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Hindi News ›   World ›   As US packs up and leaves Afghanistan under Taliban rule after 20 years of War A novel The Kill List described the whole scenario in 2013

अफगानिस्तान: 8 साल पुरानी किताब में अमेरिका की विदाई का हूबहू जिक्र, तालिबान-आईएसआई के रिश्तों पर भी था खुलासा

Tue, 31 Aug 2021 11:16 AM IST
कीर्तिवर्धन मिश्र कीर्तिवर्धन मिश्र
कीर्तिवर्धन मिश्र Published by: कीर्तिवर्धन मिश्र Updated Tue, 31 Aug 2021 11:16 AM IST
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सार
ब्रिटिश पत्रकार फ्रेड्रिक मैकार्थी के 2013 में आए उपन्यास 'द किल लिस्ट' में तालिबान से हक्कानी नेटवर्क के रिश्तों और उनके पाकिस्तान में पनाह लेने की भी पूरी जानकारी दी गई थी। 
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As US packs up and leaves Afghanistan under Taliban rule after 20 years of War A novel The Kill List described the whole scenario in 2013
अफगानिस्तान में 20 साल तक ऑपरेशन चलाने के बाद तालिबान के हाथ देश छोड़ लौटी अमेरिकी सेना। - फोटो : Social Media

विस्तार

अमेरिकी सेना की आखिरी टुकड़ी सोमवार देर रात अफगानिस्तान छोड़कर लौट गई। इसी के साथ अब पूरे देश में 20 साल बाद फिर तालिबान का कब्जा हो गया है। पिछले कुछ दिनों में अमेरिका की ओर से अफगानिस्तान में आतंकवाद के खिलाफ चलाए गए मिशनों और उनकी सफलता-असफलता को लेकर कई विश्लेषण आए। हालांकि, जैसा घटनाक्रम बीते दिनों में हुआ है, उसका जिक्र एक 2013 की किताब 'द किल लिस्ट' में हूबहू मिलता है। इसके लेखक फ्रेड्रिक मैकार्थी एक जाने-माने अमेरिकी पत्रकार हैं, जिन्होंने अफगानिस्तान पर कई और किताबें भी लिखी हैं। 

किताब में तालिबान-हक्कानी नेटवर्क के संबंधों का जिक्र

द किल लिस्ट उपन्यास वैसे तो काल्पनिक घटनाक्रम पर आधारित है, लेकिन तालिबान, पाकिस्तान, आईएसआई के संबंधों को लेकर लेखक ने इसमें अपनी अफगान मामलों से जुड़ी जानकारी का इस्तेमाल किया है। इस किताब के एक छठे चैप्टर में फ्रेड्रिक ने तालिबान और हक्कानी नेटवर्क के रिश्तों का जिक्र किया और कहा कि जब सोवियत सेनाओं के जाने के बाद तालिबान ने अफगानिस्तान पर शासन कायम किया (1992-1996), तब जलालुद्दीन हक्कानी तालिबान का कमांडर बन गया। बाद में जब अमेरिकी सेना ने तालिबान को हराया, तो हक्कानी गुट के आतंकी पाकिस्तान बॉर्डर पार कर वजीरिस्तान चले गए। 

फ्रेड्रिक ने इस उपन्यास में लिखा है- "पाकिस्तान का वजीरिस्तान अमेरिकी और नाटो सेनाओं के खिलाफ आतंकी हमलों का केंद्र बन गया। इस संगठन में अल-कायदा के वे आतंकी भी जुड़े, जो जिंदा बचे थे।" इस कहानी में कहा गया है कि अमेरिकी सेना ने एक-एक कर तालिबान, हक्कानी नेटवर्क और अल-कायदा के इन आतंकियों की पहचान की और उन्हें ड्रोन हमलों का निशाना बनाना शुरू किया। अफगानिस्तान की पहाड़ियों पर वे सेना से तो काफी सुरक्षित थे, लेकिन हर वक्त उड़ते ड्रोन्स का खतरा उनके सिर पर ही मंडरा रहा था। 

इसी किताब के छठे चैप्टर के 9वें पन्ने पर आज के हालात की हूबहू भविष्यवाणी की गई है। इसमें लिखा, "आतंकियों के पाकिस्तान के आईएसआई से पुराने संबंध खत्म नहीं हुए थे। आखिर आईएसआई ने ही तालिबान को बनाया था और तब से लगातार उस पर की गई हर भविष्यवाणी पर नजर रख रहा था। उसका मानना था कि अभी जरूर अमेरिका की घड़ी है, लेकिन अफगानों के पास पूरा समय है। एक दिन, अमेरिकी अपना सामान समेटेंगे और अफगानिस्तान से निकल जाएंगे। तब तालिबान फिर से अफगानिस्तान को जीत लेगा। पाकिस्तान भी दो बॉर्डर पर भारत और अफगानिस्तान जैसे दो दुश्मन नहीं चाहता। एक ही दुश्मन काफी होगा और वो होगा भारत।" 
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