिका?
शुभांशु शुक्ला इस मिशन में पायलट के तौर पर आईएसएस भेजे गए हैं। यानी जिस ड्रैगन कैप्सूल के जरिए एक्सिओम-4 मिशन को अंतरराष्ट्रीय स्पेस स्टेशन (आईएसएस) रवाना किया गया है, शुभांशु उसको गाइड करने (नैविगेशन) में अहम भूमिका निभाई है। स्पेसक्राफ्ट को आईएसएस पर डॉक कराने से लेकर अंतरिक्ष यात्रियों को सुरक्षित पहुंचाने तक की जिम्मेदारी शुभांशु के ही कंधों पर रही। अब जब शुभांशु अपनी टीम के साथ आईएसएस से लौटेंगे तब भी शुभांशु को पायलट के तौर पर जिम्मेदारियां उठानी होंगी। लौटने में अगर कैप्सूल में किसी तरह की दिक्कत में आती है तो शुभांशु के पास ही यान का कंट्रोल और आपात फैसले लेने की जिम्मेदारी है। कुल मिलाकर शुभांशु इस मिशन में सेकंड-इन-कमांड की भूमिका में हैं। पेगी व्हिट्सन के बाद वे एक्सिओम-4 का सबसे अहम केंद्र हैं। 

आईएसएस पर किन-किन प्रयोगों को अंजाम देंगे शुभांशु शुक्ला?
 

प्रयोग-1: छह फसलों के बीज का परीक्षण
शुभांशु आईएसएस पर छह तरह की फसलों के बीज साथ लेकर गए हैं। अपने 14 दिन के सफर के दौरान वे इन बीजों के माइक्रोग्रैविटी में विकास को लेकर अहम जानकारी इकट्ठा करेंगे। इस प्रयोग का मकसद आने वाले समय में अंतरिक्ष में खेती करने के विकल्पों को तलाशना होगा। 

प्रयोग-2: काई के इस्तेमाल पर एक्सपेरिमेंट
शुभांशु अपने मिशन के लिए माइक्रोएल्गी (Microalgae) यानी काई के तीन स्ट्रेन लेकर पहुंचे हैं। वे कम गुरुत्वाकर्षण के बीच इन्हें खाने, ईंधन और लंबी अवधि के अंतरिक्ष मिशन के दौरान जीवन बचाने के विकल्प के तौर पर प्रयोग में लाएंगे। 

प्रयोग-3: कठिन परिस्थितियों में जीवाश्मों के सुरक्षित रहने पर
एक्सिओम-4 के मिशन में शुभांशु टार्डीग्रेड्स (एक तरह का छोटा जीव, जो कि चरम स्थितियों में भी खुद को सामान्य रख सकता है) पर परीक्षण करेंगे। इसके जरिए यह जानने की कोशिश की जाएगी कि अंतरिक्ष के खतरनाक माहौल में कौन से जीवाणु सुरक्षित रह सकते हैं।

प्रयोग-4: मांसपेशियों के कमजोर होने पर
एक और प्रयोग के जरिए यह जानने की कोशिश की जाएगी कि शून्य गुरुत्वाकर्षण में इंसानों में मांस कैसे कम होता है और इससे निपटा कैसे जा सकता है। आमतौर पर लंबी अवधि के मिशन में अंतरिक्ष यात्रियों को मसल एट्रोफी यानी मांस घटने की शिकायत आती है। ऐसे में अंतरिक्षयात्रियों पर पाचन से जुड़े सप्लीमेंट्स का असर देखा जाएगा। 

प्रयोग-5: आंखों पर पड़ने वाला प्रभाव
एक्सिओम-4 मिशन के दौरान एक स्टडी माइक्रोग्रैविटी के आंखों पर पड़ने वाले प्रभाव पर भी की जाएगी। इस रिसर्च में यह पता लगाया जाएगा कि अंतरिक्ष में एस्ट्रोनॉट्स की आंखों की पुतलियों का मूवमेंट किस हद तक प्रभावित होता है। साथ ही इससे किसी की तनाव और सजगता कितनी प्रभावित होती है। 

प्रयोग-6: अलग-अलग फसलों की पोषण गुणवत्ता
मिशन के दौरान कुछ बीजों को अंकुरित करने का प्रयास किया जाएगा। इनके पोषक तत्वों को भी मापा जाएगा, जिससे पृथ्वी और जीरो ग्रैविटी में पैदा हुई फसलों के पोषण में अंतर को समझने का प्रयास किया जाएगा। यह प्रयोग भविष्य में अंतरिक्ष यात्रियों के बोझ को घटाएगा, क्योंकि अगर अंतरिक्ष में फसलें बराबर या ज्यादा मात्रा में पोषक होती हैं, तो इन्हें वहीं उगाने की कोशिश की जाएगी।

