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ट्रंप के शपथ ग्रहण में शामिल होने को बेचैन हैं नवाज
टीम डिजिटल/अमर उजाला, नई दिल्ली
Updated Tue, 13 Dec 2016 09:23 PM IST
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फाइलः डोनाल्ड ट्रंप
- फोटो : Forbes
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पाकिस्तान के लिए इस खबर को पचा पाना आसान नहीं था कि जिस डोनाल्ड ट्रंप ने बाहरी मुस्लिमों को अमेरिका में घुसने से रोकने और आतंकवाद को पश्रय देने के लिए पाकिस्तान के साथ कड़ाई से पेश आने की धमकी दी थी, वही अमेरिका के नव निर्वाचित राष्ट्रपति होंगे। यह भारत के पड़ोसी देश के लिए चिंता और परेशानी के क्षण थे।
इसके बाद खुशी के क्षण आए, जब ट्रंप ने पाकिस्तान के प्रधानमंत्री नवाज को फोन पर बधाई दी और उनकी तारीफ की। यह दो सप्ताह पहले की बात है। ट्रंप ने 'बेहतरीन' और 'टेरेफिक' जैसे शब्दों का प्रयोग किया। इस बातचीत में ट्रंप ने इशारा किया कि वह भारत और पाकिस्तान के बीच कश्मीर को लेकर चल रहे विवाद को सुलझाने में मदद की इच्छा रखते हैं।
चिंता और खुशी के क्षण अब गुम हो चुके हैं और पाकिस्तानी वॉशिंगटन के साथ अपने रिश्ते को नए सिरे से बनाने की तैयारी कर रहे हैं। पिछले सप्ताह पाकिस्तान सरकार ने एक विशेष दूत तारिक फतेमी को वॉशिंगटन भेजा, जहां फतेमी ने यह संकेत दिया कि प्रधानमंत्री नवाज शरीफ नवनिर्वाचित राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के शपथ ग्रहण कार्यक्रम में शामिल हो सकते हैं।
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फतेमी ने उम्मीद जताई कि आने वाला प्रशासन पाकिस्तान को अमेरिका के साथ रिश्तों में अपनी विश्वसनीयता साबित करने के लिए नया मौका देगा।
पेंस ने भी उठाया कश्मीर में हस्तक्षेप का मामला
पाकिस्तान के पास यह मानने के पर्याप्त कारण हैं कि ट्रंप प्रशासन के साथ मजबूत रिश्ता भारत के साथ संबंधों में मध्यस्थता करने के लिए एक बयान से ज्यादा है। दरअसल, नवनिर्वाचित उपराष्ट्रपति माइक पेंस ने भी कई मौकों पर इस ऑफर को दोहराया है। पेंस का कहना है कि ट्रंप प्रशासन की योजना दोनों देशों के साथ मिलकर कश्मीर मुद्दे को सुलझाने में अहम भूमिका निभाने की है।
ट्रंप के विदेश मामलों में जानकारी और मुस्लिम विरोधी छवि को लेकर आधी अधूरी चिंताओं के बीच कुछ पाकिस्तानी विशेषज्ञों का मानना है कि व्हाइट हाउस में डीलमेकर का होना पाकिस्तान के लिए फायदे का सौदा हो सकता है।
दूसरी ओर भारत ने कश्मीर मुद्दे पर अमेरिकी हस्तक्षेप के प्रस्ताव को खारिज कर दिया है। दोनों देश कश्मीर पर अपना दावा जताते रहे हैं, जहां हालिया समय में हिंसा और विरोध प्रदर्शन लगातार जारी हैं। अक्टूबर महीने में नवाज शरीफ ने यूनाइटेड नेशंस में कश्मीर में हिंसा को लेकर भारत पर आरोप लगाए। दूसरी ओर उड़ी हमले के लिए भारत ने पाकिस्तान को जिम्मेदार ठहराया।
