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दिमाग का 'जीपीएस' खोजने वालों को नोबेल

Tue, 07 Oct 2014 12:33 PM IST
म्स गॉलाघर/स्वास्थ्य संपादक, बीबीसी
म्स गॉलाघर/स्वास्थ्य संपादक, बीबीसी Updated Tue, 07 Oct 2014 12:33 PM IST
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nobel prize for the inventor of gps of mind

मस्तिष्क शरीर का सबसे जटिल हिस्सा माना जाता है और इसी दिमाग के 'जीपीएस सिस्टम' को खोजने के लिए मिला है इस बार का मेडिसिन का नोबेल पुरस्कार तीन वैज्ञानिकों को।

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इनमें से प्रोफेसर जॉन ओ कीफ ब्रितानी मूल के वैज्ञानिक हैं जबकि मे-ब्रिट मोजर और एडवर्ड मोजर नॉर्वे के हैं।

इन तीनों ने ये खोज की है कि हमारा दिमाग कैसे पता करता है कि हम कहां हैं और वह कैसे एक जगह से दूसरी जगह जाता है, इसलिए इसे दिमाग का 'जीपीएस सिस्टम' कहा जा रहा है।
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तीनों वैज्ञानिकों की ये रिसर्च हमें यह समझने में मदद करेगी कि अल्जाइमर के मरीज क्यों अपने आस-पास के लोगों और चीजों को पहचान नहीं पाते।

नोबेल एसेम्बली का कहना है, "यह खोज हमारे लिए उस समस्या का समाधान लेकर आया है जिससे हमारे वैज्ञानिक और दार्शनिक सदियों से जूझते रहे।"

यूनिवर्सिटी कॉलेज लंदन के प्रोफेसर ओ कीफ ने साल 1971 में मस्तिष्क के भीतरी 'पोजिशनिंग सिस्टम' के पहले हिस्से का पता लगा लिया था।

इस खोज से ये जानकारी सामने आई थी कि जब भी कमरे के किसी हिस्से में चूहा उपस्थित होता है, तंत्रिका कोशिकाएं सक्रिय हो जाती हैं।

जबकि चूहे के कमरे के दूसरे हिस्से में होने से दिमाग की दूसरी कोशिकाएं सक्रिय हो उठती हैं।

मस्तिष्क विकारों को समझने में मिलेगी मदद

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ओ कीफ का तर्क है कि यही 'प्लेस' कोशिकाएं मस्तिष्क के भीतर एक मानचित्र तैयार करती हैं जो बताती हैं कि हम कहां हैं?

साल 2005 में मे-ब्रिट मोजर और एडवर्ड मोजर, पति और पत्नी की टीम, ने मस्तिष्क के एक अलग हिस्से का पता लगाया जो नाविकों द्वारा चार्ट की तरह काम करता है।

मे-ब्रिट और एडवर्ड के अनुसार ये 'ग्रिड' कोशिकाएं अक्षांश और देशांतर की रेखाओं को समझ सकती हैं और इस तरह ये मस्तिष्क को दूरी का आकलन करने और आवागमन में मदद करती हैं।

नोबेल कमिटी का कहना है कि ग्रिड और प्लेस कोशिकाएं मस्तिष्क का भीतरी 'जीपीएस' यानी महत्वपूर्ण पोजिशनिंग सिस्टम तैयार करती हैं।

उन्होंने आगे बताया कि अल्ज़ाइमर, डिमेन्शिया जैसे मस्तिष्क रोगों सहित कई मस्तिष्क विकारों में यही पोजिशनिंग सिस्टम प्रभावित हो जाता है।

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