प्रयोग-7: यूरिया और नाइट्रेट में सायनोबैक्टेरिया का इस्तेमाल
शुभांशु शुक्ला के सबसे कठिन प्रयोगों में से यह एक रहेगा। दरअसल, अंतरिक्ष में खाना, पानी और ऑक्सीजन की उपलब्धता बड़ी समस्या रही है। खासकर लंबी अवधि के अभियानों के लिए। ऐसे में वैज्ञानिक काफी समय से आईएसएस पर ही इन चीजों की व्यवस्था की कोशिशों में जुटे हैं। अब यूरिया और नाइट्रेट में सायनोबैक्टीरिया का इस्तेमाल कर वैज्ञानिक यह देखने की कोशिश में हैं कि क्या अंतरिक्ष की जीरो ग्रैविटी में खाना और ऑक्सीजन एक साथ पैदा किए जा सकते हैं। गौरतलब है कि यूरिया और नाइट्रेट दोनों ही खाना बनाने के लिए अहम हैं।  

प्रयोग-8: अंतरिक्ष के माहौल में ब्लड शुगर पर रखी जाएगी नजर

 

2. खाद्य सामग्री के होने वाले प्रभाव
आमतौर पर अंतरराष्ट्रीय स्पेस स्टेशन पर जाने वाले मिशन्स के लिए नासा की स्पेस फूड सिस्टम्स लैब खाने के सैंपल तैयार करके भेजती है। इनमें सूखा-जमा हुआ खाना होता है, जो कि पैक्ड होता है। इसमें पाउडर स्वरूप में पेय पदार्थ, बिस्किट, भोजन, आदि होते हैं। इन्हें अंतरिक्ष यात्री अपनी पसंद के हिसाब से ले सकते हैं। हालांकि, खाने की इन चीजों में भारतीय व्यंजन अब तक शामिल नहीं किए गए थे। 

अब भारतीय अंतरिक्ष एजेंसी (इसरो) और डीआरडीओ ने कई वर्षों की रिसर्च के बाद अंतरिक्ष यात्रियों के लिए स्पेस में लिए जा सकने वाला खाना तैयार करने में सफलता हासिल की है। पहले शुभांशु को अपने साथ खाने की इन सामग्रियों को ले जाने की इजाजत नहीं थी, क्योंकि यह काफी मसालेदार होते हैं। हालांकि, बाद में इसकी इजाजत दे दी गई। 

अब इस खाने को आईएसएस पर इस्तेमाल करने के बाद इसरो अपने गगनयान मिशन में चयनित हुए अंतरिक्ष यात्रियों के लिए भी इस्तेमाल कर सकता है। माना जा रहा है कि 2027 में रवाना होने वाले गगनयान में कई और खाने की वैराइटियों को शामिल किया जाएगा। चूंकि शुभांशु उस मिशन में भी शामिल होंगे, इसलिए एग्जियोम का मिशन भारतीय खाने और अंतरिक्ष में उसके स्वाद में परीक्षण का एक अहम मौका होगा।
 

शुभांशु के साथ मिशन में और क्या भेजा गया?
बताया गया है कि शुभांशु अपनी कुछ और चीजों को एक्सिओम-4 मिशन पर ले गए हैं। हालांकि, इसकी जानकारी गुप्त रखी गई है। इस बीच में मिशन में एक सॉफ्ट टॉय (मुलायम खिलौने) को भेजा गया, जो कि जॉय नाम का एक हंस है। इसकी वजह यह थी कि जब स्पेसक्राफ्ट पृथ्वी की कक्षा से निकलकर अंतरिक्ष पहुंचा, तब जीरो ग्रैविटी की शुरू हो गई। इसी का संकेत देने के लिए यह सॉफ्ट टॉय भेजा गया, जो कि गुरुत्वाकर्षण बल की गैरमौजूदगी में खुद ही उड़ने लगेगा। अब वापसी की उड़ान में भी इस सॉफ्ट टॉय की भी वापसी होगी। लौटने के दौरान जब यह खिलौना हवा में तैरना बंद कर देगा, तब अंतरिक्ष यात्रियों को यह अंदाजा हो जाएगा कि वे पृथ्वी की कक्षा में लौट चुके हैं और गुरुत्वाकर्षण बल का प्रभाव फिर से आ गया है। 

इसरो का कहना है कि शुभांशु आईएसएस में रहते हुए कुछ मौकों पर भारतीय छात्रों के साथ एक इंटरेक्टिव सत्र का हिस्सा बनेंगे। वे स्पेस स्टेशन के जीवन के बारे में अपने अनुभव साझा करेंगे। इसका मकसद भारतीय छात्रों, इंजीनियरों और वैज्ञानिकों का रुझान अंतरिक्ष के प्रति बढ़ाना है।
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