जापान में संसदीय चुनाव: आज भी कुल मिलाकर ‘फैमिली बिजनेस’ ही है राजनीति
इस बार एलडीपी प्रधानमंत्री फुमियो किशिदा के नेतृत्व में चुनाव लड़ रही है। किशिदा भी एक वंशानुगत नेता हैं। उनके पिता फुमिताके डियेट के सदस्य थे। फुमियो किशिदा ने पहली बार 1993 में चुनाव लड़ा। तब वे अपने पिता की सीट से ही जीते थे...
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जापान में संसदीय चुनाव के लिए प्रचार अभियान मंगलवार को औपचारिक रूप से शुरू हो गया। नई डियेट (संसद) चुनने के लिए जापान के मतदाता 31 अक्तूबर को वोट डालेंगे। इस बीच जारी हुए एक ताजा विश्लेषण के मुताबिक जापान की राजनीति आज भी कुल मिलाकर एक ‘पारिवारिक मामला’ बनी हुई है। इसमें किसी नए व्यक्ति का प्रवेश मुश्किल बना रहता है।
वेबसाइट निक्कईएशिया.कॉम ने 1996 से लेकर इस चुनाव तक उम्मीदवार बने कुल 8,803 व्यक्तियों की पृष्ठभूमि का अध्ययन किया। चुनाव कार्यालय से प्राप्त आंकड़ों के आधार हुए हुए इस अध्ययन का निष्कर्ष रहा कि बीते 25 साल में सिर्फ तकरीबन 20 फीसदी ही उम्मीदवार ऐसे रहे, जिन्होंने पहली बार चुनाव लड़ा और जीत गए। वरना, ज्यादातर फर्स्ट टाइमर्स को हार का मुंह देखना पड़ा है।
वेबसाइट निक्कई के मुताबिक जापानी सियासत में कामयाब होने के लिए उम्मीदवारों का तीन 'बान' में से किसी एक से जुड़ा होना जरूरी माना जाता है।
- इनमें पहला जिबान है, जिसका अर्थ है किसी संघ या एडवोकेसी ग्रुप से संबंधित होना। इन समूहों को जापान में राजनीतिक मशीन कहा जाता है।
- दूसरा पहलू कनबान है, जिसका मतलब किसी मशहूर परिवार से संबंधित होने से है।
- तीसरा पहलू कबान है, जिसका मतलब युद्ध की परंपरा से संबंधित परिवार से आए व्यक्ति हैं। विश्लेषकों का कहना है कि ये तीनों पहलू वंशानुगत रूप से उम्मीदवारों को मिलते हैँ। इसी रूप में जापान की राजनीति पर वंशवाद को हावी बताया जाता है।
वंशानुगत नेता हैं फुमियो किशिदा
जापान में 1996 में नई चुनाव प्रणाली लागू की गई थी। तब से वहां प्रत्यक्ष निर्वाचन वाले चुनाव क्षेत्रों के साथ-साथ आनुपातिक प्रणाली के जरिए डियेट का चुनाव होता है। निक्कई एशिया ने अपने विश्लेषण के दौरान नई प्रणाली लागू होने के बाद से जीते उम्मीदवारों का अध्ययन उन्हें ‘वंशानुगत’ और ‘गैर-वंशानुगत’ श्रेणी में बांटते हुए किया। ‘वंशानुगत’ श्रेणी में उन उम्मीदवारों को रखा गया, या तो जिनके माता या पिता डियेट का सदस्य रह चुके थे या फिर जिनका संबंध किसी ‘बान’ से रहा है।
पाया गया कि वंशानुगत उम्मीदवारों के जीतने की दर 80 फीसदी रही है। इनमें कई ऐसे नेता भी रहे हैं, जो प्रत्यक्ष निर्वाचन वाले अपने क्षेत्र से हार गए, लेकिन उन्हें आनुपातिक प्रणाली के तहत पार्टी को मिली सीट के जरिए सदन में पहुंचा दिया गया। गैर वंशानुगत उम्मीदवारों के जीतने की दर सिर्फ 30 फीसदी पाई गई। यह भी सामने आया कि वंशानुगत उम्मीदवारों में से 70 फीसदी ने सत्ताधारी लिबरल डेमोक्रेटिक पार्टी (एलडीपी) की तरफ से चुनाव लड़ा। इस पार्टी का ढांचा किस तरह वंशवाद में जकड़ा हुआ है, इसकी मिसाल 2009 के चुनाव के में देखने को मिली थी। तब एलडीपी की करारी हार हुई थी। उस समय पार्टी उम्मीदवारों की जीत की दर सिर्फ 38 फीसदी रही। लेकिन पार्टी के वंशानुगत उम्मीदवारों के जीतने की दर तब भी 52 फीसदी रही थी।
इस बार एलडीपी प्रधानमंत्री फुमियो किशिदा के नेतृत्व में चुनाव लड़ रही है। किशिदा भी एक वंशानुगत नेता हैँ। उनके पिता फुमिताके डियेट के सदस्य थे। फुमियो किशिदा ने पहली बार 1993 में चुनाव लड़ा। तब वे अपने पिता की सीट से ही जीते थे।