पाकिस्तानी संसद में विदेश मामलों की कमेटी के चेयरमैन अवेश लेघारी ने कहा, 'अमेरिका के लिए सबसे बड़ी चिंता यह है कि कश्मीर मुद्दे पर मध्यस्थता दोनों देशों के बीच विवाद को जन्म दे सकती है।' उन्होंने कहा कि सुपरपॉवर की मदद के बिना हम इसे हल नहीं कर सकते। यह एक फोन कॉल से ज्यादा की मांग करता है और बहुत ज्यादा कठिन परिश्रम की भी।
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इसके बाद खुशी के क्षण आए, जब ट्रंप ने पाकिस्तान के प्रधानमंत्री नवाज को फोन पर बधाई दी और उनकी तारीफ की। यह दो सप्ताह पहले की बात है। ट्रंप ने 'बेहतरीन' और 'टेरेफिक' जैसे शब्दों का प्रयोग किया। इस बातचीत में ट्रंप ने इशारा किया कि वह भारत और पाकिस्तान के बीच कश्मीर को लेकर चल रहे विवाद को सुलझाने में मदद की इच्छा रखते हैं।
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चिंता और खुशी के क्षण अब गुम हो चुके हैं और पाकिस्तानी वॉशिंगटन के साथ अपने रिश्ते को नए सिरे से बनाने की तैयारी कर रहे हैं। पिछले सप्ताह पाकिस्तान सरकार ने एक विशेष दूत तारिक फतेमी को वॉशिंगटन भेजा, जहां फतेमी ने यह संकेत दिया कि प्रधानमंत्री नवाज शरीफ नवनिर्वाचित राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के शपथ ग्रहण कार्यक्रम में शामिल हो सकते हैं।
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फतेमी ने उम्मीद जताई कि आने वाला प्रशासन पाकिस्तान को अमेरिका के साथ रिश्तों में अपनी विश्वसनीयता साबित करने के लिए नया मौका देगा।
पेंस ने भी उठाया कश्मीर में हस्तक्षेप का मामला
पाकिस्तान के पास यह मानने के पर्याप्त कारण हैं कि ट्रंप प्रशासन के साथ मजबूत रिश्ता भारत के साथ संबंधों में मध्यस्थता करने के लिए एक बयान से ज्यादा है। दरअसल, नवनिर्वाचित उपराष्ट्रपति माइक पेंस ने भी कई मौकों पर इस ऑफर को दोहराया है। पेंस का कहना है कि ट्रंप प्रशासन की योजना दोनों देशों के साथ मिलकर कश्मीर मुद्दे को सुलझाने में अहम भूमिका निभाने की है।
ट्रंप के विदेश मामलों में जानकारी और मुस्लिम विरोधी छवि को लेकर आधी अधूरी चिंताओं के बीच कुछ पाकिस्तानी विशेषज्ञों का मानना है कि व्हाइट हाउस में डीलमेकर का होना पाकिस्तान के लिए फायदे का सौदा हो सकता है।
दूसरी ओर भारत ने कश्मीर मुद्दे पर अमेरिकी हस्तक्षेप के प्रस्ताव को खारिज कर दिया है। दोनों देश कश्मीर पर अपना दावा जताते रहे हैं, जहां हालिया समय में हिंसा और विरोध प्रदर्शन लगातार जारी हैं। अक्टूबर महीने में नवाज शरीफ ने यूनाइटेड नेशंस में कश्मीर में हिंसा को लेकर भारत पर आरोप लगाए। दूसरी ओर उड़ी हमले के लिए भारत ने पाकिस्तान को जिम्मेदार ठहराया।
पाकिस्तानी संसद में विदेश मामलों की कमेटी के चेयरमैन अवेश लेघारी ने कहा, 'अमेरिका के लिए सबसे बड़ी चिंता यह है कि कश्मीर मुद्दे पर मध्यस्थता दोनों देशों के बीच विवाद को जन्म दे सकती है।' उन्होंने कहा कि सुपरपॉवर की मदद के बिना हम इसे हल नहीं कर सकते। यह एक फोन कॉल से ज्यादा की मांग करता है और बहुत ज्यादा कठिन परिश्रम की भी।
