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ब्राजीलः तो इन तरकीबों से लूला ने दक्षिणपंथी बोल्सोनारो को दी मात, पर अब पहनेंगे काटों से भरा ताज

Mon, 31 Oct 2022 07:35 PM IST
कीर्तिवर्धन मिश्र वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला, साओ पाउलो
वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला, साओ पाउलो Published by: कीर्तिवर्धन मिश्र Updated Mon, 31 Oct 2022 07:35 PM IST
सार

लैटिन अमेरिका में पिछले कुछ वर्षों से चल रही वामपंथ की लहर 76 वर्षीय लूला की जीत के साथ इस इलाके के सबसे बड़े देश यानी ब्राजील में भी कामयाब हो गई है। इसके पहले अर्जेंटीना, कोलंबिया, पेरू, चिली, होंडूरास और मेक्सिको में भी वामपंथी नेता चुनाव जीत चुके हैं।

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As Lula wins Brazil Presidential Elections his challenges to test hardship against Right Winger Bolsonaro news
लुईस इनासयू लूला द सिल्वा - फोटो : Reuters

विस्तार

ब्राजील के राष्ट्रपति चुनाव में लुइज इनेसियो लूला दा सिल्वा की जीत को दूरगामी महत्त्व का समझा जा रहा है। लूला ने कड़ी टक्कर के बाद ब्राजील के मौजूदा राष्ट्रपति जायर बोल्सोनारो को हरा दिया है। रविवार को राष्ट्रपति चुनाव के दूसरे चरण के लिए मतदान हुआ। इसमें लूला को 50.9 और बोल्सोनारो को 49.1 प्रतिशत वोट मिले। 
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लूला की जीत से ब्राजील में छह साल बाद वामपंथ की वापसी हुई है। इससे पहले लूला को भ्रष्टाचार के एक मामले में निचली अदालत ने सजा सुनाई थी, जिस कारण वे 580 दिन जेल में रहे। लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने उन्हें तमाम आरोपों से बरी कर दिया, जिससे उनके फिर चुनाव लड़ने का रास्ता खुला था। सुप्रीम कोर्ट ने लूला की इस दलील को स्वीकार कर लिया कि उन पर आरोप दुर्भावनावश लगाए गए थे। 
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रविवार को विजयी होने के बाद लूला ने अपने हजारों समर्थकों को संबोधित करते हुए कहा- ‘उन्होंने मुझ दफनाने की कोशिश की थी, लेकिन मैं आज यहां मौजूद हूं। एक जनवरी 2023 से मैं साढ़े 21 करोड़ ब्राजीलवासियों का शासन संभालूंगा, सिर्फ उन लोगों का नहीं, जिन्होंने मुझे वोट दिया है।’ इसके पहले लूला 2003 से 2010 तक ब्राजील के राष्ट्रपति थे। उस दौर को गरीबी और गैर-बराबरी में भारी गिरावट और कल्याणकारी योजनाओं के कई नए सफल प्रयोगों के लिए याद किया जाता है।
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लैटिन अमेरिका में पिछले कुछ वर्षों से चल रही वामपंथ की लहर 76 वर्षीय लूला की जीत के साथ इस इलाके के सबसे बड़े देश यानी ब्राजील में भी कामयाब हो गई है। इसके पहले अर्जेंटीना, कोलंबिया, पेरू, चिली, होंडूरास और मेक्सिको में भी वामपंथी नेता चुनाव जीत चुके हैं। विश्लेषकों के मुताबिक लूला ने इस बार का चुनाव वामपंथी से ज्यादा मध्यमार्गी एजेंडे पर लड़ा। उन्होंने मध्यमार्गी दलों और कुछ ऐसी पार्टियों को भी अपने गठबंधन में शामिल किया, जिनका रुझान दक्षिणपंथ की तरफ है। उन्होंने उप राष्ट्रपति पद के लिए साओ पाओलो राज्य के पूर्व गवर्नर जेराल्डो एल्कमिन को उम्मीदवार बनाया, जिनका आम रुझान दक्षिणपंथी रहा है। इसके अलावा इस बार चुनाव अभियान के दौरान आर्थिक मुद्दों पर ज्यादा खुल कर बोलने से लूला बचते रहे। 

विश्लेषकों के मुताबिक लूला की ये रणनीति कामयाब रही। साओ पाओलो में एफजीवी बिजनेस स्कूल में कानून और मानव अधिकार विषय के प्रोफेसर थियागो अम्पारो के मुताबिक यह लूला की मजबूरी थी कि वे गठबंधन बनाने में व्यावहारिक नजरिया अपनाएं। उनकी रणनीति उन तमाम लोगों का समर्थन पाने की थी, जो बोल्सोनारो से नाराज रहे हैं। अम्पारो ने कहा- ‘बहुत से मतदाता इस बार वोट डालने की किसी उम्मीद की वजह से नहीं, बल्कि बोल्सोनारो से मुक्ति पाने के मकसद से गए। वैसे पिछली सरकार के समय लूला की जो आर्थिक उपलब्धियां रही थीं, वे भी उनके काम आईं।’


समझा जाता है कि लूला के लिए इस बार शासन करना पहले जितना आसान नहीं होगा। बोल्सोनारो के शासनकाल में देश की जनता में गहरा विभाजन हो गया है। थिंक टैंक सेबरा से जुड़ी राजनीति शास्त्री केमिला रोशा ने अमेरिकी टीवी चैनल सीएनएन से कहा- ‘बोल्सोनारो की लिबरल पार्टी और उसके सहयोगियों के संसद में सबसे ज्यादा सदस्य हैं। उनसे सरकार को कड़ा विरोध झेलना होगा। फिर अपने गठबंधन के भीतर मंत्रियों के चयन और नीतियों के मामले में तालमेल बनाने की कठिन चुनौती लूला के सामने होगी।’ इसके बावजूद लूला की जीत को इसलिए अहम माना जा रहा है कि इससे ब्राजील में एक नई शुरुआत का रास्ता खुला है। 
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