अफगानिस्तान: आर्थिक संकट की तालिबान ने निकाल ली काट, चीन की मदद से सुधारेगा देश के हालात
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विस्तार
अफगानिस्तान में तालिबान किसी भी वक्त अपनी सरकार बनाने की घोषणा कर सकता है। लेकिन नई सरकार के सामने घोर आर्थिक संकट से निबटने की गंभीर चुनौती है। विदेशी सहायता रोक दिए जाने से आर्थिक हालात इतने बिगड़ चुके हैं लोग एक-एक पैसों के लिए तरस रहे हैं। बैंक बंद हैं और महंगाई दर अपने उच्च स्तर पर पहुंच गई है।
इस हफ्ते की शुरुआत में, संयुक्त राष्ट्र के प्रमुख एंटोनियो गुटेरेस ने अफगानिस्तान में एक "मानवीय तबाही" होने की चेतावनी दी थी और देशों से आपातकालीन फंड देने का आग्रह किया था क्योंकि गंभीर सूखे और हिंसा की वजह से हजारों परिवार बेघर हो गए हैं। ऐसे में नई सरकार का गठन करने वाले तालिबान को केवल चीन का सहारा ही नजर आ रहा है। तालिबान ने कहा है कि वह चीन की मदद से आर्थिक संकट से निबटेगा।
तालिबान के प्रवक्ता जबीहुल्ला मुजाहिद ने एक विदेशी अखबार को दिए इंटरव्यू में बताया कि देश पर शासन कायम करने के बाद नई सरकार मुख्य रूप से चीन के फंड पर ही निर्भर रहेगी।। मुजाहिद ने कहा चीन हमारी हर संभव मदद करने को तैयार है और उसकी मदद से ही आर्थिक हालात को सुधारेेंगे।
प्रवक्ता ने कहा चीन हमारा सबसे महत्वपूर्ण साझेदार है और हमारे देश में निवेश और पुनर्निर्माण करना चाहता है। उसने कहा कि न्यू सिल्क रोड चीन की एक ऐसी पहल है जिससे बुनियादी ढांचा मजबूत होगा और चीन के लिए व्यापार का रास्ता खुल सकता है, हम उसका सम्मान करते हैं।
अमेरिका के हटने के बाद तालिबान को चीन अपना सबसे बड़ा हितैषी नजर आता है
विदेश मामलों के जानकारों का कहना है कि बीजिंग को अफगानिस्तान में केवल अपने हित दिखाई दे रहे हैं और ताबिलान को वह अपना सबसे बड़ा हितैषी नजर आ रहा है। चीन अफगानिस्तान के साथ सैंतालीस मील की एक संकीर्ण सीमा से मिला हुआ है। इसलिए अफगानिस्तान चीन के लिए कम से कम तीन मोर्चों पर रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण पड़ोसी है। दुर्लभ खनिज, व्यापार मार्ग और उइगर अल्पसंख्यक समूहों के लिहाज से।
विदेश मामलों के जानकार और इमेज इंडिया इंस्टीट्यूट के अध्यक्ष रॉबिन्दर सचदेव कहते हैं समय के साथ, चीन अफगानिस्तान के समृद्ध खनिज भंडार का लाभ उठाएगा और अफगानिस्तान को अपने बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव में शामिल करेगा। इसके जरिए यह यूरोप तक पहुंचेगा। उसकी मंशा अफगानिस्तान के लीथियम पर पूरा कब्जा करने की है।
अफगानिस्तान में बीआरआई के विस्तार पर है चीन की निगाह
उधर, चीन ने अपनी अरबों डॉलर की बीआरआई (बेल्ड एंड रोड इनीशिएटिव) परियोजना का विस्तार अफगानिस्तान में करने को लेकर उम्मीद जताई है। चीन ने शुक्रवार को कहा कि तालिबान विश्वास करता है कि यह पहल युद्धग्रस्त क्षेत्र को विकसित करने और समृद्ध करने के लिए अच्छी है।
सचदेव कहते हैं कि चीन को एक बड़ा फायदा यह भी मिला है कि अमेरिका का प्रभाव यहां से खत्म हो गया है, जिसके बाद चीन यहां अपनी मनमानी कर सकता है। बगराम एयरबेस भी अब चीन को हासिल हो सकता है क्योंकि अब वह खाली पड़ा है। चीन तालिबान से लीज पर यह एयरबेस ले सकता है। इसकी सुरक्षा की निगरानी पाकिस्तान के हाथों में सौंप सकता है।
