सीपीटीपीपी बनेगा अखाड़ा: चीन के बाद अब ताइवान ने भी दी सदस्यता की अर्जी
ताइवान ने सीपीटीपीपी की सदस्यता के लिए अर्जी ‘ताइवान, पेंघू, किनमेन और मात्सु पृथक कस्टम क्षेत्र’ के नाम से दी है। उसे इसी नाम से विश्व व्यापार संगठन की सदस्यता मिली हुई है। गौरतलब है कि ताइवान नाम पर चीन को एतराज रहता है...
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ताइवान ने चेतावनी दी है कि अगर चीन को उससे पहले कॉम्प्रिहेंसिव एंड प्रोग्रेसिव एग्रीटमेंट फॉर ट्रांस-पैसिफिक पार्टनरशिप (सीपीटीपीपी) में शामिल किया गया, तो उसका इस मुक्त व्यापार समझौते में शामिल होना खटाई में पड़ जाएगा। ताइवान ने इस समझौते का हिस्सा बनने की औपचारिक अर्जी बुधवार को दी। उसके बाद गुरुवार को वहां के प्रमुख व्यापार वार्ताकार जॉन देंग ने कहा- ‘चीन ताइवान की अंतरराष्ट्रीय उपस्थिति में बाधा डाल रहा है। इसलिए अगर चीन को सीपीटीपीपी में हमसे पहले शामिल किया गया, तो निश्चित रूप से ताइवान का उसमें प्रवेश खतरे में पड़ जाएगा।’
चीन ने पिछले हफ्ते सीपीटीपीपी का सदस्य बनने की अर्जी दी थी। उसके एक हफ्ते से भी कम समय में ताइवान ने अपनी अर्जी दे दी है। ताइवान की अर्जी पर तुरंत प्रतिक्रिया देते हुए जापान के विदेश मंत्री तोशिमुत्सु मोतेगी ने इसका स्वागत किया। उन्होंने कहा- ‘स्वतंत्रता, लोकतंत्र, बुनियादी मानव अधिकार और कानून के शासन जैसे मूलभूत सिद्धांतों में ताइवान की आस्था है। इनके साथ वह एक महत्वपूर्ण आर्थिक पार्टनर साबित होगा।’ जबकि चीन की अर्जी पर मोतेगी ने कहा था कि पहले इस बात की जांच करनी होगी कि क्या चीन सीपीटीपीपी की कसौटियों पर खरा उतरता है।
ताइवान सरकार के अधिकारियों के मुताबिक उनका देश लंबे समय से सीपीटीपीपी में शामिल होने की तैयारी कर रहा था। ताइवान का इस समझौते के सदस्य सभी 11 देशों के साथ संवाद बना हुआ है। जॉन देंग ने कहा कि ताइवान सरकार तुरंत इस समूह के देशों के साथ ताइवान की सदस्यता के मुद्दे पर बातचीत शुरू करेगी, हालांकि उसे यह नहीं मालूम है कि इस प्रक्रिया को पूरा करने में कितना वक्त लगेगा। उन्होंने कहा- ‘अब तक सीपीटीपीपी को सदस्यता के लिए दी गई अर्जियों के बीच प्रक्रिया सबसे तेजी से ब्रिटिश अर्जी पर बढ़ी है। लेकिन वह भी महीनों से अभी जारी ही है।’
ताइवान ने सीपीटीपीपी की सदस्यता के लिए अर्जी ‘ताइवान, पेंघू, किनमेन और मात्सु पृथक कस्टम क्षेत्र’ के नाम से दी है। उसे इसी नाम से विश्व व्यापार संगठन की सदस्यता मिली हुई है। गौरतलब है कि ताइवान नाम पर चीन को एतराज रहता है।
अब ताइवान ने कहा है कि सीपीटीपीपी में उसकी अर्जी को चीन से अलग कर देखा जाना चाहिए। उसने दावा किया कि उसके पास एक संपूर्ण बाजार तंत्र है। वह कानून के शासन और निजी संपत्ति का सम्मान करता है। साथ ही वह सीपीटीपीपी के नियमों का पालन करने को तैयार है।
ताइवान के कुल अंतरराष्ट्रीय कारोबार में 24 फीसदी हिस्सा सीपीटीपीपी के सदस्य देशों के साथ होने वाले कारोबार का है। सिंगापुर स्थित नोट्रे डेम लिउ इंस्टीट्यूट फॉर एशिया एंड एशियन अफेयर्स से जुड़े विशेषज्ञ सीन किंग के मुताबिक सीपीटीपीपी का कोई भी एक सदस्य किसी नए देश की सदस्यता की अर्जी को रोक सकता है। इसलिए अब चीन उस देश की तलाश करेगा, जो ताइवान की सदस्यता को रोक दे। उन्होंने वेबसाइट निक्कई एशिया से कहा- ‘न्यूजीलैंड और सिंगापुर का हालांकि ताइवान के साथ प्रभावी मुक्त व्यापार संबंध है, लेकिन उन दबाव पड़ेगा कि वे ताइवान की सदस्यता को वीटो कर दें।’
किंग ने बताया कि जापान और ऑस्ट्रेलिया ताइवान की सदस्यता का पुरजोर समर्थन करेंगे, जबकि मलेशिया ऐसा ही समर्थन चीन की सदस्यता अर्जी को देगा। कनाडा का क्या रुख रहेगा, अभी नहीं कहा जा सकता। इनके अलावा ब्रूनेई, चिली, मेक्सिको, पेरू और वियतनाम सीपीटीपीपी के सदस्य हैं।