अमेरिका को लुभाने के अथक भारतीय प्रयास
फाइल फोटो
- फोटो : social media
हालांकि पाकिस्तान में ट्रंप को लेकर मतभिन्नता है। कुछ लोगों का कहना है कि ट्रंप का झुकाव भारत की ओर है। एक ऐसा देश जहां ट्रंप ने निवेश कर रखा है। भारत के दो शहरों में ट्रंप टॉवर का प्रस्ताव है। साथ ही भारतीय नेताओं ने अमेरिका को लुभाने के लिए अथक प्रयास किए हैं।
डॉन न्यूजपेपर की कॉलमनिस्ट हुमा युसुफ ने कहा, 'ट्रंप की तमाम तारीफों के बावजूद वॉशिंगटन का भारत के प्रति झुकाव वास्तविक है। हमें शब्दों के जाल में नहीं उलझना चाहिए।'
अमेरिका के साथ पाकिस्तान के रिश्ते में कई पेंच हैं। अफगानिस्तान में शांति के प्रयासों में पाकिस्तान अमेरिका का अहम सहयोगी है। अफगानिस्तान में अब भी 10 हजार अमेरिकी सैनिक जमीन पर जूझ रहे हैं। पाकिस्तानी अधिकारी अमेरिका के साथ अपने लंबे रिश्तों की दुहाई दे रहे हैं। अधिकारियों का मानना है कि ट्रंप प्रशासन शांति के लिए पाकिस्तान के प्रयासों को सराहेगा।
विशेषज्ञों का कहना है कि पाकिस्तान के लिए ऐसा कर पाना बहुत मुश्किल होगा। इस सप्ताह पाकिस्तानी अखबारों ने अमेरिकी अधिकारियों के बयानों को काफी प्रमुखता दी है। इनमें अफगानिस्तान में टॉप कमांडर जनरल जॉन डब्ल्यू निकोलसन का बयान भी शामिल हैं। निकोलसन का कहना है कि हक्कानी नेटवर्क अफगानिस्तान की सुरक्षा के लिए सबसे बड़ा खतरा है और उन्हें पाकिस्तान के अंदर पनाह मिलती है। यही नहीं व्हाइट हाउस के प्रवक्ता ने भी इस तरह की चिंता जताई थी।
इस्लामिक चरमपंथ को लेकर स्पष्ट है ट्रंप की सोच
दूसरी ओर डोनाल्ड ट्रंप की अपनी सोच है। नवनिर्वाचित राष्ट्रपति ने कई मौकों पर दूसरे देशों से अमेरिकी सेनाएं वापस बुलाने या वहीं रखने की बात कही है। हालांकि इस्लामिक चरमपंथ की बात आने पर ट्रंप के विचार स्पष्ट हैं कि इसे रोका जाना चाहिए। इसे लेकर ट्रंप ने पाकिस्तान के खिलाफ कड़ाई से निपटने को लेकर भी कोई झिझक नहीं दिखाई है।
छह महीने पहले ट्रंप ने फॉक्स न्यूज से कहा था कि वह पाकिस्तान पर दबाव बनाएंगे कि वह स्थानीय डॉक्टर शकील अफरीदी को रिहा करे, जिसे अमेरिका के लिए जासूसी करने के आरोप में जेल में डाल दिया गया है। ट्रंप के इस बयान ने पाकिस्तानियों को आक्रोश से भर दिया।
अफरीदी पर आरोप है कि ओसामा बिन लादेन के इलाके में वह फर्जी टीकाकरण कैंपेन चलाता और अमेरिका के लिए जासूसी करता था। इसी इलाके में साल 2011 में अमेरिका की स्पेशल फोर्सेस ने ओसामा बिन लादेन को मार गिराया। डॉक्टर शकील अफरीदी को विश्वासघाती माना गया।
राष्ट्रपति पद के लिए चुनाव प्रचार के शुरुआती समय में ट्रंप यह खुलकर कहते थे कि वह शकील अफरीदी को दो मिनट में छुड़ा सकते हैं क्योंकि पाकिस्तान अमेरिका से बहुत मदद प्राप्त करता है। ट्रंप ने घोषणा की थी कि अमेरिका पाकिस्तान की मदद नहीं कर सकता अगर वह आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई में मदद करने वाले लोगों को दंड देगा।
