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अफगानिस्तान: प्रशासन पर अब दबदबा बन गया है हक्कानी नेटवर्क का, लेकिन शासन संभालने में दिख रहा अक्षम

Tue, 29 Mar 2022 06:48 PM IST
Harendra Chaudhary वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला, काबुल
वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला, काबुल Published by: Harendra Chaudhary Updated Tue, 29 Mar 2022 06:48 PM IST
सार

विश्लेषकों का कहना है कि पिछले साल अफगानिस्तान में तालिबान की जीत को सुनिश्चित करने में हक्कानी गुट के लड़ाकों की बड़ी भूमिका रही थी। हक्कानी गुट क्रूर किस्म के हमलों के लिए बदनाम रहा है। आत्मघाती हमलों को अंजाम देने में भी इसका नाम आता रहा है। बताया जाता है कि आतंकवादी गुट अल-कायदा के साथ इसके करीबी रिश्ते हमेशा बने रहे हैं...

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afghanistan: Speculation continues over the role of Interior Minister Sirajuddin Haqqani in the Taliban-led Afghan government
सिराजुद्दीन हक्कानी - फोटो : Agency (File Photo)

विस्तार

तालिबान के नेतृत्व वाली अफगान सरकार में गृह मंत्री सिराजुद्दीन हक्कानी की भूमिका पर अभी भी कयास जारी हैं। काबुल पर तालिबान के कब्जे के बाद हक्कानी पहली बार पिछले छह मार्च को सामने आया था। तब इसे अफगानिस्तान में सक्रिय गुटों के बीच एक तरह का संतुलन कायम हो जाने का संकेत समझा गया था। सिराजुद्दीन हक्कानी कुख्यात हक्कानी नेटवर्क का प्रमुख है। उसका नाम अब भी अमेरिकी खुफिया एजेंसी- फेडरल ब्यूरो ऑफ इन्वेस्टीगेशन (एफबीआई)- की आतंकवादियों की लिस्ट में शामिल है।

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विश्लेषकों का कहना है कि पिछले साल अफगानिस्तान में तालिबान की जीत को सुनिश्चित करने में हक्कानी गुट के लड़ाकों की बड़ी भूमिका रही थी। हक्कानी गुट क्रूर किस्म के हमलों के लिए बदनाम रहा है। आत्मघाती हमलों को अंजाम देने में भी इसका नाम आता रहा है। बताया जाता है कि आतंकवादी गुट अल-कायदा के साथ इसके करीबी रिश्ते हमेशा बने रहे हैं।

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तालिबान में हाथापाई की नौबत  

पिछले साल अगस्त में काबुल पर कब्जा जमाने के बाद तालिबान नेता मुल्ला अब्दुल ग़नी बरादर ने कहा था कि इस बार तालिबान की सरकार उदार नजरिए के साथ चलेगी। लेकिन यह अब साफ हो गया है कि सिराजुद्दीन हक्कानी और हक्कानी नेटवर्क के दूसरे नेता भी इस राय से सहमत नहीं हैं। बरादर अब उप प्रधानमंत्री हैं।

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विश्लेषकों के मुताबिक आरंभिक दिनों में ही यह संकेत मिलने लगा था कि उदार नीति अपनाने के मुद्दे पर मौजूदा अफगान शासकों में एकमत नहीं है। इसके संकेत खास कर उस समय मिले, जब तालिबान ने अफगानिस्तान में नए इस्लामी अमीरात की स्थापना की। बताया जाता है कि उस समय नए शासन में शामिल नेताओं के बीच मतभेद इस हद तक भड़के कि उनके बीच हाथापाई की नौबत आ गई। तभी ये खबर आई थी कि बरादर भूमिगत हो गए हैं।

उस घटना के कई महीनों के बाद अब संकेत हैं कि हक्कानी नेटवर्क का अफगान शासन के अंदर प्रभाव बढ़ गया है। इस नेटवर्क से जुड़े नेता बरादर और दूसरे उदारपंथी नेताओं के एजेंडे को पीछे धकलने में अब सफल हो रहे हैं। जिस तरह लड़कियों के स्कूलों को बंद किया गया है, उसे इसी घटनाक्रम से जोड़ कर देखा जा रहा है।

अफगानिस्तान में खाद्य पदार्थों और धन दोनों की भारी कमी

कुछ विश्लेषकों की तो यहां तक राय है कि अब अफगानिस्तान के शासन तंत्र में इस्लामी मामलों में हक्कानी तंत्र का पूरा वर्चस्व कायम हो गया है। काबुल स्थित पत्रकार शाह फरमान ने वेबसाइट एशिया टाइम्स से कहा- ‘हाल में हुए एक पासिंग आउट समारोह में यह साफ संकेत मिला कि हक्कानी गुट के नेताओं के तहत अब देश में राजनीतिक स्थिरता कायम हुई है।’

सिराजुद्दीन हक्कानी गृह मंत्री हैं। इस नाते पुलिस उनके तहत आती है। समझा जाता है कि अफगान पुलिस का संपर्क तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान, इस्लामिक स्टेट (खोरासान), ईस्ट तुर्कमिनिस्तान इस्लामिक मूवमेंट, और अल-कायदा जैसे आतंकवादी समूहों से बना हुआ है। इस तरह ये सभी गुट हक्कानी के संपर्क में हैं। यही हक्कानी नेटवर्क की बढ़ती ताकत का सबसे बड़ा कारण है।



इस बीच देश में अकाल की गंभीर स्थिति है। सिराजुद्दीन हक्कानी ने अभी तक इस बारे में कुछ नहीं कहा है। दरअसल, तालिबान शासन स्थिति को संभालने में अक्षम दिख रहा है। पूर्व राष्ट्रपति अशरफ ग़नी के शासनकाल में गृह मंत्रालय में काम कर चुके एक अधिकारी ने एशिया टाइम्स से कहा- खाद्य पदार्थों और धन दोनों की भारी कमी है, जिसका खराब असर अफगानिस्तान के हर व्यक्ति पर पड़ रहा है।

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