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म्यांमार की सेना का सख्त रुख: नाकाम रही गतिरोध तोड़ने की आसियान की पहल

Sat, 19 Feb 2022 07:34 PM IST
Harendra Chaudhary वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला, यंगून
वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला, यंगून Published by: Harendra Chaudhary Updated Sat, 19 Feb 2022 07:34 PM IST
सार

विश्लेषकों का कहना है कि 37 वर्षों से सत्तारूढ़ हुन सेन एक मध्यस्थ की भूमिका निभाने की कोशिश कर रहे हैं, लेकिन आसियान के कई सदस्य देशों को ये पहल मंजूर नहीं है। कुछ पर्यवेक्षक हुन सेन के इस रुख के पीछे चीन का हाथ देखते हैं। म्यांमार की तरह ही कंबोडिया के भी चीन के साथ निकट रिश्ते हैं...

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ASEAN, the Association of Southeast Asian Nations once again failed to resolve the impasse over the Myanmar issue
म्यांमार के सैनिक तानाशाह जनरल मिन आंग हलायंग - फोटो : Agency (File Photo)

विस्तार

दक्षिण पूर्व एशियाई देशों का संघ आसियान एक बार फिर म्यांमार के मुद्दे पर गतिरोध दूर करने में नाकाम रहा है। गुरुवार को आसियान के विदेश मंत्रियों की हुई बैठक से यही संकेत मिला। आसियान ने म्यांमार के सैनिक शासन से इस बैठक में किसी गैर-राजनीतिक प्रतिनिधि को भेजने का अनुरोध किया था। लेकिन म्यांमार के सैनिक तानाशाह जनरल मिन आंग हलायंग ने ये अनुरोध ठुकरा दिया।

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विदेश मंत्रियों की बैठक कंबोडिया की राजधानी नॉम पेन्ह में हुई। कंबोडिया इस समय दस देशों के इस संघ का अध्यक्ष है। इन दस देशों में म्यांमार भी एक है। बैठक के बाद कंबोडिया के विदेश मंत्री प्राक सोखोन ने कहा- विदेश मंत्रियों ने म्यांमार की घटनाओं पर चर्चा की। उन्होंने वहां की स्थिति पर अपनी चिंता फिर जताई है। खास कर वहां से मौत और हिंसा की मिल रही खबरों पर चिंता जताई गई।

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आसियान में म्यांमार पर भड़के सदस्य देश

पर्यवेक्षकों ने ध्यान दिलाया है कि ये बैठक मूल रूप से 18 और 19 जनवरी को होने वाली थी। लेकिन म्यांमार के मुद्दे पर आसियान में मतभेद गहरा जाने के कारण वो बैठक टालनी पड़ी। तब कंबोडिया के प्रधानमंत्री हुन सेन ने म्यांमार के सैनिक शासन के विदेश मंत्री वुना मुआंग ल्विन को आसियान बैठक के लिए आमंत्रित कर दिया था। लेकिन उसका मलयशिया, इंडोनेशिया, और सिंगापुर जैसे देशों ने कड़ा विरोध किया। ये देश ऐसे किसी कदम के खिलाफ हैं, जिससे सैनिक शासन को वैधता मिलने का संदेश जाए।

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आसियान के कई सदस्य देशों के विरोध की वजह से इस बार हुई बैठक के लिए म्यांमार के गैर-राजनीतिक प्रतिनिधि को बुलाने का फैसला हुआ। वेबसाइट निक्कईएशिया.कॉम ने अपनी एक विशेष रिपोर्ट में बताया है कि सैनिक शासन ने आसियान के इस आमंत्रण को ठुकरा दिया। इस बारे में वुना मुआंग ल्विन ने जवाब भेजा, जिसमें कहा गया- ‘गैर राजनीतिक प्रतिनिधि भेजने से आसियान के समान प्रतिनिधित्व के सिद्धांत और व्यवहार का उल्लंघन होगा।’

क्या इसके पीछे चीन का हाथ?

हुन सेन ने जनवरी के पहले हफ्ते में म्यांमार की यात्रा की थी। वहां वे मिन आंग हलायंग से मिले थे। म्यांमार में एक फरवरी 2021 हुए सैनिक तख्ता पलट के बाद किसी देश के सरकार प्रमुख की यह पहली म्यांमार यात्रा थी। विश्लेषकों का कहना है कि 37 वर्षों से सत्तारूढ़ हुन सेन एक मध्यस्थ की भूमिका निभाने की कोशिश कर रहे हैं, लेकिन आसियान के कई सदस्य देशों को ये पहल मंजूर नहीं है। कुछ पर्यवेक्षक हुन सेन के इस रुख के पीछे चीन का हाथ देखते हैं। म्यांमार की तरह ही कंबोडिया के भी चीन के साथ निकट रिश्ते हैं।



जानकारों की राय है कि म्यांमार के सैनिक शासकों ने आसियान का न्योता ठुकरा कर हुन सेन की बीच का रास्ता अपनाने की नीति पर विराम लगा दिया है। इससे अब म्यांमार के मामले में आसियान के पांच सूत्री योजना पर चलने का रास्ता साफ हो गया है। अप्रैल 2021 में आसियान में इस योजना पर सहमति बनी थी। इसमें म्यांमार में हिंसा की तुरंत समाप्ति, सभी पक्षों के बीच रचनात्मक बातचीत, वार्ता को संभव बनाने के लिए आसियान के एक दूत की नियुक्ति, म्यांमार के लिए मानवीय सहायता भेजने, और आसियान का एक दूत म्यांमार भेजने की बात शामिल की गई थी।

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