पाकिस्तान के आतंरिक मंत्री चौधरी निसार अली खान ने कहा था कि ट्रंप का यह बयान उनकी असंवेदनशीलता और पाकिस्तान के प्रति अज्ञानता को दर्शाता है।
डॉन न्यूजपेपर की कॉलमनिस्ट हुमा युसुफ ने कहा, 'ट्रंप की तमाम तारीफों के बावजूद वॉशिंगटन का भारत के प्रति झुकाव वास्तविक है। हमें शब्दों के जाल में नहीं उलझना चाहिए।'
अमेरिका के साथ पाकिस्तान के रिश्ते में कई पेंच हैं। अफगानिस्तान में शांति के प्रयासों में पाकिस्तान अमेरिका का अहम सहयोगी है। अफगानिस्तान में अब भी 10 हजार अमेरिकी सैनिक जमीन पर जूझ रहे हैं। पाकिस्तानी अधिकारी अमेरिका के साथ अपने लंबे रिश्तों की दुहाई दे रहे हैं। अधिकारियों का मानना है कि ट्रंप प्रशासन शांति के लिए पाकिस्तान के प्रयासों को सराहेगा।
विशेषज्ञों का कहना है कि पाकिस्तान के लिए ऐसा कर पाना बहुत मुश्किल होगा। इस सप्ताह पाकिस्तानी अखबारों ने अमेरिकी अधिकारियों के बयानों को काफी प्रमुखता दी है। इनमें अफगानिस्तान में टॉप कमांडर जनरल जॉन डब्ल्यू निकोलसन का बयान भी शामिल हैं। निकोलसन का कहना है कि हक्कानी नेटवर्क अफगानिस्तान की सुरक्षा के लिए सबसे बड़ा खतरा है और उन्हें पाकिस्तान के अंदर पनाह मिलती है। यही नहीं व्हाइट हाउस के प्रवक्ता ने भी इस तरह की चिंता जताई थी।
इस्लामिक चरमपंथ को लेकर स्पष्ट है ट्रंप की सोच
दूसरी ओर डोनाल्ड ट्रंप की अपनी सोच है। नवनिर्वाचित राष्ट्रपति ने कई मौकों पर दूसरे देशों से अमेरिकी सेनाएं वापस बुलाने या वहीं रखने की बात कही है। हालांकि इस्लामिक चरमपंथ की बात आने पर ट्रंप के विचार स्पष्ट हैं कि इसे रोका जाना चाहिए। इसे लेकर ट्रंप ने पाकिस्तान के खिलाफ कड़ाई से निपटने को लेकर भी कोई झिझक नहीं दिखाई है।
छह महीने पहले ट्रंप ने फॉक्स न्यूज से कहा था कि वह पाकिस्तान पर दबाव बनाएंगे कि वह स्थानीय डॉक्टर शकील अफरीदी को रिहा करे, जिसे अमेरिका के लिए जासूसी करने के आरोप में जेल में डाल दिया गया है। ट्रंप के इस बयान ने पाकिस्तानियों को आक्रोश से भर दिया।
अफरीदी पर आरोप है कि ओसामा बिन लादेन के इलाके में वह फर्जी टीकाकरण कैंपेन चलाता और अमेरिका के लिए जासूसी करता था। इसी इलाके में साल 2011 में अमेरिका की स्पेशल फोर्सेस ने ओसामा बिन लादेन को मार गिराया। डॉक्टर शकील अफरीदी को विश्वासघाती माना गया।
राष्ट्रपति पद के लिए चुनाव प्रचार के शुरुआती समय में ट्रंप यह खुलकर कहते थे कि वह शकील अफरीदी को दो मिनट में छुड़ा सकते हैं क्योंकि पाकिस्तान अमेरिका से बहुत मदद प्राप्त करता है। ट्रंप ने घोषणा की थी कि अमेरिका पाकिस्तान की मदद नहीं कर सकता अगर वह आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई में मदद करने वाले लोगों को दंड देगा।
पाकिस्तान के आतंरिक मंत्री चौधरी निसार अली खान ने कहा था कि ट्रंप का यह बयान उनकी असंवेदनशीलता और पाकिस्तान के प्रति अज्ञानता को दर्शाता है।