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अफगानिस्तान में बदहाली : घर का सामान बेच रहे भूख से बेहाल लोग, पैसा निकासी की सीमा ने और बढ़ाई मुश्किल

Tue, 14 Sep 2021 07:06 AM IST
देव कश्यप अमर उजाला रिसर्च टीम, काबुल।
अमर उजाला रिसर्च टीम, काबुल। Published by: देव कश्यप Updated Tue, 14 Sep 2021 07:06 AM IST
सार

विश्व बैंक, अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष और अमेरिका के केंद्रीय बैंक द्वारा जारी होने वाले फंड में कटौती या बंदी के कारण भुखमरी के हालात होने लगे हैं। बैंक खुले तो हैं, लेकिन उनमें कैश नहीं है। एटीएम मशीनें खाली पड़ी हैं। लोगों ने संकट की स्थिति के लिए जो पैसा बचाकर रखा था, वो बुरे समय में नहीं मिल पा रहा है।

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Afghanistan Crisis Afghans suffering from hunger selling household items increased difficulty due to limit on money withdrawal
अफगान नागरिक (सांकेतिक तस्वीर) - फोटो : PTI

विस्तार

अफगानिस्तान में तालिबान की वापसी के एक माह पूरे होने वाले हैं। इसी के साथ वहां जनजीवन बेपटरी होने लगा है। कमाई का जरिया खत्म होने के बाद लोग परिवार चलाने और बच्चों का पेट भरने के लिए घर-गृहस्थी का सामान सड़कों पर बेचने को मजबूर होने लगे हैं।

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काबुल के चमन-ए-हजूरी की सड़कों पर लोग अपनी उस पूंजी और संपत्ति को बेच रहे हैं, जिसे उन्होंने अपनी मेहनत और खून पसीने की कमाई से बीते बीस वर्षों में खरीदा था। सड़क पर पलंग, गद्दे, तकिये ही नहीं फ्रिज, टीवी, वाशिंग मशीन, पंखा, एसी, कूलर और किचन के सामान के साथ अन्य दैनिक जीवन से जुड़ी वस्तुएं कौड़ियों के दाम बेच रहे हैं। विश्व बैंक, अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष और अमेरिका के केंद्रीय बैंक द्वारा जारी होने वाले फंड में कटौती या बंदी के कारण हालात भुखमरी के होने लगे हैं। बैंक खुले तो हैं, लेकिन उनमें कैश नहीं है। एटीएम मशीनें खाली पड़ी हैं। लोगों ने संकट की स्थिति के लिए जो पैसा बचाकर रखा था, वो बुरे हालात में नहीं मिल पा रहा है। नतीजतन लोग पेट भरने के लिए घर का सामान बेच रहे हैं।
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पेट भरने को सामान बेचना बेहतर
काबुल की सड़कों पर अपने घर का सामान बेच रहे शुकरुल्ला का कहना है कि परिवार में 33 लोग हैं। बैंक में पैसा जमा है लेकिन मिल नहीं रहा है। आटा, दाल, चावल की कीमतें कई गुना बढ़ गई हैं। ऐसे में 33 लोगों का पेट भरने के लिए घर का सामान बेचने के अलावा कोई और दूसरा विकल्प नहीं दिख रहा है। जिंदगी बच जाएगी तो फिर खरीद लेंगे, लेकिन अपनों को भूख के मारे तड़पते नहीं देखा जाता है।

पैसा निकासी पर लगी सीमा से बढ़ी मुश्किल
अफगानिस्तान में कुछ बैंक खुले हैं जहां लोग अपना पैसा निकाल रहे हैं लेकिन यहां भी निकासी की सीमा निर्धारित है। सात दिन में एक बैंक खाते से सिर्फ 16 हजार रुपये ही निकाले जा सकते हैं। पैसा निकालने के लिए अफगानिस्तान के राष्ट्रीय बैंक के बाहर सैकड़ों महिलाएं और पुरुष कतारों में लगे हैं। लोगों का कहना है कि उन्हें इलाज के लिए मोटी रकम की जरूरत होती है लेकिन बैंक तय राशि से ज्यादा नहीं दे रहे हैं।

अगले साल तक 97 फीसदी लोग गरीबी रेखा से नीचे होंगे
संयुक्त राष्ट्र ने पिछले दिनों जारी अपनी एक रिपोर्ट में कहा था कि वर्ष 2022 के अंत से पहले अफगानिस्तान की 97 फीसदी आबादी गरीबी रेखा के नीचे चली जाएगी। संयुक्त राष्ट्र के महासचिव एंटोनियो गुटेरस ने चेतावनी दी है कि विभिन्न समस्याओं के चलते अफगानिस्तान पूरी तरह विभाजित होने की कगार पर है। एक करोड़ से भी ज्यादा की आबादी को भुखमरी से बचाने के लिए समय रहते मदद जरूरी है।

पूर्व सैनिक का दर्द...सोचा नहीं था, ऐसी स्थिति होगी
अफगान सेना के सैनिक अब्दुल्ला घर परिवार का खर्च चलाने के लिए ठेला चलाने को मजबूर हैं। वे बताते हैं कि मैं जो कुछ कर रहा, उसकी मुझे कभी उम्मीद नहीं थी। मैं अपने देश के लिए काम करना चाहता था लेकिन अब सड़क पर धूल और गंदगी के बीच ठेला चला रहा हूं ताकि आठ बच्चों और परिवार के दूसरे सदस्यों का पेट भर सकूं। डर है कि कहीं मजदूरी ही न बंद हो जाए तो भूखे ही मरना पड़ेगा।

दहशतगर्द सरकार की बढ़ती बर्बरता के खिलाफ महिलाओं का मोर्चा जारी

अफगानिस्तान में महिलाओं के खिलाफ उत्पीड़न और क्रूरता की घटनाएं बढ़ती जा रही हैं। लेकिन, तालिबान से गंभीर खतरा होने के बाद भी महिलाएं लगातार तमाम शहरों में अधिकारों के लिए प्रदर्शन कर रही हैं। शनिवार को काबुल में तालिबानों ने होप फाउंडेशन की संचालक फाहिमा रहमती पर हमला कर उनके परिवार को अगवा कर लिया। पाजोक अफगान की खबर के मुताबिक तालिबान ने उनके परिवार के पांच पुरुषों को अगवा किया है, जिनमें दो उनके भाई, एक रिश्तेदार और एक पड़ोसी है। वहीं, कंधार के खुफिया प्रमुख रहमतुल्ला नराइवाल ने आरोप लगाया कि रहमती के घर में अफगान एनडीएस के पूर्व अधिकारी मौजूद थे। हालांकि, रहमती ने इन आरोपों का खंडन किया है। एजेंसी

पूरा मुल्क तालिबानी कैद में
एक दिन पहले ही मानवाधिकार कार्यकर्ता हबीबुल्ला फरजाद को  प्रदर्शन में शामिल होने पर बुरी तरह पीटा गया। इन कार्यकर्ताओं के खिलाफ हिंसा आम बात हो गई है। जहां-तहां बंदूक ताने खड़े तालिबानी लड़ाकों की मौजूदगी से लगता है मानो पूरे देश को बंदी बना लिया गया है। प्रदर्शन कर रही महिलाओं को कोड़े और लाठियां मारकर खदेड़ दिया, जबकि तालिबानी कहते रहे थे कि वे शांतिपूर्ण प्रदर्शनों का समर्थन करते हैं।

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