तीन सप्ताह पहले तियानजिन में चीनी विदेश मंत्री वांग यी ने तालिबान नेता मुल्ला अब्दुल गनी बरादार की मेजबानी का संकेत दिया था। विशेषज्ञों का कहना है कि बीजिंग तालिबान को मान्यता देगा और बदले में तालिबान को चीन की सुरक्षा चिंताओं के प्रति चौकस रहने के लिए कह सकता है। बीजिंग तालिबान से उइगर मुसलमानों और अन्य समूहों को सुरक्षित पनाहगाह देने से इनकार करने का आग्रह भी करेगा। यही वजह है कि तालिबान और अलकायदा दोनों समूह उइगर मुसलमानों पर कुछ भी बोलने से बच रहा है।
वे बिल्कुल नए साझेदार नहीं हैं
जानकारों का कहना है कि चीन और तालिबान के बीच कम से कम एक दशक पुराने संबंध है। 2016 में, इस समूह ने बीजिंग को अफगानिस्तान की मेस अयनाक तांबे की खदान में खनन को हरी झंडी दी थी और चीनी अधिकारियों को आश्वासन दिया था कि जो इस्लाम के हित में वह ऐसी राष्ट्रीय परियोजनाओं की सुरक्षा के लिए प्रतिबद्ध है। माना जा रहा है कि अपनी कमाई बढ़ाने के लिए तालिबान दूसरे बहुमुल्य खनिजों के खनन का अधिकार भी अब चीन को दे सकता है। बदले में तालिबान बुनियादी ढांचे के विकास में सहयोग मांग सकता है।
अफगानिस्तान में तीन ट्रिलियन डॉलर तक के संभावित मूल्य के खनिज धातु और और अन्य प्राकृतिक संसाधनों का विशाल भंडार है। इनमें सोना, चांदी, प्लेटिनम, लौह अयस्क, तांबा, बॉक्साइट, जस्ता और लिथियम शामिल हैं। वास्तव में, कुछ विशेषज्ञों का तर्क है कि देश में "लिथियम का सऊदी अरब" बनने की क्षमता हो सकती है। लिथियम-आयन बैटरी प्रौद्योगिकी इलेक्ट्रिक और हाइब्रिड इलेक्ट्रिक वाहनों के लिये महत्त्वपूर्ण ऊर्जा स्रोत है।
रक्षा विशेषज्ञ मेजर जनरल ए के सिवाच (रिटायर्ड) की राय यह है कि चीन तालिबान की मदद करेगा यह कोई दबी-छुपी बात ही नहीं थी। चीन पहले भी तालिबान को आर्थिक मदद देता रहा है। उसकी शह पर ही तालिबान अमेरिकी सैनिकों के रहते हुए भी इतना ताकतवर बना। चीन से न केवल उन्हें आर्थिक मदद मिलती है बल्कि हर तरह से उनको प्रोत्साहन मिलता है।
वे कहते हैं, चीन की वजह से इन आतंकी संगठनों के पास संसाधन की कोई कमी नहीं है। इसकी सबसे बड़ी वजह यह है कि चीन की नजर अफगानिस्तान के संसाधनों पर है। वह अफगानिस्तान में भारी निवेश करने की योजनाएं बना रहा है, चीन-पाकिस्तान इकोनॉमिक कॉरिडोर को वह ईरान तक ले जाना चाहता है।
चीन अपने बीआरआई को अफगानिस्तान में विस्तारित करने की योजना पर काम रहा है ताकि अमेरिका के अफगानिस्तान से निकल जाने के बाद वहां अपना प्रभाव बना सके। बीजिंग वर्तमान में चीन के झिंजियांग प्रांत को अफगानिस्तान से जोड़ने वाले वखान कॉरिडोर के माध्यम से सड़क का निर्माण करवा रहा है, ताकि चीन-पाकिस्तान इकॉनोमिक कॉरिडोर के हिस्से के रूप में पूरे पाकिस्तान और मध्य एशिया में सड़क नेटवर्क को मजबूत किया जा सके।
कतर को भी फायदा
बताया जा रहा है कि तालिबान के आने से कतर को भी फायदा मिलना तय है। काबुल एयरपोर्ट को दोबारा शुरु करने में तकनीशियन कतर से बुलाए गए हैं। अमेरिका और नीदरलैंड कतर में अपना दूतावास खोल रहे हैं। कई और देश कतर में ही अपना दूतावास बना सकते हैं। इससे कतर की प्रोफाइल ऊंची हो गई, उसकी आर्थिक व्यवस्था मजबूत होगी। अफगानिस्तान में हुए घटनाक्रम से अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कतर बहुत प्रभावशाली और महत्वपूर्ण हो गया है।